सामाजिक कार्यकर्ता और स्वतंत्रता सेनानी अमरनाथ विद्यालंकार का जन्म 8 दिसंबर 1901 को
अविभाजित पंजाब में हुआ था। उन्होंने न केवल भारतीय स्वतंत्रता संग्राम सेनानी के तौर पर अंग्रेजों
से देश को आजादी दिलाने में अहम भूमिका निभाई बल्कि पत्रकार, सामाजिक कार्यकर्ता, किसान
हितैषी और सांसद के रूप में भी सामाजिक उत्थान में महत्वपूर्ण योगदान दिया। विद्यालंकार की
शिक्षा आर्य समाज शैक्षणिक संस्थान में हुई। शिक्षा पूरी करने के बाद विद्यालंकार असहयोग
आंदोलन में शामिल हो गए। जब लाला लाजपत राय ने ‘सर्वेंट ऑफ द पीपुल्स सोसायटी’ की स्थापना
की तो विद्यालंकार के साथ लाल बहादुर शास्त्री, बलवंतराय मेहता और कई अन्य इस संगठन के
सदस्य बन गए। लाला लाजपत राय ने अमरनाथ विद्यालंकार को लाहौर नेशनल कॉलेज में इतिहास
पढ़ाने का दायित्व सौंपा जहां भगत सिंह और उनके साथी भी पढ़ा करते थे। नेशनल कॉलेज बंद होने
के बाद लाला लाजपत राय ने अमरनाथ विद्यालंकार को हिसार भेजा ताकि दूरदराज के क्षेत्रों में
अकाल पीड़ित लोगों की सहायता की जा सके। इस बीच वह अकाल मंे पीड़ितों की सेवा के साथ-
साथ श्रमिकों को संगठित करने का कार्य भी करते रहे। उन्होंने हरियाणा में मजदूर आंदोलन चलाने
में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। उन्होंने कुछ सहयोगियों के साथ मिल कर पंजाब के गांवों में
किसान विद्यालय खोले। उन्होंने अनेक श्रमिक सम्मेलनों में भारत के प्रतिनिधिमंडल का नेतृत्व भी
किया। इतना ही नहीं, वह पत्रकारिता के माध्यम से भी आजादी के आंदोलन को आगे बढ़ाने का काम
करते रहे और पंजाब केसरी साप्ताहिक का संपादकीय दायित्व भी निभाते रहे। गोलमेज सम्मेलनों की
असफलता पर संपादकीय के कारण विद्यालंकार को 1931 में दो वर्ष के लिए जेल भेज दिया गया।
भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान भी विद्यालंकार को दो साल जेल की सजा सुनाई गई थी। 1947 में
विभाजन पर उन्होंने लोगों की सहायता के लिए बचाव दल बनाए। आजादी के बाद भी वह राष्ट्र की
सेवा के लिए लगातार सक्रिय बने रहे और काम करते रहे। स्वतंत्रता के बाद वह 1957 से 1962 तक
पंजाब सरकार में मंत्री रहे और तीन बार लोकसभा के सांसद भी चुने गए। अमरनाथ विद्यालंकार ने
अनेक पुस्तकों की रचनाएं भी कीं। मातृभूमि के महान सपूत अमरनाथ विद्यालंकार का 21 सितंबर
1985 को निधन हो गया। n
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बाघ को मार गिराने पर
लोकप्रिय हुए थे जतीन्द्रनाथ मुखर्जी

जन्म : 7 दिसंबर 1879, मृत्यु : 10 सितंबर 1915
ब्रिटिश शासन के खिलाफ लड़ने वाले एक बहादुर क्रांतिकारी जतीन्द्रनाथ मुखर्जी का जन्म अविभाजित
बंगाल के नादिया जिले में 7 दिसंबर 1879 को हुआ था। उन्होंने महज 27 साल की उम्र में एक बाघ
को मार गिराया था और अपनी बहादुरी से गांव वालों को बचाया था। इस घटना के बाद वह बाघा
जतिन के नाम से प्रसिद्ध हो गए। जतिन ने अपनी सरकारी नौकरी छोड़कर आजादी की लड़ाई का
रास्ता चुना था। वर्ष 1908 में सिलीगुड़ी रेलवे स्टेशन पर उन्होंने तीन अंग्रेज अधिकारियों की अकेले
पिटाई कर दी जिसके बाद ब्रिटिश अधिकारियों में इनका खौफ बढ़ गया। कहा जाता है कि बाघा
जतिन किसी के साथ गलत व्यवहार होते देख नहीं सकते थे। बचपन से ही शरीर से हष्ट-पुष्ट, जतिन
में साहस की भी कोई कमी नहीं थी जिसके कारण अंग्रेज भी उनसे खौफ खाते थे। श्री अरविंदो ने
जतिन को सीक्रेट सोसायटी बनाने का निर्देश दिया जो सीक्रेट सोसायटी युगांतर के नाम से जानी
गई। बाघा जतिन सीक्रेट सोसायटी युगांतर के ‘कमांडर इन चीफ’ बने। यह ब्रिटिश काल में
क्रांतिकारियों का एक प्रमुख संगठन था। उन्होंने अनेक युवाओं को प्रेरित किया। बाघा जतिन का
कहना था, ‘आमरा मोरबो, जगत जागबे’ जिसका मतलब था कि ‘हम राष्ट्र को बचाने के लिए बलिदान
देंगे।’ उस समय क्रांतिकारियों के पास आंदोलन के लिए धन जुटाने का प्रमुख साधन डकैती था। उसी
दौरान कलकत्ता में बंदूक-कारतूस की कंपनी ‘राडा’, ‘बलिया घाट’ और ‘गार्डन रीच’ की बड़ी डकैतियों में
जतीन्द्रनाथ मुखर्जी का नाम भी सामने आया था। साल 1914 में जब विश्व युद्ध शुरू हुआ तो
जतिन ने विदेशी सहायता मांगी और अंग्रेजों के खिलाफ लड़ाई शुरू करने का प्रयास किया। 9 सितंबर
1915 को वह बालेश्वर के निकट हथियारों की खेप लेने जा रहे थे लेकिन इस खेप की भनक अंग्रेजों
को मिल गई। इसके बाद अंग्रेजों ने समूह पर हमला कर दिया। जतिन और उनके समूह के सदस्यों
ने अंग्रेजों का बहादुरी से मुकाबला किया लेकिन इस लड़ाई में बाघा जतिन गंभीर रूप से घायल हो
गए। अंग्रेजों ने उनके सारे हथियार जब्त कर लिये। इस मुठभेड़ में क्रांतिकारी चित्तप्रिय राय शहीद हो
गए और मनोरंजन सेनगुप्ता एवं निरेन नाम के क्रांतिकारियों को पुलिस ने पकड़ लिया। अगले ही
दिन 10 सितंबर 1915 को आजादी के इस महान क्रांतिकारी की ओडिशा के बालेश्वर सिटी अस्पताल
में मृत्यु हो गई। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने स्वतंत्रता सेनानी बाघा जतिन के बलिदान दिवस की
शताब्दी पर उन्हें नमन किया था और अपने संदेश में कहा था, “मैं बाघा जतिन के बलिदान दिवस
की शताब्दी पर नमन करता हूं। मातृभूमि के लिए उनका शौर्य और बलिदान हमेशा याद रखा
जाएगा।”





