मुनेश त्यागी
आदिम साम्यवाद की समाज व्यवस्था में, उस समय के अनुसार, औरतों की स्थिति काफी बेहतर थी। उस समय औरतों का राज चलता था। औरतें ही परिवार की मुखिया होती थीं। उस समय उनके साथ शोषण और जुल्म और अन्याय की घटनाएं नहीं होती थी और उस समय मातृसत्तात्मक समाज था, यानी औरतें ही घर की मुखिया होती थीं।
हजारों साल बाद समाज व्यवस्था बदली और सामंती व्यवस्था कायम हो गई। सामंती समाज में औरतें निम्न स्थिति में पहुंच गईं। उनसे सारे हक और अधिकार छीन लिए गए और वे बहुत सारे अन्याय और शोषण का शिकार बना दी गईं। इस व्यवस्था में औरतों की स्थिति काफी बदल गई। अब समाज में पितृसत्तात्मक व्यवस्था और सोच कायम हो गई थी और उन्होंने औरतों को लगभग गुलाम बना लिया था। घर की चारदीवारी में बंद कर दिया था और औरत को मनोरंजन का सामान और उपभोग की वस्तु बना दी थी और उन्हें एक घरेलू कामगार बना दिया।
इसके हजारों बाद समाज में परिवर्तन हुआ, पूंजीवादी व्यवस्था कायम हुई। इस व्यवस्था में औरतों को कुछ अधिकार मिले। कुछ औरतें नौकरी करने लगीं औरतों के लिए समता और समानता के विचार भी आए। पूंजीवादी देशों में यह मामला आज भी चल रहा है। पर अब हम देखते हैं कि अंतिम रूप से ये सारे नौकरी, समता, समानता के विचार कार्यान्वित नहीं हो पाए हैं। अब सामंतवादी, पूंजीवादी और सांप्रदायिक विचारधारा के कॉकटेल ने औरतों की स्थिति को बहुत बुरे मुकाम पर पहुंचा दिया है।
आज पूंजीवादी व्यवस्था में दिए गए अधिकारों को लगभग नकार दिया गया है। आज बहुत सारी औरतें उपभोग की वस्तु और मनोरंजन का सामान होकर रह गई हैं। वे कोठों का श्रंगार बन गई हैं, उन्हें छेड़ा जाता है, उन्हें सताया जाता है उन्हें जलाया जाता है, उनके साथ नाना प्रकार के अत्याचार और अपराध किए जाते हैं। उन्हें दान और दहेज में लिया और दिया जाता है। दान, दहेज और अपराधों की इन तमाम परिस्थितियों ने औरतों की स्थिति को बहुत हद तक असुरक्षित बना दिया है।
पूंजीवादी व्यवस्था के बाद समाजवादी व्यवस्था का आगमन होता है। इस व्यवस्था की सोच और मानसिकता ने औरतों को आदमी के बराबर अधिकार दिए। 1917 की रूसी क्रांति के बाद औरतों को बराबरी का अधिकार दिया गया, शिक्षा का अधिकार दिया गया, रोजी-रोटी का अधिकार दिया गया, उनके लिए रोजगार और नौकरी की व्यवस्था की गई और इस समाज में सबको शिक्षा, सबको काम, का नारा लागू किया गया।
समाजवादी व्यवस्था और समाजवादी समाज जैसे रूस, चीन, वियतनाम, उत्तरी कोरिया, पूर्वी यूरोप के देश, क्यूबा आदि में शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार की स्थिति औरतों के लिए काफी मुफीद है, उनके लिए लाभदायक है। इस व्यवस्था में औरतों को आदमी के बराबर अधिकार दिए। वेतन में समानता का, काम के घंटों का नियमितिकरण और औरतों के लिए शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार, खेल, संस्कृति, गीत, कविता लेखन और सांस्कृतिक कार्यक्रमों की जैसे बाढ़ से आ गई और देखते ही देखते रूस औरतों के मामले में दुनिया की सबसे बेहतरीन व्यवस्था बन गई और औरतों को लेकर यही कामना और सोच लगभग सारे समाजवादी देशों में कायम की गई। सही मायनों में औरतों का सबसे ज्यादा विकास इस समाजवादी व्यवस्था में ही हुआ है।
समाजवादी व्यवस्था में औरत के हित में बनाए गए अधिकारों की नकल कई सारे पूंजीवादी मुल्कों में भी की गई और वहां भी औरतों को कई सारे अधिकार दिए गए, मगर आज के सामंती, पूंजीवादी और सांप्रदायिक व्यवस्था के कॉकटेल ने औरतों की दुनिया को लगभग नरक में बदल दिया है। औरतों को आज फिर से उपभोग और मनोरंजन का सामान समझा जाता है। उनके लिए नौकरियों के अवसर कम हैं, वेतन में समानता नही है, उनको छेड़ा जाता है, सड़कों पर चलना लगभग दूभर कर दिया गया है। स्थिति यहां तक खराब हो गई है कि आज कोई दिन नहीं जाता जिसमें औरतों के खिलाफ शोषण, दमन और हत्या जैसे अपराध नहीं किए जाते।
धर्म के नाम पर उन पर बुर्का, पर्दा, घूंघट, हिजाब आदि थोप दिए गए हैं। वे अपनी पसंद के कपड़े नहीं पहन सकतीं, अपनी पसंद का अपना जीवन साथी नहीं सुन सकती हैं। इस सबके लिए उन्हें लड़ना पड़ रहा है, गोली खानी पड़ रही है, मगर धर्म की सत्ता वाला पितृसत्तात्मक समाज उनको आधुनिक बुनियादी अधिकार और आजादियां देने को तैयार नहीं है। ईरान में चल रहा आंदोलन इसका एक ज्वलंत उदाहरण है। आज लंबे संघर्ष के बाद हासिल किए गए औरतों के अधिकारों को लगातार छीना जा रहा है। उनका सड़कों पर चलना मुश्किल हो गया है। दान दहेज की समस्याओं समस्याएं औरतों को घेरे हुए हैं। नौकरी सुदा औरतों की समस्याएं, जलते हुए सवालों के रूप में हमारे सामने हैं। उनका काम करना लगभग दूभर हो गया है। न्याय व्यवस्था भी उनके साथ न्याय नहीं कर रही है। सरकार और पुलिस अपनी भूमिका नहीं निभा रही हैं और वे असंवेदनशील व्यवस्था बनकर करोड़ों औरतों के सामने खड़ी हो गई हैं।
यही पर सबसे अहम सवाल उठता है कि ऐसे में क्या किया जाए? औरतों में मौजूद डर की मानसिकता और सोच की स्थिति बदलने के लिए और समाज में उन्हें सुरक्षा देने के लिए आज “एक नये समाज और नए आदमी” का निर्माण करने की जरूरत है, जिसमें औरतों को मां, बहन, बेटियों, बहुओं, साथी और दोस्तों के रूप में मान्यता दी जाएगी और बेटे बेटियों में भेदभाव नहीं किया जाएगा। उनको नौकरियां दी जाएंगी, उनको रोजगार दिया जाएगा। उनको शिक्षा और स्वास्थ्य मिले, सबको रोटी कपड़ा मकान शिक्षा स्वास्थ्य मिले, यह आज की सबसे बड़ी जरूरत है। इसी के साथ उनकी कार्य दशाओं में सुधार हो। उनकी कार्य दशा को सुधारने, उनकी हिफाजत के लिए उनकी सुरक्षा के नियम कानूनों को लागू किया जाए, औरतों की सुरक्षा के लिए जो कानून किताबों की धूल चाट रहे हैं उन्हें समुचित रूप से धरती पर उतारा जाये, समान काम का समान वेतन मिले, घर और बाहर सुरक्षा की गारंटी दी जाए।
इसमें पूरे समाज, कानून, सरकार और अधिकारियों को आगे आना पड़ेगा। उन्हें औरतों को जीने लायक माहौल उपलब्ध कराना पड़ेगा। सरकार और सरकारी अधिकारियों को, पुलिस को और न्याय व्यवस्था को, न्यायिक अधिकारियों को और वकीलों को, मानवीय और संवेदनशील बनाए जाने की जरूरत है, क्योंकि जब तक यह औरत विरोधी और मानव विरोधी व्यवस्था, संवेदनशील नहीं होगी, औरतों के प्रति अपनी जिम्मेदारी को नहीं समझेगी और उनके लिए बनाए गए कानूनों को लागू नहीं करेंगे, उनको सुरक्षा प्रदान नहीं करेंगे, और उन्हें पूरा मान सम्मान नहीं देंगे, और उन्हें एक स्वतंत्र व्यक्तित्व नहीं समझा जाएगा, तब तक औरतों की स्थिति सुधरने वाली नहीं है और उन्हें पर्याप्त सुरक्षा नहीं मिलने वाली है।
यहां पर हम जोर देना चाहेंगे कि समाजवादी व्यवस्था, मानसिकता और सोच ही औरतों को आगे बढ़ने के पर्याप्त और सुरक्षित अवसर प्रदान कर सकती है। यही व्यवस्था, सोच और मानसिकता ही, आदमियों के साथ औरतों का उद्धार और कल्याण कर सकती है क्योंकि इतिहास गवाह है कि समाजवादी व्यवस्था ने अभी तक के मानव समाज में औरतों को सबसे ज्यादा सुविधाएं मुहैया कराई हैं।
आज हमारे देश, समाज और लोगों को समाजवादी देशों की औरतों की तरह, औरतों को महफूज रखने वाली सोच और मानसिकता से सीखने की जरूरत है, एक मानवीय, अन्याय रहित और शोषण रहित व्यवस्था ही औरतों को सुरक्षा प्रदान कर सकती है और औरतों की मुकम्मल सुरक्षा, केवल समाजवादी व्यवस्था समाजवादी सोच और समाजवादी मानसिकता ही कायम कर सकती है।





