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पटरी से उतरता गणतंत्र

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जब जनहित को केंद्र में न रखकर निजहित में शासक फैसले लेने लगे तो गणतंत्र पटरी से उतरने लगता है

अपनी किताब मॉर्टल रिपब्लिक में एडवर्ड जे वाट्स ने रोमन गणराज्य के पतन के कारणों पर नए नज़रिए से मंथन किया है। सरकारी संस्थाओं, संसदीय नियमों और राजनैतिक रिवाजों ने सदियों तक रोम को राजनैतिक और सैन्य रूप से सशक्त बनाया, लेकिन जब इन्हीं संस्थाओं और नियमों का उपयोग शासकों ने खुद को मजबूत करने और विरोधियों को परास्त करने के लिए किया, तो अंतत: इसका खामियाजा रोम के गणतंत्र को चुकाना पड़ा। वाट्स के मुताबिक रोम गणराज्य के पतन का प्रारंभ बिंदु वह था, जब नेताओं ने सोचा कि उनकी निज महत्वाकांक्षा, गणराज्य की महत्वाकांक्षाओं की पूर्ति है।
दरअसल जब जनहित को केंद्र में न रखकर निजहित में शासक फैसले लेने लगे तो गणतंत्र पटरी से उतरने लगता है। इस साल की शुरुआत में इसकी एक मिसाल दुनिया ने अमेरिका में देखी, जहां बीते चार बरसों में गणतंत्र की नींवें कमजोर करने वाला माहौल बना। भारत में भी लोकतंत्र के क्षरण के हम दिन ब दिन साक्षी बन रहे हैं। आधे-अधूरे तरीके से संसद सत्र बीते एक साल में आयोजित हुए, लेकिन कई कानून मनमाने तरीके से बने। जिस कृषि क्षेत्र को अर्थव्यवस्था की रीढ़ कहा जाता है, उससे जुड़े तीन नए कानून बिना किसानों को भरोसे में लिए बन गए और अब उन्हें थोपने की ज़िद सरकार की है। 
दो माह से अधिक समय से कृषि कानून रद्द करने की मांग को लेकर किसान दिल्ली की सीमाओं पर बैठे हैं। 26 जनवरी के पहले तक इस आंदोलन को कई तरह से बदनाम करने की कोशिश हुई। पिछले सप्ताह एक नकाबपोश भी किसानों ने पकड़ा, जिसने पहले किसान नेताओं को मारने की साजिश की बात कही, बाद में अपनी बात से मुकर भी गया। लेकिन इस घटना से यह समझ आ गया कि किसान आंदोलन की असली ताक़त यानी शांति और अहिंसा को कहीं न कहीं खत्म करने की चालें सोची जा रही हैं।
26 जनवरी को ट्रैक्टर परेड निकालने का ऐलान किसान काफी पहले से कर चुके थे। सरकार ने इसे रोकने की सारी कोशिशें कीं, पर बाद में दिल्ली पुलिस की सहमति मिल गई और इस परेड के लिए कुछ मार्ग भी तय कर दिए गए। इस परेड में अधिकतर ट्रैक्टर निर्धारित मार्ग पर ही चले। लेकिन कुछ जत्थे मार्ग से विचलित हुए और कई लोग लालकिले तक पहुंच गए। तिरंगे के नीचे निशान साहिब का झंडा फहरा दिया। आंदोलित लोगों के साथ पुलिस की झड़प भी हुई, जिसमें कई पुलिसकर्मी घायल हुए। वहीं आईटीओ के पास एक आंदोलनकारी की मौत भी हो गई। दो महीने से चल रहे अहिंसात्मक आंदोलन के बीच हिंसा की ये घटनाएं दुखद और अस्वीकार्य हैं।
लेकिन इनके बाद आंदोलनविरोधियों की ओर से इसका लाभ लेने की जो जल्दबाजी दिखाई गई, वह उससे कहीं अधिक दुखद है। हम शुरु से यह कहते आ रहे हैं कि किसान किसी राजनैतिक उद्देश्य से नहीं, बल्कि अपना और देश का भविष्य बचाने के लिए आंदोलन कर रहे हैं, इसलिए इस आंदोलन को राजनैतिक चश्मे से देखना सही नहीं है। संयुक्त किसान मोर्चा ने 26 जनवरी को हुई हिंसा से खुद को अलग किया है और यह कहा है कि इसमें असामाजिक तत्वों की घुसपैठ जिम्मेदार है। इस तरह के आरोप निराधार नहीं हैं, क्योंकि इससे पहले शाहीन बाग में भी ऐसा ही करने की कोशिश की गई थी। लालकिले पर फहराए झंडे को खालिस्तानी बताया गया, जबकि यह सिख धर्म का पूजनीय झंडा है। 
ऐसी ख़बरें भी आ रही हैं कि ये झंडा फहराने वाला किसान आंदोलनकारी नहीं था, बल्कि भाजपा समर्थक है और सांसद सनी देओल का करीबी है। सनी देओल ने इससे इंकार किया है। लेकिन उनकी बात पर यकीन किया जा सकता है तो फिर किसानों की बात पर भी यकीन करना चाहिए। और सच का पता लगाने के लिए निष्पक्ष जांच होनी चाहिए। 26 जनवरी को हमेशा दिल्ली में सुरक्षा इंतजाम कड़े होते हैं और इस बार तो दिल्ली पुलिस को पहले से पता था कि ट्रैक्टर रैली निकलेगी, फिर केन्द्रीय गृहमंत्रालय ने पहले से सारे इंतज़ाम क्यों नहीं किए। अगर सरकार पहले से सतर्क रहती, तो शायद गणतंत्र दिवस के दिन राजधानी का माहौल इतना नहीं बिगड़ता कि कश्मीर की तरह यहां भी इंटरनेट बंद करने जैसी नौबत आती।
लेकिन माहौल को शायद जानबूझकर बिगड़ने दिया गया, क्योंकि इसका इल्ज़ाम सीधे आंदोलनकारियों पर लगता और आंदोलन को खत्म करवाने का एक पुख्ता कारण मिल जाता। यही प्रवृत्ति गणतंत्र को कमज़ोर करने वाली है, क्योंकि इसमें जनता की समस्या का समाधान करने की जगह उसे समस्या का कारण बताने की कोशिश हो रही है। रोम, मिस्र, यूनान सब खत्म हो चुके हैं, लेकिन भारत की हस्ती को बचाना है तो उसके लिए सबसे पहले यहां की जनता को, जनतंत्र को बचाना होगा। पलाश सुरजन संपादक देशबंधु

Ramswaroop Mantri

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