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भारत में सांप्रदायिकता का इतिहास

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शैलेन्द्र चौहान

सांप्रदायिकता का मतलब संकीर्ण मनोवृत्ति होता है। सांप्रदायिकता की भावना के कारण व्यक्ति में अपने धर्म के प्रति अंधभक्ति उत्पन्न होती है, और दूसरे धर्मों के प्रति घृणा की भावना जागृत होती है। मौलिक रूप में संप्रदायवाद अंध आस्था का दूसरा नाम है। कोई व्यक्ति किसी एक विशेष धर्म का आचरण करता है और वह समानधर्मी समूह के बीच रहता है। इसी लिए एक ही धर्म के आचरण करने वालों के सामाजिक, राजनीतिक और आर्थिक व्यवहार में भी साम्यता होती है। कहा जा सकता है कि धर्म लोगों के जीवन का अभिन्न अंग है। एक ही देश के अलग-अलग और प्रमुख संप्रदायों के बीच में अलगाव का मूल कारण अपनी, अपने समूह, अपने संप्रदाय और धर्म की श्रेष्ठता की भावना है। वह दूसरे धर्मावलंबियों को अपने से हेय मानता है और उन्हें किसी न किसी तरह यह आभास कराना चाहता है।

एक राजनीतिक दर्शन के रूप में सांप्रदायिकता की जड़ें भारत की धार्मिक और सांस्कृतिक विविधता में मौजूद हैं।

भारत में सांप्रदायिकता का प्रयोग सदैव ही धार्मिक और जातीय पहचान के आधार पर समुदायों के बीच सांप्रदायिक घृणा और हिंसा के आधार पर विभाजन, मतभेद और तनाव पैदा करने के लिये एक राजनीतिक प्रचार उपकरण के रूप में किया गया है।

भारत मूलतः विविधताओं का देश है, विविधताओं में एकता ही यहाँ की सामासिक संस्कृति की स्वर्णिम गरिमा को आधार प्रदान करती है। वैदिक काल से ही सामासिक संस्कृति में अंतर और बाह्य विचारों का अंतर्वेशन ही यहाँ की विशेषता रही है, इसलिये किसी भी सांस्कृतिक विविधता को आत्मसात करना भारत में सुलभ और संप्राप्य है। इसी परिप्रेक्ष्य में धार्मिक सहचार्यता भी इन्हीं विशेषताओं में से एक रही है, इसका अप्रतिम उदाहरण सूफीवाद में देखा जा सकता है जहाँ पर इस्लामिक एकेश्वरवाद और भारतीय धर्मों की कुछ विशेषताओं का स्वर्णिम संयोजन हुआ तथा परिणामस्वरूप एक संश्लेषित धार्मिक वैचारिकता का सफल अनुगमन हुआ किंतु हाल के वर्षों में भारत की सांस्कृतिक विविधता- सांस्कृतिक विषमता में अंतरित हो रही है जिससे लोगों के मध्य सद्भाव में ह्रास के साथ ही सांस्कृतिक विशेषता पर भी नकारात्मक प्रभाव भी पड़ रहा है।

प्राचीन भारतीय समाज में विभिन्न धर्मों के लोग शांतिपूर्वक एक साथ रहते थे। बुद्ध संभवतः पहले भारतीय थे जिन्होंने धर्मनिरपेक्षता की अवधारणा प्रस्तुत की। इस बीच अशोक जैसे राजाओं ने शांति और धार्मिक सहिष्णुता की नीति का पालन किया। मध्यकालीन भारत में इस्लाम के आगमन के साथ ही महमूद गज़नवी द्वारा हिंदू मंदिरों के विनाश जैसी घटनाएँ सामने आने लगीं। हालाँकि उस समय धर्म लोगों के जीवन का एक महत्त्वपूर्ण हिस्सा था, किंतु कोई सांप्रदायिक विचारधारा या सांप्रदायिक राजनीति नहीं थी। अकबर और शेरशाह सूरी जैसे शासकों ने देश भर में प्रचलित विभिन्न संस्कृतियों और परंपराओं के प्रति सहिष्णु धार्मिक नीति का पालन किया। हालाँकि औरंगज़ेब जैसे शासक कुछ संप्रदायों व अन्य धार्मिक प्रथाओं के प्रति कम सहिष्णु थे।

भारत में सांप्रदायिक हिंसा की प्रमुख घटनाएँ

सांप्रदायिक हिंसा एक ऐसी घटना है जिसमें दो अलग-अलग धार्मिक समुदायों के लोग नफरत और दुश्मनी की भावना से लामबंद होते हैं और एक-दूसरे पर हमला करते हैं।

अक्सर कहा जाता है, कि सांप्रदायिकता प्राचीन और मध्यकालीन अवशेष है। किंतु ऐसा बिल्कुल नहीं है। हालांकि सांप्रदायिकता प्राचीन और मध्यकालीन विचारधारा का इस्तेमाल करती है, और उसके अंतर्गत चलती भी है, परंतु मूल रूप से सांप्रदायिकता एक आधुनिक विचारधारा और राजनीतिक प्रवृत्ति है। सांप्रदायिकता सामाजिक समूह वर्ग और ताकतों की सामाजिक अपेक्षाओं को सामने लाकर उनकी राजनीतिक आवश्यकता को पूर्ण करती है। भारत में सांप्रदायिकता का विकास आधुनिक राजनीति के विकास से संबंधित है। भारत में धर्म को लेकर कभी-कभी हिंदू और मुसलमान संप्रदाय में झगड़े होते थे। परंतु 1870 के दशक के पहले तक भारत में सांप्रदायिक विचारधारा और सांप्रदायिक राजनीति का अस्तित्व नहीं देखने को मिला था।

1857 के सिपाही विद्रोह में हिंदू और मुसलमान दोनों ही संप्रदायों के लोगों ने एक साथ मिलकर अंग्रेजों के खिलाफ संघर्ष किया था। और सभी की सम्मति से अंतिम मुगल बादशाह को नेता बनाया गया था। भारत जो धार्मिक और सांस्कृतिक रूप से विविधता और बहुलता वाला देश है, ऐसे देश में सांप्रदायिकता का विकास होना कोई आकस्मिक घटना नहीं हो सकती। भारत में सांप्रदायिकता का विकास अंग्रेजों के द्वारा अपने साम्राज्यवादी और औपनिवेशिक लाभों को पूरा करने के लिए बांटो और राज करो की नीति के अंतर्गत क्रमिक प्रक्रिया में हुआ था। 1857 में अंग्रेजों के खिलाफ हिंदू और मुसलमान दोनों के विद्रोही सैनिकों ने साथ मिलकर ब्रिटिश साम्राज्य का विरोध किया था। इस विद्रोह में ब्रिटिश सरकार ने मुसलमानों की भूमिका को देखकर उनके विरोध में भेदभाव पूर्ण नीति को अपनाना शुरू कर दिया और हिंदुओं का पक्ष लेने लगे। सरकारी पदों पर मुसलमानों की नियुक्ति पर वर्ष 1857 के बाद प्रतिबंध लगाया गया और मुस्लिम संप्रदाय के लोगों को संदेह भरी दृष्टि से देखा जाने लगा लिया।

इधर भारत के लोगों में राष्ट्रीयता की भावना फैल चुकी थी, और दिन प्रतिदिन उसमें विकास हो रहा था। भारतीयों में राष्ट्रीय भावना के विकास को रोकने के लिए ब्रिटिश सरकार ने भारत में बांटो और राज करो की नीति को लागू किया। बांटो और राज करो की नीति के अंतर्गत भारत की राजनीति में सांप्रदायिकता और अलगाववादी प्रवृत्तियों को आगे लाने के लिए मुसलमानों, जमींदारों, भू स्वामियों और नव शिक्षित वर्गों को अपनी तरफ करने का निर्णय ले लिया। मुसलमानों के साथ हो रहे भेदभाव की वजह से उनको लगने लगा कि मुसलमानों के विरोध में हिंदुओं और अंग्रेजों के बीच में एक प्रकार का अनुबंध हो गया है। इसी के कारण हिंदू और मुसलमानों के बीच में संदेह और अविश्वास की भावना पैदा हो गई।

1870 के बाद भारत में जब भारतीय राष्ट्रीयता का उदय हुआ, जिसकी वजह से अंग्रेजों और मुसलमानों के बीच के संबंध धीरे धीरे अच्छे होनेे लगे। विलियम हंटर ने ‘द इंडियन मुस्लिम” नामक अपनी किताब में एंग्लो मुस्लिम मित्रता के विषय पर जोर देकर आंग्ल मुस्लिम मित्रता की नींव रखी थी।

सामाजिक और राजनीतिक परिस्थितियों के प्रभाव के अतिरिक्त भारत में सांप्रदायिकता का जन्म और विकास उपनिवेशवादी अर्थव्यवस्था की वजह से हुआ था। औपनिवेशिक शोषण के परिणामस्वरूप भारतीय अर्थव्यवस्था एक ही स्थान पर ठहर गई थी। इसका प्रभाव खास करके भारतीय जनता के मध्य वर्ग के जीवन पर पड़ा था। जिसकी वजह से ऐसी परिस्थिति का निर्माण हुआ जो भारतीय समाज के विभाजन और कलह तथा उसके गहरे रूपांतरण में सहायक बनी। भारत की आर्थिक व्यवस्था में ठहराव आ जाने की वजह से सरकारी नौकरियां, वकालत और डॉक्टरी जैसे पेशों में और उद्योग धंधों में भारी प्रतिद्वंदिता आ गई थी। आर्थिक व्यवस्था के ठहराव के बाद आर्थिक अवसरों का ज्यादातर हिस्सा हथियाने के लिए मध्यम वर्ग के लोग जाति, प्रांत और धर्म जैसी पहचान की सहायता लेते थे। इस प्रकार सांप्रदायिकता की मदद से कुछ लोगों को तत्कालीन सहायता मिल जाती थी। आर्थिक अवसरों के इस समय में सांप्रदायिकता की जड़ें मध्यम वर्ग में स्थापित हो चुकी थीं। सांप्रदायिकता के सहारे मध्यम वर्ग ने अपने लाभ तथा अपेक्षाओं को व्यक्त किया था।

वर्ष 1858 में घोषणा सुनने में आई थी कि, सार्वजनिक पदों पर नियुक्ति के विषय में सरकार जाति और धर्म का भेदभाव नहीं करेगी। फिर भी सरकार ने मुसलमान समुदाय के लोगों को राजकीय पदों से दूर करके, उन्हें शिक्षा तथा आर्थिक क्षेत्र में उपेक्षित कर बुरी तरह से दंडित किया था। भारत में सरकारी उच्च पदों पर यूरोपियन को और छोटे पद पर हिंदुओं को नौकरी दी गई थी। मुसलमानों को सरकारी नौकरियों से दूर रखने की वजह से हिंदू-मुसलमान दोनों समुदायों के बीच में आर्थिक और सांस्कृतिक दरार पैदा हो गई थी। वर्ष 1871 में बंगाल में सरकारी अधिकारियों के पदों पर मुसलमान सिर्फ 5.9% और हिंदू 41% थे। हालांकि बस 1882 में संयुक्त प्रांत की 35% सरकारी नौकरियों को वर्ष 1871 में बंगाल में सरकारी अधिकारियों के पद पर मुसलमान सिर्फ 5.9% और हिंदू 41% जितने थे। हालांकि 1882 में संयुक्त प्रांत की 35% सरकारी नौकरियां मुसलमानों के लिए आरक्षित की गई थीं और ऊंचे तथा प्रभावशाली पदों पर भी मुसलमानों को प्रतिनिधित्व दिया गया था। परंतु जब वर्ष 1883 में अंग्रेजों के द्वारा राजभाषा अरबी और फारसी को बदलकर अंग्रेजी कर दी गई तो शक्ति और प्रभाव वाले पद मुसलमानों से छीन लिए गए और हिंदू संप्रदाय के लोगों को दिए जाने लगे। हिंदुओं ने नए वातावरण में तेजी से अपना वर्चस्व स्थापित कर लिया। वर्ष 1888 में भारत की कुल आबादी में से मुसलमानों की आबादी 19.7% थी। परंतु मुसलमानों की आबादी के वितरण में राजनीतिक अंतर था। जिसमें संयुक्त प्रांत में 13% से थोड़े ज्यादा, पंजाब में 51% से थोड़े ज्यादा, और बंगाल के विस्तार में करीबन 49.2% जितने थे। इस प्रकार की असमानता के साथ-साथ भारतीय उपमहाद्वीप में रहने वाले मुस्लिम संप्रदाय की स्थिति और संरचना में भी अनेक भेद थे। जैसे कि शिया- सुन्नी, भाषा संबंधी अलगाव और आर्थिक विषमता आदि। ब्रिटिश सरकार ने बंगाली वर्चस्व के नाम पर प्रांतवाद को फैलाया, गैर ब्राह्मण जातियों को ब्राह्मणों के खिलाफ और निचली जातियों को उच्च जातियों के विरुद्ध में खड़ा कर देने के लिए जाति प्रथा का इस्तेमाल किया।

ब्रिटिश सरकार ने संयुक्त प्रांत और बिहार में प्रचलित उर्दू भाषा के स्थान पर हिंदी को राजभाषा के रूप में घोषित कर दिया। अंग्रेजों ने हिंदुओं, मुसलमानों और सिखों को एक दूसरे से अलग समुदाय के रूप में देखा और सांप्रदायिक नेताओं को उनके धर्म के अनुयायियों का प्रतिनिधि माना। ब्रिटिश सरकार ने भारत में सांप्रदायिकता के विकास के लिए प्रेस, पुस्तिकाओं ,पोस्टरों, साहित्य और सार्वजनिक मंच पर सांप्रदायिक विचार और सांप्रदायिक अभियॎन चलाने की छूट दे रखी थी।

भारत में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की स्थापना वर्ष 1885 में हुई थी। इसकी स्थापना के बाद ब्रिटिश सरकार ने राष्ट्रवादी ताकतों को कमजोर करने और मुस्लिम समुदाय का विश्वास जीतने के लिए मुस्लिमों को नौकरियों में आरक्षित सीटें और अलग-अलग सेवाओं में प्राथमिकता तथा दूसरी सुविधाएं देने का फैसला किया। ब्रिटिश सरकार की नीति ने मुसलमानों को इतना लालच दे दिया कि सर सैयद अहमद खान जैसे राष्ट्रवादी व्यक्ति भी अंग्रेजों की बांटो और राज करो की नीति से प्रभावित हो गए थे। जिसकी वजह से सर सैयद अहमद खान ने मुसलमानों को हिंदुओं से दूर रहने और अंग्रेजों से नज़दीकियां बड़ाने के बारे में प्रेरित किया।

ब्रिटिश सरकार ने अपनी बांटो और राज करो की नीति के अनुसार बीसवीं सदी के पहले दशक में ही बंगाल को विभाजित कर दिया था और मुस्लिम लीग जैसे सांप्रदायिक संगठन का निर्माण हुआ ।

1909 में ब्रिटिश सरकार ने भारत में मार्ले मिंटो सुधार अधिनियम लागू किया। इस अधिनियम के चलते मुस्लिमों के लिए पृथक निर्वाचन क्षेत्र की व्यवस्था की गयी। पृथक निर्वाचन क्षेत्र की व्यवस्था के कारण हिंदू और मुसलमानों के बीच में दरार पड गई। वर्ष 1919 में एक और अधिनियम लागू किया गया। जिसकी वजह से दरार और चौड़ी हो गई। सर सैयद अहमद खान की राजनीतिक विचारधारा इस विचार के तहत थी कि भारतीय समाज परस्पर अलग-अलग विरोधी समुदायों का जमघट है, परंतु जब भारत को आजादी मिलेगी तो आजादी के बाद कांग्रेस के नेतृत्व में भारत के सरकार का गठन होगा, ऐसा होने से भारत पर स्वाभाविक रूप से हिंदुओं का वर्चस्व होगा और मुसलमानों को दूसरे दर्जे के नागरिक के रूप में रखा जाएगा। सर सैयद अहमद खान की इस विचारधारा का हिंदू-मुसलमान एकता पर विपरीत असर हुआ और कांग्रेस के अधिवेशन में मुसलमान सदस्यों की संख्या धीरे-धीरे कम होती गई। कांग्रेस के वर्ष 1892 और 1909 के बीच में हुए अधिवेशन में आए हुए प्रतिनिधियों में मुंबई के बदरुद्दीन तैयब को छोड़कर करीब 90% हिंदू प्रतिनिधि थे, और सिर्फ 6.5% प्रतिनिधि मुसलमान थे। कांग्रेस के इस अधिवेशन में आए हुए हिंदुओं में भी करीब 40% ब्राह्मण और बाकी के सवर्ण हिंदू थे। यह सर सैयद अहमद की विचारधारा का विघटनकारी प्रभाव था। उनके विचार नि:संदेह, अवैज्ञानिक और वास्तविकता से विमुख थे। हालांकि हिंदू और मुसलमान भिन्न धर्म है परंतु उनके आर्थिक और राजनीतिक हित अलग नहीं है। अगर हम एक ओर बंगाली मुसलमान और पंजाबी मुसलमान की तुलना करें तथा दूसरी ओर बंगाली मुसलमान और बंगाली हिंदू की तुलना करें तो दोनों में से बंगाली मुसलमान और बंगाली हिंदुओं में सबसे ज्यादा समानता देखने को मिलेगी।

भारत में हिंदू पुनरुत्थानवाद का विकास 19वीं शताब्दी के उत्तरार्ध में उदारवादी आंदोलन को सफलता न मिलने पर होता है। हिंदू पुनरुत्थानवादी आंदोलन ने इस बात का प्रचार किया कि भारतीय समाज और संस्कृति, पुरातन समय में महानता और आदर्श की ऊंचाइयों पर थी, परंतु भारत में मध्यकाल के दौरान मुस्लिम शासकों के प्रभुत्व की वजह से भारत की महानता का निरंतर पतन हुआ। राष्ट्रवादियों ने राष्ट्रीय आंदोलन के शुरुआती चरण में अल्पसंख्यकों को इस बात पर विश्वास दिलाने का प्रयत्न किया कि इस आंदोलन से भारत के सभी लोगों के धार्मिक और सामाजिक अधिकारों की समुचित रक्षा की जायेगी। आरंभिक समय में हिंदू पुनरुत्थानवाद सामाजिक स्वरूप में चल रहा था परंतु थोड़े ही समय में उसने एक राजनीतिक भूमिका तैयार कर ली और धार्मिक प्रतीकों, देवी देवताओं तथा सांस्कृतिक-धार्मिक उत्सव का सहारा लेकर राष्ट्रीय आंदोलन का प्रचारक बन गया। उग्रपंथी विचारधारा अपने राजनीतिक लक्ष्य को हासिल करने के लिए धर्म के व्यापक उपयोग में विश्वास रखती थी। भारत के कुछ गरमपंथी राष्ट्रवादी जैसे कि पंजाब के लाला लाजपत राय, बंगाल के विपिन चंद्र पाल और महाराष्ट्र के बाल गंगाधर तिलक के भाषण और लेख धार्मिक तथा हिंदू रंगत में रंगे हुए दिखाई देते थे। गरमपंथी नेता बाल गंगाधर तिलक ने हिंदुओं को एक साथ लाने के लिए गणपति और शिवाजी के नाम पर धार्मिक उत्सवों का प्रारंभ किया। साथ ही तिलक ने हिंदू संप्रदाय के लोगों को मुस्लिम पर्व और त्योहारों का बहिष्कार करने के विचारों को फैलाया।

आर्यसमाज के द्वारा गौ रक्षा आंदोलन उत्तर भारत में हिंदुओं की राजनीतिक लामबंदी के लिए शुरू किया गया था। इस आंदोलन के बाद से मुस्लिम समुदाय के लोगों के मन में अलग-अलग प्रकार की शंकाओं का उदय हुआ। वर्ष 1893 के गौ हत्या से जुड़े दंगों के बाद हिंदुओं के द्वारा गोवध पर कानूनी रूप से प्रतिबंध लगाने की मांग की गई। इस मांग पर कांग्रेस की खामोशी ने दोनों समुदायों क्रे बीच अविश्वास बढ़ाया और अल्पसंख्यको के मन में भय पैदा कर दिया। बंगाल का हिंदू भद्रलोक अकसर मुस्लिम संप्रदाय के लोगों को अपमान भरी नजर से देखता था जिसकी वजह से हिंदू और मुसलमानों के बीच तनाव का माहौल बन रहा था। असल में हिंदू संप्रदायवाद की स्थापना, 1875 मैं आर्य समाज के शुद्धि आंदोलन के दौरान हुई थी। संयुक्त प्रांत और बिहार में चल रहे हिंदी उर्दू के विवाद की अवधारणा का प्रचार इस प्रकार किया गया कि उर्दू मुसलमानों की भाषा है और हिंदी हिंदुओं की भाषा है। वास्तव में 1870 के तुरंत बाद से हिंदू जमीदारों, सूदखोरों और मध्यवर्गीय पेशेवर लोगों ने मुसलमानों के प्रति विरोध की भावना का प्रचार करना शुरू कर दिया था। वर्ष 1890 के दशक में महाराष्ट्र और पंजाब जैसे इलाकों में

 हिंदुओं ने गोवध के खिलाफ अभियान चलाया गया। गोवध विरोधी अभियान के चलते भारत मैं जगह-जगह पर दंगे हुए।

मुंबई के भीषण दंगों के बाद वर्ष 1893 में महाराष्ट्र में बाल गंगाधर तिलक ने सरकार के मुसलमानों के पक्ष में होने का आक्षेप लगाते हुए, हिंदुओं को गणपति की पूजा के सार्वजनिक त्योहार में हिस्सा लेने के लिए प्रोत्साहित किया और मुसलमानों के मुहर्रम के त्योहार का बहिष्कार करने की अपील की। इस घटना के बाद से भारत के अलग-अलग भागों में दंगे होने की खबर आने लगी। इस तरह धार्मिक पुनरुत्थान वाद और गौ-रक्षा के विवाद में हुए दंगों की वजह से भारत में हिंदुओं और मुसलमानों के बीच एकता और भाईचारे की भावना धुंधली पड गई थी।

हिंदू सांप्रदायिकता के विकास के लिए हिंदू महासभा का महत्वपूर्ण योगदान रहा है। बी.एन मुखर्जी तथा लालचंद्र ने वर्ष 1909 में पंजाब में हिंदू महासभा की स्थापना की थी। लालचंद्र इस बात को लेकर बड़े निराश थे, कि राष्ट्रीय कांग्रेस भारत के सभी लोगों को एक राष्ट्र के रूप में संगठित करने की प्रयास कर रही है। साथ ही राष्ट्रीय कांग्रेस हिंदुओं के लाभों की बलि देकर मुसलमानों को खुश करने का प्रयास कर रहा है। लालचंद्र ने हिंदुओं को कहा था, कि हिंदू सबसे पहले अपने आप को हिंदू माने और फिर भारतीय माने। पंजाब में वर्ष 1911 में हिंदू महासभा ने अमृतसर में एक सम्मेलन का आयोजन किया था। अप्रैल 1915 में अखिल भारतीय हिंदू महासभा के द्वारा प्रथम अधिवेशन का आयोजन कासिम बाजार के महाराजा की उपस्थिति में किया गया। हिंदू महासभा के प्रथम अधिवेशन में बहुसंख्यक समुदाय द्वारा हिंदू राष्ट्रवाद और हिंदू लाभों की मांग करने में आई थी। इस घटना के बाद से मुसलमान समुदाय पर नकारात्मक असर हुई और सांप्रदायिकता का विकास हुआ। मुसलमान संप्रदाय का समर्थन हासिल करने के लिए असहयोग के आंदोलन के साथ मुसलमानों के धार्मिक आंदोलन खिलाफत को जोड़ा गया। खिलाफत आंदोलन के माध्यम से रूढ़िवादी मुसलमानों को राजनीति में प्रवेश ने का अवसर प्राप्त हुआ।

खिलाफत आंदोलन ने मुसलमान के मध्यवर्ग के लोगों में राष्ट्रीय और साम्राज्यवाद के विरोध की भावना को जगाया। परंतु खिलाफत आंदोलन मुसलमानों में धार्मिक राजनीतिक चेतना को उच्च स्तर पर ले जाकर धर्मनिरपेक्ष राजनीतिक चेतना में बदलने में असमर्थ रहा। इसके परिणाम स्वरूप मुस्लिम लीग और कांग्रेस गठबंधन से भारत में सांप्रदायिकता को विकसित होने का मौका मिला। भारत में सांप्रदायिकता के विकास के कारण सबसे ज्यादा नुकसान भारत के आम लोगों को हुआ था। जबकि सांप्रदायिकता के कारण सबसे ज्यादा लाभ दोनों समुदायों के आर्थिक राजनीतिक संभ्रांतो को हुआ था। इस प्रकार ब्रिटिश साम्राज्य के समय में सांप्रदायिकता का विकास आध्यात्मिक अथवा धार्मिक ना होकर राजनीतिक था।

विद्वानों का मत है कि सांप्रदायिकता भारत के राष्ट्रीय एकीकरण की दिशा में सबसे बड़ी बाधा है, क्योंकि यह विचारधारा अन्य समुदायों के विरुद्ध अपने समुदाय की आवश्यक एकता पर ज़ोर देती है।

इस प्रकार सांप्रदायिकता रूढ़िवादी सिद्धांतों में विश्वास, असहिष्णुता और अन्य धर्मों के प्रति नफरत को बढ़ावा देती है, जो कि समाज को विभाजन की ओर अग्रसर करता है।

स्वातंत्र्योत्तर भारत में सांप्रदायिकता –

वर्ष 1949 में भारत के विभाजन ने बड़े पैमाने पर रक्तपात और हिंसा देखी। इसके पश्चात् वर्ष 1961 तक देश में कोई बड़ी सांप्रदायिक घटना नहीं हुई, किंतु वर्ष 1961 में ही जबलपुर दंगे हुए जो कि देश के लिये एक बड़ा सांप्रदायिक झटका था।

1960 के दशक में विशेष रूप से भारत के पूर्वी भाग – राउरकेला (वर्ष 1964), जमशेदपुर (वर्ष 1965) और रांची (वर्ष 1967) में सांप्रदायिक दंगों की एक श्रृंखला शुरू हुई, जिनमें तत्कालीन पूर्वी पाकिस्तान से आए हिंदू शरणार्थियों को बसाया जा रहा था।

सितंबर 1969 में अहमदाबाद में हुए दंगों ने राष्ट्र की अंतरात्मा को हिलाकर रख दिया। इन दंगों का स्पष्ट कारण यह था कि जनसंघ, ​​इंदिरा गांधी के वामपंथी ज़ोर का विरोध करने के लिये मुसलमानों के भारतीयकरण पर एक प्रस्ताव पारित कर रहा था।

अप्रैल 1974 में मुंबई के वर्ली इलाके में जब मुंबई पुलिस ने दलित पैंथर्स की एक रैली को रोकने की कोशिश की तो वहाँ हिंसा शुरू हो गई, जिसने समय के साथ भीषण रूप धारण कर लिया।

अक्तूबर 1984 में इंदिरा गांधी की हत्या के पश्चात् सिख विरोधी दंगे भड़क उठे, जिसमें दिल्ली, उत्तर प्रदेश और भारत के अन्य हिस्सों में तकरीबन 4000 से अधिक सिख मारे गए।

1985 में शाह बानो विवाद और बाबरी मस्जिद-राम जन्मभूमि विवाद 80 के दशक में सांप्रदायिकता को तीव्र करने के लिये शक्तिशाली उपकरण बन गए।

दिसंबर 1992 में बाबरी मस्जिद को दक्षिणपंथी दलों द्वारा ध्वस्त किये जाने के पश्चात् देश में सांप्रदायिक दंगे अपने चरमोत्कर्ष पर पहुँच गए।

वर्ष 2002 में गोधरा स्टेशन पर साबरमती एक्सप्रेस के एक डिब्बे में लगी आग में कई कार सेवकों की मौत हो गई, जिसके कारण देश में गुजरात दंगों की शुरुआत हुई और लगभग 1000 से अधिक लोग मारे गए।

सितंबर 2013 में उत्तर प्रदेश में हाल के इतिहास की सबसे भयानक हिंसक घटनाएँ दर्ज की गईं, जब मुज़फ्फरनगर ज़िले में हिंदू और मुस्लिम समुदायों के बीच मतभेद ने सांप्रदायिकता का रूप ले लिया।

वर्ष 2015 से देश में माॅब लिंचिंग (Mob Lynching) की घटनाएँ काफी तेज़ी से बढ़ी हैं और आँकड़ों के अनुसार इसके कारण अब तक 90 से अधिक लोगों की मौत हो चुकी है।

दिल्ली में हुए हालिया सांप्रदायिक दंगों ने एक बार पुनः देश में विभिन्न धर्मों के बीच गहराती जा रही खाई को उजागर किया है। दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र के केंद्रबिंदु में हुए दंगों में 50 से अधिक लोग मारे गए हैं।

सांप्रदायिकता के कारण

सोशल मीडिया का प्रभाव

देश में फेक न्यूज़ के तीव्र प्रसार से सांप्रदायिकता को बढ़ावा देने में सोशल मीडिया ने महत्त्वपूर्ण भूमिका अदा की है। सोशल मीडिया हिंसा के माध्यम से दंगों और हिंसा के ऑडियो-विज़ुअल का प्रसार काफी सुगम और तेज़ हो गया है। हिंसा से संबंधित ये अमानवीयता ग्राफिक चित्रण आम जनता में अन्य समुदायों के प्रति घृणा को और बढ़ा देते हैं।

मुख्यधारा की मीडिया की भूमिका

पत्रकारिता की नैतिकता और तटस्थता का पालन करने के स्थान पर देश के अधिकांश मीडिया हाउस विशेष रूप से किसी-न-किसी राजनीतिक विचारधारा के प्रति झुके हुए दिखाई देते हैं, जो बदले में सामाजिक दरार को चौड़ा करता है।

राजनीतिक कारण

वर्तमान समय में विभिन्न राजनीतिक दलों द्वारा अपने राजनीतिक लाभों की पूर्ति के लिये सांप्रदायिकता का सहारा लिया जाता है। एक प्रक्रिया के रूप में राजनीति का सांप्रदायीकरण भारत में सांप्रदायिकता को बढ़ावा देने के साथ-साथ देश में सांप्रदायिक हिंसा की तीव्रता को बढ़ाता है।

मूल्य-आधारित शिक्षा का अभाव

भारतीय लोगों में आमतौर पर मूल्य-आधारित शिक्षा का अभाव देखा जाता है, जिसके कारण वे बिना सोचे-समझे किसी की भी बातों में आ जाते हैं और अंधानुकरण करते हैं।

आर्थिक कारण

विकास का असमान स्तर, वर्ग विभाजन, गरीबी और बेरोज़गारी आदि कारक सामान्य लोगों में असुरक्षा का भाव उत्पन्न करते हैं। असुरक्षा की भावना के चलते लोगों का सरकार पर विश्वास कम हो जाता है, परिणामस्वरूप अपनी ज़रूरतों/हितों को पूरा करने के लिये लोगों द्वारा विभिन्न राजनीतिक दलों, जिनका गठन सांप्रदायिक आधार पर हुआ है, का सहारा लिया जाता है।

मनोवैज्ञानिक कारण

दो समुदायों के बीच विश्वास और आपसी समझ की कमी या एक समुदाय द्वारा दूसरे समुदाय के सदस्यों का उत्पीड़न आदि के कारण उनमें भय, शंका और खतरे का भाव उत्पन्न होता है। इस मनोवैज्ञानिक भय के कारण लोगों के बीच विवाद, एक-दूसरे के प्रति नफरत, क्रोध और भय का माहौल पैदा होता है।

सांप्रदायिक हिंसा का प्रभाव

सांप्रदायिक हिंसा के दौरान निर्दोष लोग अनियंत्रित परिस्थितियों में फँस जाते हैं, जिसके कारण व्यापक स्तर पर मानवाधिकारों का हनन होता है।

सांप्रदायिक हिंसा के कारण जानमाल का काफी अधिक नुकसान होता है।

सांप्रदायिक हिंसा वोट बैंक की राजनीति को बढ़ावा देती है और सामाजिक सामंजस्य प्रभावित होता है। यह दीर्घावधि में सांप्रदायिक सद्भाव को गंभीर नुकसान पहुँचाती है।

सांप्रदायिक हिंसा धर्मनिरपेक्षता और बंधुत्व जैसे संवैधानिक मूल्यों को प्रभावित करती है।

सांप्रदायिक हिंसा में पीड़ित परिवारों को इसका सबसे अधिक खामियाज़ा भुगतना पड़ता है, उन्हें अपना घर, प्रियजनों यहाँ तक कि जीविका के साधनों से भी हाथ धोना पड़ता है।

सांप्रदायिकता देश की आंतरिक सुरक्षा के लिये भी चुनौती प्रस्तुत करती है क्योंकि सांप्रदायिक हिंसा को भड़काने वाले एवं उससे पीड़ित होने वाले दोनों ही पक्षों में देश के ही नागरिक शामिल होते हैं।

संपर्क: 34/242, सेक्‍टर-3, प्रतापनगर, जयपुर-302033

मो. 7838897877

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