
इंदौर
अब आपसे क्या कहूं और कैसे? हमने वो दौर देखा है, जो शायद आज के इंदौरी बच्चे सोच भी नहीं सकते। मुझे अच्छे से ध्यान है कि शीतला माता बाजार में झांकी देखने के लिए बुकिंग कराना पड़ती थी। बुकिंग से मतलब कोई पैसा देकर नहीं। बल्कि अपने नाते-रिश्तेदारों को बता देते थे कि चतुर्दशी की झांकी देखने हम इतने लोग घर से आएंगे। हमारी जगह पक्की रखना, और किसी को हामी मत भर देना… यह कहते-कहते मल्हारगंज के रहने वाले शेखर गिरी उन पुरानी यादों में खो जाते हैं।
रिपोर्टर ने जब उनसे पूछा कि क्या सचमुच ऐसा होता था। वे कहते हैं कि आप बुकिंग की बात करते हो! चाय, कचौरी, भजिए, गुब्बारे, बांसुरी, खिलौने के खोमचे वाले भी एक महीने पहले तैयारी करते थे और ठिया ढूंढने निकल जाते थे। अब वह सब खत्म हो गया। हुड़दंग हावी हो गया है। बस आज के लिए यही कह सकता हूं। हां एक बात और। अब पूरे इलाके कमर्शियल हो गए हैं, इसलिए भी झांकी के दीवानों के लिए वो ठिए खत्म हो गए।
हम आज आपको इंदौर के उस दौर में फिर इसलिए लेकर जा रहे हैं क्योंकि दो साल बाद आज फिर इंदौर में रतजगा होगा। अनंत चतुर्दशी के लिए पूरा शहर तैयार है और झांकियों के साथ उनके देखने वाले भी तैयार हैं। इंदौर में 98 साल से झांकियों का कारवां निकलता आ रहा है। मिलों की झांकी का अपना अंदाज हुआ करता था।
शुरुआत में जुलूस में बैलगाड़ी और गैस बत्ती होती थीं, फिर आकर्षक बैण्ड और इलेक्ट्रिक लाइटिंग इस्तेमाल होने लगी। पांच दशक पहले झांकियों में लाइटिंग के साथ बैण्ड का क्रेज था।
लाइट खराब हो गई या ट्रैक्टर बिगड़ गया तो ठीक होते-होते लग जाते थे दो घंटे
मिल मजदूर परिवार से जुड़े 62 साल के शिव गुप्ता बताते हैं कि तब मिलें चालू होने के दौरान सारे मजदूर 10 दिनों तक झांकियां बनाने में सहयोग करते थे। उनमें जोश रहता था और वे झांकियों के साथ-साथ चलते थे। जेल रोड पर हालत यह हो जाती थी कि सिर्फ सिर ही सिर नजर आते थे। ट्रैक्टर या लाइट खराब होने पर दो-दो घंटे लग जाते थे। तब मोबाइल तो होते नहीं थे, लोगों को पता ही नहीं चलता कि झांकियां आगे क्यों नहीं बढ़ रही हैं। फिर भी लोग इंतजार करते थे। तब प्रदेश के ही नहीं बाहर के लोग भी बसों की छतों पर बैठकर झांकियां देखने आते थे। पहले अनंत चतुर्दशी के दिन 24 घंटे टॉकीज संचालित होते थे। झांकी मार्ग पर रहने वाले लोग बाहर ही अपनी दुकानें लगाकर व्यवसाय करते थे, जिससे उन्हें काफी मदद मिलती थी।
बैलगाड़ी से एक दिन पहले आकर ठिये तय कर लेते थे
खजूरी बाजार निवासी जोगेश्वर (55) ने बताया कि तब एक दिन पहले लोग बैलगाड़ी से इंदौर आ जाते थे और यहां रहने वाले रिश्तेदारों के घरों के दरवाजों, खिड़कियों, ओटलों और फुटपाथों पर बैठकर झांकियों के लिए रतजगा करते थे। फुटपाथ पर कब्जा कर लेते थे। इसमें बहुत मशक्कत होती थी क्योंकि पता ही नहीं चल पाता था कि किस जगह पर कौन पहले से बुकिंग कर चुका है। पर तब विवाद नहीं होते थे। अब जनसंख्या बढ़ने से भीड़ भी बढ़ी है लेकिन जुलूस का स्वरूप भी बदल गया है।
पहले भावनात्मक लगाव था, अब ठिये ही खत्म हो गए
पूर्व पार्षद प्रेम खडायता (66) बताते हैं कि पहले लोगों का झांकियों से भावनात्मक जुड़ाव था। ग्रामीण क्षेत्रों से लोग आकर यहां पहले से ओटलों पर बैठ जाते थे। पहले झांकी मार्ग पर रहने वाले लोग परिचितों को बैठने के लिए जगह देते थे। तब परिवार बड़े होते थे और वे दूर-दूर से सभी को झांकियां दिखाने ले जाते थे। लोग दरवाजों और खिड़कियों के पास बैठकर या खड़े होकर रातभर झांकियां निहारते थे। पहले एक झांकी को बनाने में एक माह लग जाता था। अब तो स्मार्ट सिटी प्रोजेक्ट के पहले ही अधिकांश रहवासी क्षेत्र कमर्शियल हो गए। आधुनिकता के नाम समारोह में डीजे बजने लगे। कई लोग इसमें नशा कर शामिल होते हैं। इससे दूर रहने वाले लोगों का आना तो बंद ही हो गया क्योंकि बैठकर देखने के ठिये भी खत्म हो गए हैं।
सड़क पर बनती थी दाल-बाटी
बैलगाड़ी से एक दिन पहले इतवारिया, छत्रीपुरा, बियाबानी इलाका, नृसिंह बाजार में लोग डेरा जमा लेते थे। खाना भी वहीं सड़क, ओटले पर बनता था। अपने साथ ही कंडे और पूरा राशन लाते थे। जगह-जगह कंडों के अलाव जलने लगते थे और उन पर ही बाटियां सेंकी जाती थीं। दाल उबालने के लिए ईंट के चूल्हे बना लेते थे।
पहले ऐसा लगता था जैसे कोई मेला लगा हो
व्यवसायी राजू सागर (59) ने बताया कि पहले देहात के लोग झांकियां देखने आते थे और ऐसा लगता था जैसे कोई मेला लगा हो। अब तो केवल रात को ही माहौल बनता है लेकिन फिर भी अभी भी माहौल काफी अच्छा बनता है। इस परम्परा को जीवित रखने के लिए नेताओं को विचार करना चाहिए, उन्हें तन-मन-धन से सहयोग करना चाहिए।
झाकियों में देवी-देवताओं की विशाल मूर्तियां हुआ करती थीं। इन्हें देखने के लिए प्रदेश के बाहर से भी लोग आते थे।
बालकनी में भी रहता था जमावड़ा
झांकियों में सात दशकों से बैण्ड संचालित करने वाले श्याम बैण्ड के संचालक मोहनलाल गोडगे (77) ने बताया कि पहले लोग शांति से बैठकर झांकियां निहारते थे। अब तो बैठने की व्यवस्था ही नहीं है क्योंकि ओटले खत्म हो गए। दरवाजे, खिड़कियों, बालकनी में जमावड़ा रहता था। इस बार भी झांकियों में 100 लोगों की टीम है। दो साल बाद झांकियां निकल रही हैं इसलिए लोगों में इस बार काफी उत्साह है।
अब के दौर में सड़कों पर भारी भीड़

जुलूस में झांकी निकलने के वक्त भारी संख्या में लोग इकट्ठा होते थे। ओटलों, दरवाजों, खिड़कियों और बालकनी झांकी देखने के ठीये थे।
हुकुमचंद मिल: इंदौर का पहला गणेशोत्सव, पहली झांकी
इंदौर में सबसे पहले सेठ हुकुमचंद ने 1914 में गणेश प्रतिमा विराजित की। उन्होंने जब मिल चालू की, तभी से मिल में गणेशोत्सव मनाया जाने लगा। इसके 10वें साल 1924 में अनंत चतुर्दशी पर झांकियां निकालने की परंपरा इंदौर में यहीं से शुरू हुई। हुकुमचंद मिल गणेश उत्सव समिति के पदाधिकारी नरेंद्र श्रीवंश ने पिछले साल बताया था कि 1924 में सेठ हुकुमचंद ने बैलगाड़ी पर सबसे पहली झांकी निकाली। रोशनी लालटेन से की। झांकी मिल से कृष्णपुरा पुल तक निकाली गई थी। हुकुमचंद मिल का यह 98वां साल है। वक्त के साथ झांकियों का स्वरूप भी बदलता गया।
मालवा मिल: नवग्रह झांकी की चर्चा अब भी
मालवा मिल गणेशोत्सव समिति का यह 89वां साल है। हुकुमचंद की झांकी निकलने के करीब 10 साल बाद ही मालवा मिल की भी झांकी बनने लगी। समिति अध्यक्ष कैलाश कुशवाह बताते हैं कि 1972 से वह झांकियां बनवा रहे हैं। 300 से ज्यादा कलाकार और कर्मचारी 3 महीने पहले ही तैयारी शुरू कर देते हैं। हमारी कोशिश होती है झांकियों से समाज को संदेश देना। यही वजह है कि इन 33 सालों में मिल को कई बार पहला, दूसरा और तीसरा पुरस्कार मिल चुका है। नवग्रह की रथ वाली झांकी अब तक की सबसे चर्चित झांकी है। मालवा मिल 2003 में बंद हो गई। लेकिन, झांकी बराबर बनाई जाती रही है। कैलाश बताते हैं झांकी बनाने में अब 6 से 7 लाख का खर्च आता है। लोगों के अलावा IDA, नगर निगम, विधायक रमेश मेंदोला की मदद से कोई मुश्किल नहीं आती।
स्वदेशी मिल: 1960 के बाद गाड़ियों का चलन
स्वदेशी मिल गणेश उत्सव समिति पदाधिकारियों ने बताया झांकी निकालते हुए 92 साल हो गए हैं। पहले बैलगाड़ी पर झांकी निकाली जाती थी। 1960 के बाद गाड़ियों का चलन शुरू हुआ और छोटी-छोटी गाड़ियों पर 10 से 12 फीट लंबी झांकियां निकाली जाने लगे। इसके बाद झांकियों का और स्वरूप बदलता गया और अब 40-40 फीट की गाड़ियों पर झांकियां निकाली जाने लगी।
कल्याण मिल: मजदूर देते थे एक दिन का वेतन
कल्याण मिल गणेश उत्सव समिति के पदाधिकारियों ने बताया झांकियां निकालते हुए 88 साल हो गए हैं। 1950 के पहले बैलगाड़ियों को सजाया जाता था। कंडिल लगाए जाते थे। बैलगाड़ियों पर भजन मंडिलयां भजन गाते हुए निकलतीं थी। इसके बाद गाड़ियों का दौर आया। आस्था ऐसी कि 1977 में इमरजेंसी के वक्त भी झांकियां निकाली गईं। तब रात 12 से पहले झांकियां वापस मिलों में पहुंचा दी गईं। राजबाड़ा से झांकियों को वापस लेकर आए थे। 1980 तक गणेश उत्सव में मिल में बड़े-बड़े आयोजन हुआ करते थे। मिल जब चालू रहती तो मजदूर झांकी बनाने के लिए एक दिन का वेतन देते थे।
राजकुमार मिल: कर्मचारी बनाते थे झांकी
राजकुमार मिल गणेश उत्सव समिति ने बताया कि झांकी निकालते हुए 78 साल हो चुके हैं। जब मिल चालू थी, तब झांकी मिल के कर्मचारी और कलाकार मिलकर बनाते थे। झांकी बनाने में मिल से ही कपड़े का इस्तेमाल होता था। मैनेजमेंट के लोग खुद इसमें ध्यान देते थे। बाद में जब मिल बंद हुई तो 2001 में लोगों, दुकानदारों और जनप्रतिनिधियों का सहयोग मिला और 1 लाख जमा हो गए। इसके बाद IDA, नगर निगम भी मदद करने लगा।
…और ऐसे सबसे पहले नेतृत्व करने लगी खजराना गणेश की झांकी
मिलों की झांकियों के बीच 2006 से खजराना गणेश मंदिर की झांकी निकलना शुरू हुई। मंदिर के पुजारी पंडित अशोक भट्ट के मुताबिक उन्होंने ही उस वक्त के कलेक्टर विवेक अग्रवाल से खजराना गणेश मंदिर की झांकी निकालने की बात कही थी। मंदिर प्रबंधन समिति की बैठक में इसका प्रस्ताव रखा गया और खजराना गणेश मंदिर की झांकी की शुरुआत हुई। पंडित भट्ट के मुताबिक जिस प्रकार उज्जैन में बाबा महाकाल की सवारी निकलती है। उस प्रकार खजराना गणेश जी का भी चल समारोह निकले ये मन में यह विचार आया था। 2006 से लेकर अभी तक खजराना गणेश मंदिर की झांकी अन्य झांकियों का नेतृत्व करते हुए सबसे आगे चलती है। उनका कहना है कि गणेश जी प्रथम पूजनीय है खजराना गणेश मंदिर की झांकी सबसे आगे रहती है।





