शशिकांत गुप्ते
एक कहावत है कि, मछली के आँसू दिखाई नहीं देतें हैं। इस कहावत से यह स्पष्ट हो जाता है कि,मछली भी संवेदनशील होती है।
घड़ियाल के आँसू नकली होतें हैं।
यह एक स्वाभाविक प्रक्रिया है। जो प्राणी दूसरें प्राणियों का भक्षण करता हो,वह निश्चित ही निष्ठुर ही होता है। चिकित्साविज्ञान के अनुसार बहुत से मांसाहारी जीव, जब किसी प्राणी का भक्षण करतें हैं, तब उनके जबड़े आपस में दब जातें हैं। जबड़ों के आपस में जोर से दबने से मांसाहारी प्राणियों के आँखों से स्वाभाविक ही पानी निकल पडता है। इसे ही नकली आँसू मतलब घड़ियाली आँसू (Crocodile Tears) कहतें हैं।
इस कहावत का प्रयोग मानव किसी निष्ठुर मानव के लिए व्यंग्य के रूप में करता है। निष्ठुर मतलब बेरहम,कठोर,और निर्दयी, होता है। ऐसा व्यक्ति कभी भी दयावान, और करुणामय होना असंभव है।
भुलेभटके ऐसे व्यक्ति की आँखों में आँसू आ भी जाएं तो वे आँसू घड़ियाली आँसू ही कहलाएंगे।
यह भी एक कहावत है, मछली के आसूँ दिखाई नहीं देतें हैं।
इस कहावत को हम प्रत्यक्ष चरितार्थ होतें देख रहें हैं।
देश का आमजन बेरोजगारी महंगाई और आर्थिक संकट से जूझ रहा है।
आमजन उक्त संकटों से त्रस्त होने पर बहुत दुःखी है लेकिन उसके आँसू दिखाई नहीं दे रहें हैं? इसलिए उक्त कहावत चरितार्थ होतें स्पष्ट दिख रही है।
इसका प्रत्यक्ष उदाहरण है, वर्तमान दौर की सियासत में सियासी दल का आम कार्यकर्ता उदासीन है। आम कार्यकर्ता के उदासीन होने के दो मुख्य कारण है। एक तो आम कार्यकर्ता अब समझने लगा है कि,सियासी दल उसका शोषण कर रहें हैं। क्या वह जाजम बिछाने, पंडाल में कुर्सियां सजाने और सड़क पर दल के समर्थन में नारे लगाने के लिए ही अभिषप्त है?
कबतक वह अभिषप्त रहेगा? कबतक हर चुनाव में पैराशूट नामक विकसित संस्कृति से उतरकर कोई भी नया चेहरा उम्मीदवार बनता रहेगा,और आम कार्यकर्ता की उम्मीद पर पानी फिरता रहेगा?
आम कार्यकर्ता की उदासीनता का दूसरा कारण है, आम कार्यकर्ताओं को देश के आमजन की बुनियादी समस्याओं का सामना करना पड़ता है?
आम कार्यकर्ताओं के पास कोई भी ठोस जवाब होता नहीं है। कारण वह सरकार की विफलताओं का जवाब देने में असमर्थ होता है। आम कार्यकर्ता यह कहकर भी अपना पलड़ा झाड़ नहीं सकता है कि,जो चुनावी वादें थे वे सिर्फ चुनावी जुमले थे।
आम कार्यकर्ता को साक्षात रूप से आमजनता के बीच रहना पड़ता है।
बेचारा मछली के आँसू दिखाई नहीं देतें हैं, इस कहावत को चरितार्थ करता है।
यह भी सत्य है कि, हर किसी के सहनशक्ति की सीमा होती है।
पड़ौसी देश श्रीलंका का उदाहरण स्पष्ट दिखाई दे रहा है।
वहाँ आमजन की सहनशक्ति समाप्त हो गई?
भारत और अन्य देशों में अंतर है।
भारत में अहिंसक तरीके से परिवर्तन होता है। अहिंसक मतलब Ballot अर्थात मतदान के द्वारा परिवर्तन होता है।Bullet के मतलब गोली के द्वारा कभी भी नहीं।
श्रीलंका की स्थिति पड़ौसियों के लिए एक सबक है। पूंजी,सत्ता और व्यक्ति केंद्रित राजनीति का हश्र यही होता है?
इसीलिए इस कहावत को सिर्फ कहावत के रूप में प्रयोग करने तक सीमित नहीं रखना चाहिए कि, मछली के आँसू दिखाई नहीं देतें हैं त्रासदी सहन करने की पराकाष्ठा होने पर कोई भी प्राणी विद्रोह कर सकता है। विशालकाय हाथी के कान में एक अति सूक्ष्म जीव, चींटी भी घुस जाए तो वह हाथी को भी तांडव नृत्य करने के लिए बाध्य कर देती है।
यह समझना जरूरी है कि, घड़ियाली आँसू असली नहीं होतें है। लेकिन मछली के आँसू भलेही दिखाई न दे, मछली के आँसू संवेदना के प्रतीक अवश्य होतें हैं।
शशिकांत गुप्ते इंदौर





