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बचपन की स्मृतियां ही जीवन के विविध आयामों को समझने में मदद करती हैं..

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कथाकार, इतिहासकार सुभाषचन्द्र कुशवाहा से अपर्णा की बातचीत

अपने बचपन की कुछ स्मृतियों को साझा कीजिये !

बचपन की स्मृतियां ही जीवन के विविध आयामों को समझने में मदद करती हैं। मेरे साथ भी वही है।  मेरी स्मृतियों में कुछ घटनाएं, कुछ विपदाएं और कुछ भूख का हाहाकार शामिल है। ये स्मृतियां बेशक वेदनापूर्ण हैं पर जीवन को समझने के लिए अमूल्य खजाने से कम नहीं हैं। बात उन दिनों की है जब पिताजी ने गांव के स्कूल में दाखिला दिलाया था। तब बड़े भैया जूनियर हाई स्कूल में पढ़ रहे थे, बिना पर्याप्त किताबों के। वह अपने साथियों से एक-दो दिन के लिए किताबें मांगते और थोड़े समय में जरूरी नोट बनाकर लौटा देते। वह असाधारण प्रतिभा वाले छात्र थे। उन्हीं की तरह मेरी भी स्कूली शिक्षा गांव के प्राथमिक विद्यालय में शुरू हुई। शुरू में मैं स्कूल जाने के लिए निकलता और रास्ते से कहीं और खिसक लेता। वे स्थान जहां मैं दिन गुजारता, बारी-बगीचे, गन्ने, अरहर या अगहनी धान के खेत हुआ करते। वहीं, छिप कर बैठता। पटरी पर कुछ लिखता। जब छुट्टी होती, घंटी की आवाज सुनाई देती तब छिपने के स्थान से निकलकर घर आ जाता। भैया तब तक स्कूल से आए नहीं रहते। मां-बाप और बड़ी बहन अनपढ़ थीं तो उन्हें पता ही न चलता कि मैंने क्या लिखा है। थोड़ी देर बाद पटरी साफ कर देता। पता नहीं क्यों, मेरे मस्तिष्क में स्कूल एक प्रकार से आतंक का घर बन चुका था। मैं मार खाने के बावजूद, स्कूल नहीं जाता। इसका ठीक-ठीक उत्तर दे पाना संभव नहीं है। मनोचिकित्सकों का यह विषय हो सकता है। स्कूल से गायब रहने की खबर पिताजी तक पहुंचती। वह मुझे ढूंढते और फिर कसकर मार पड़ती। सबसे ज्यादा पिताजी जी मारते और कभी-कभी बड़े भाई भी। एक भय घर कर गया था, जो मार पड़ने के बावजूद स्कूल में रमने न देता। कई बार डोमटोली के पूरब, मूंज और सरपत के झुरमुटों में छिपा रहता। वहां छिपना, स्वयं को सांप-बिच्छू के हवाले करना था। अंधेरा हो जाता और मैं मार की डर से वहीं छिपा रहता। अंधेरा होने पर मां परेशान होकर, ढूंढती फिरती। कई बार वह रोती। गांव वालों से पूछती। कई बार पिताजी और भैया ने मुझे अगहनी धान या गन्ने के खेतों से ढूंढ कर पीटा मगर स्कूल नहीं जाना था, तो नहीं गया।

एक दिन मुझे प्रलोभन के रूप में एक नया पैसा दिया गया था। समझाने के लिए। मनाने के लिए।  शाम को स्कूल से छुट्टी होने पर जब करमहा  गांव के बच्चे मेरे घर के सामने से गुजर रहे थे तो उन्होंने मुझे टोका -‘पढ़ने क्यों नहीं आते?’ मैंने हथेली में रखा एक नया का सिक्का दिखाते हुए कहा था- ‘आप लोग पढ़ने जाते हैं तो पैसा मिलता है? नहीं न ! देखिए, मैं पढ़ने नहीं जाता फिर भी पैसा मिलता है?’ यानी माई-पिताजी की घेराबंदी वाले उपक्रम को एक झटके में मैंने ध्वस्त कर दिया था। माई रोती थी और पिताजी को कहती थी कि – ‘मत मारीं ! ना पढ़िएं त मेहनत, मजूरी कर के पेट पाल लीहें।’

इसी बीच हुआ यह कि एक दिन किसी ने कहा कि मस्जिद पर, हाजी साहब के पास इसे ले जाइए। वह ताबीज लिख देंगे। जरूर फायदा होगा।

पिताजी का जीवन संघर्षों का रहा। जब वह पैदा हुए तभी मेरी दादी मर गई थीं यानी पिताजी ने अपनी मां का मुंह नहीं देखा है। फूआ ने उनका पालन-पोषण किया। शादी होते ही घर से भागकर कमाने गए थे, कलकत्ता। कुछ दिन द्वितीय विश्वयुद्ध के अंतिम दिनों में सेना में भर्ती हुए थे मगर बाद में मेस इंचार्ज के कुप्रबंध और खुराकी में घपला करने की शिकायत उच्च अधिकारी से कर, भाग आए। शुरू से ही उनमें नेतृत्व की प्रवृत्ति रही। गांव के प्रधान वह कभी नहीं रहे मगर प्रधान की तरह ही उनकी हर कहीं पूछ होती। हर विवाद में उनको बुलाया जाता और न्याय में ईमानदारी उनकी पहली प्राथमिकता थी।

गांव के उत्तर-पूरब कोने पर एक गांव था, जिसे मस्जिद टोला कहा जाता। वहां आटा पीसने वाली चक्की थी। जो पूरे दिन पुक….पुक करती रहती। बड़े होकर हम लोग वहीं गेहूँ  पिसवाने जाते थे। मस्जिद टोले पर एक बुजुर्ग मियां थे जिन्हें इलाके में सभी सम्मान से देखते। हज कर के आए थे इसलिए लोग उन्हें हाजी साहब कहा करते। सुबह उनके दरवाजे पर कई गरीब पहुंचे होते। एक दिन माई मुझे लेकर वहां गई। अपना दुखड़ा सुनाई। हाजी साहब ने एक कागज के टुकड़े पर कुछ लिखकर दिया और ताबीज में डालकर गले में पहनाने को कहा। इसके अलावा उन्होंने जो सबसे महत्वपूर्ण और  मनोवैज्ञानिक बात बतायी वह यह कि स्कूल जाने के पहले रोज सुबह गुड़ में घी लगाकर बच्चे को खिलाया जाए। बच्चे को बिल्कुल मारा न जाए। माई ने वही किया। गले में ताबीज डाल दी गई। हर सुबह माई थोड़ा गुड़ खिलाकर मुझे स्कूल भेजने लगी। उस समय मेरे लिए गुड़ खरीदकर लाना खास बात थी। मुझे लगा कि घर में सबसे अधिक प्यार मिल रहा है। उसी के बाद गुड़ खाकर स्कूल जाने का सिलसिला शुरू हुआ तो फिर न रुका। छ: माह जो बर्बाद हुआ था, पूरा कर लिया। जुलाई में दूसरी कक्षा में जा पहुंचा।

एक और महत्वपूर्ण स्मृति है। गांव के एक यासीन थे, उम्र में मुझसे सात-आठ साल बड़े।  बोले कि चलो सरेह में चलकर होरहा लगाएं। एक और लड़का हम दोनों के साथ लग लिया, सूर्यभान, जो उम्र में मुझसे एक-दो साल छोटा था। अंधेरा हो चुका था। रामजी राय के मटर के खेत से मटर उखाड़ी गई। रामजी राय हमारे टोले में बड़े काश्तकार थे। साहूकार भी थे। खेत उन्हीं के थे, तो जाहिर है मटर उन्हीं के खेत से उखाड़ा जाता। उखाड़ा गया और पूरब में लाला के इनार के पास  मेरा एक खेत था।  उसमें गन्ना लगा था।  आधा गन्ना मिल पर जा चुका था। वहीं हमने होरहा लगाया। रात को आग की लपट देख  मस्जिद की बाजार से लौट रहे फुलेनी भगत भी वहीं आ पहुंचे। सूर्यभान उन्हीं का लड़का था तो हम लोगों को यह विश्वास जम गया कि वह रामजी राय को बताएंगे नहीं। मगर उन्होंने रामजी राय को बता दिया कि कौन-कौन होरहा लगाने में शामिल थे। जाहिर है उनका लड़का सबसे छोटा था। उसका दोष नहीं माना जाने वाला था। मेरे घर के पास बरगद का बड़ा पेड़ था।  वहीं पिताजी को बुलाकर रामजी राय मेरी बदमाशी के लिए हड़का रहे थे।  गुस्से में पिताजी मुझे बिस्तर से उठाते हुए घसीटकर लाए। बोले- बाबू के खेत से मटर क्यों उखाड़े? मैं चाहता तो यासीन पर दोष मढ़ सकता था क्योंकि वही सबसे बड़े थे। उन्हीं  के कहने पर मैंने मटर उखाड़ा था।  लेकिन मैंने ऐसा नहीं किया।  मटर उखाड़ते समय मेरे मन में यह बात थी कि पूरी गांव की संपदा जब राय लोगों के पास है तो हम लोग क्या करेंगे? जमींदारी और साहूकारी से गांव का सारा धन इन्हीं लोगों के पास है तो हम कहां जाएं? खैर, गुस्से में मैं घारी में गया और सीपावा ( मोटा बांस का डंडा जो बैल गाड़ी को सहारा देने के लिए होता था) खींच लिया और रामजी राय को गरियाते हुए कि – देखले बाड़ अपना खेत में मटर उखारत? ’  और सीपावा चलाने के लिए दौड़ा। पिताजी ने पकड़कर कुटाई तो की मगर रामजी राय फिर वहां से यासीन के घर नहीं गए। सीधे अपने दरवाजे पर चले गए। बात खत्म हो गई। तब लोग होरहा लगाने को बहुत बड़ा अपराध नहीं मानते थे।  सब्र कर जाते थे। स्मृतियां तो इतनी हैं कि अगर उन्हें ही बताऊं तो किताब बन जायेगी।

शुरू में मैं स्कूल जाने के लिए निकलता और रास्ते से कहीं और खिसक लेता। वे स्थान जहां मैं दिन गुजारता, बारी-बगीचे, गन्ने, अरहर या अगहनी धान के खेत हुआ करते। वहीं, छिप कर बैठता। पटरी पर कुछ लिखता। जब छुट्टी होती, घंटी की आवाज सुनाई देती तब छिपने के स्थान से निकलकर घर आ जाता। भैया तब तक स्कूल से आए नहीं रहते। मां-बाप और बड़ी बहन अनपढ़ थीं तो उन्हें पता ही न चलता कि मैंने क्या लिखा है। थोड़ी देर बाद पटरी साफ कर देता। पता नहीं क्यों, मेरे मस्तिष्क में स्कूल एक प्रकार से आतंक का घर बन चुका था। मैं मार खाने के बावजूद, स्कूल नहीं जाता।

अपनी माँ की कुछ यादें ताज़ा कीजिये !

माई के शरीर की झुरियों में गरीबी, भूख, पीड़ा, मार और वात्सल्य का जो रक्त प्रवाहित था, उसको जितना भी जानने की कोशिश करता हूं, तो बहूत कुछ छूट जाता है। माई की सहनशीलता ने हमें अभावों में जीने, पढ़ने और संवेदनशील बनने का मूल मंत्र दे दिया था। माई का भोर में जगना, गाय-बैलों के लिए छांटी-पानी करना, गोबर उठाना, खेती-किसानी में खटना और पिताजी की डांट-मार सहना, कठोर जीवन की कुछ कड़वी यादें हैं। हर हाल में बच्चों को खुश रखना, माई की सूनी आंखों का स्वप्न होता। स्वयं भूखे रह, हम भाई-बहनों को खिलाना, माई के रग-रग में जीवन का असीम दुर्द्धर्ष संघर्ष छिपा हुआ था।  अभावों और आपदाओं से लाचार माई का, अंधविश्वासों में असीम विश्वास था। हर आपदा या बुरे समय में माई जोगीर बाबा, बरम बाबा या काली माई के थान पर जाती थी। हम भाई-बहनों के बीमार होने पर भाखौती मांगती। वह कुछ इस प्रकार कहती- ‘हे जोगीर बाबा! बाबू के निरोग क दीं। बाबू के पास करा दीं। आपके हम चीलम चढ़ाइब। हे काली माई! आपके कढ़ाई चढ़ाइब’, आदि.. आदि।

भोजन का जब कोई विकल्प न होता तब माई, सुबह-सुबह भूख मिटाने के लिए मुस्लिम पड़ोसियों के घर ले जाती। उनसे खांड़ा-टुक्की मांगकर खिलाकर हमें चुप कराती। एकाध दृश्य अभी भी आंखों के सामने तैरते रहते हैं। माई सहेजना जानती थी। वह वर्तमान से जूझते हुए, भविष्य के लिए सहेजकर कुछ न कुछ रखती थी। उस कुछ न कुछ में, चार-आठ आना पैसा होता या मेहमानों के आने पर उन्हें खिलाने के लिए थोड़ा गुड़ या चूड़ा  होता। उसके सहेजने की कला को मैं छिन्न-भिन्न कर देता। ढूंढता रहता। जिद्द कर थोड़ा गुड़ या चूड़ा हथिया लेता। पिताजी देखते तो माई को डांटते। भला-बुरा कहते। माई अपने बेटों के लिए यह सब कुछ सहती रहती। वह हम सभी के लिए पिताजी के बीच ढाल का काम करती

माँ के व्यक्तित्व से आप किस तरह प्रभावित थे ?

माई से मैंने उदारता, संतोष और सहनशीलता सीखी। वह सरलता मगर चैतन्यता से भरी थी।  वह अपने दुखों को बहुत कुछ बताती नहीं। सहना,  खटना,  चूल्हे-चौके के की व्यवस्था में  लगी रहना, माई का स्वभाव था। माई हम सबका जीवन है। पिताजी से कहीं अधिक वह धैर्यशील और विपदा को सहने की ताकत रखती थी। अब माई नहीं है  जाने से पहले महीनों कुछ बोल पाने की स्थिति में नहीं थी।  बचपन में घर में दाने न होते या चूल्हा न जलता तो भी मार माई पर पड़ती। पिताजी इस मायने में थोड़ा आक्रामक थे। यद्यपि वह हालात को जानते थे मगर आक्रोश को निकालने का सुलभा साधन माई थी।

आप लोग पढ़ने जाते हैं तो पैसा मिलता है? नहीं न ! देखिए, मैं पढ़ने नहीं जाता फिर भी पैसा मिलता है? यानी माई-पिताजी की घेराबंदी वाले उपक्रम को एक झटके में मैंने ध्वस्त कर दिया था। माई रोती थी और पिताजी को कहती थी कि – ‘मत मारीं ! ना पढ़िएं त मेहनत, मजूरी कर के पेट पाल लीहें।’

आपके पिता कैसे व्यक्ति थे ? पिता का आपके ऊपर क्या प्रभाव है ?

पिताजी का जीवन संघर्षों का रहा। जब वह पैदा हुए तभी मेरी दादी मर गई थीं यानी पिताजी ने अपनी मां का मुंह नहीं देखा था। फूआ ने उनका पालन-पोषण किया। शादी होते ही घर से भागकर कमाने गए थे, कलकत्ता।  कुछ दिन द्वितीय विश्वयुद्ध के अंतिम दिनों में सेना में भर्ती हुए थे मगर बाद में मेस इंचार्ज के कुप्रबंध और खुराकी में घपला करने की शिकायत उच्च अधिकारी से कर, भाग आए। शुरू से ही उनमें नेतृत्व की प्रवृत्ति रही। गांव के प्रधान वह कभी नहीं रहे मगर प्रधान की तरह ही उनकी हर कहीं पूछ होती। हर विवाद में उनको बुलाया जाता और न्याय में ईमानदारी उनकी पहली प्राथमिकता थी। यहां तक की जब वह बीमार थे और थोड़ी सी जमीन की कीमत, दूसरे लोग ज्यादा दे सकते थे तब मेरे चाचा जी ने किसी दूसरे को जमीन लेने न दिया। इलाज के लिए मात्र 200 रुपए के बदले चाचा ने सारी जमीनें रेहन ले ली थी। तब भी पिताजी ने कुछ नहीं बोला। घर के बंटवारे में सबसे खराब जमीनें  पिताजी के हिस्से में आयीं मगर वह कहते थे कि भाई को जो मन करेगा, वह देंगे। कुल मिलाकर सामाजिकता और ईमानदारी, उनके मुख्य गुण रहे।

परिवार में किसका अनुशासन चलता था? आप किससे डरते थे?

पिताजी का ही अनुशासन चलता। पिताजी बहुत गर्म मिजाज के थे।  बहुत जल्द गुस्सा होना उनकी प्रवृत्ति रही जो कुछ हद तक मेरे खाते में भी आयी है। हम सभी भाई बहन, उनसे बहुत डरते थे क्योंकि उनकी मार रुह कंपा देने वाली होती।

आपके भाई-बहन कैसे रहे हैं ?

मुझसे बड़ी मेरी दोनों बहनें अनपढ़ रहीं। भैया दूसरे नम्बर पर हैं। सबसे बड़ी बहन उनसे तीन वर्ष बड़ी हैं। सबसे पहले भैया पढ़े और अपनी असाधारण मेधा शक्ति के बल पर कुदाल, हल-बैल से यात्रा शुरू कर देश-दुनिया के अच्छे बाल रोग विशेषज्ञ बने। बाबा राधव दास मेडिकल कॉलेज के बालरोग अध्यक्ष और प्रधानाचार्य रहे। हम तीन भाई और पांच बहनों में मेरा स्थान चौथा था है।  यानी बड़ी बहन के बाद भैया, फिर एक बहन और उसके बाद मैं। मुझसे छोटी तीन बहनें और एक भाई। गरीबी में गुजरती जिंदगी में भैया की पढ़ाई असाधारण कही जायेगी। कई लोगों की मदद से भैया मेडिकल कॉलेज में पढ़ पाए। पढ़ाई के दौरान ही उन्होंने घर को संवारना शुरू किया। उन्हीं की देन है कि मेरी पढ़ाई इण्टर बाद, गोरखपुर में हो पाई।  भौया न होते तो मेरा परिवार आज भी गांव  में मेहनत-मजदूरी कर जीवन बिता रहा होता। यह भैया  का एहसान है कि सभी भाई-बहन एक साथ, एक-दूसरे के लिए आज भी लगे रहते हैं। कुल मिलाकर पिताजी के बच्चों की पूरी पीढ़ी, एकजुट और संयुक्त परिवार के रूप में रह रही है।

पिताजी किसान और माताजी घरेलू स्त्री, ऐसे में किसकी प्रेरणा से आप और आपके भाई-बहनों ने स्कूल का रुख किया? आपकी स्कूली शिक्षा कहाँ हुई ?

पिताजी ने अपने बेटों को स्कूल भेजा। माई भी चाहती थी कि बच्चे पढ़ें। मगर पिताजी ने बेटियों को नहीं पढ़ाया। इसका मलाल उन्हें अब होता है। पांच बहनों में से केवल दो बहनों को शिक्षा मिल पाई जिसका श्रेय भैया को है। सभी की प्राथमिक शिक्षा  गांव के स्कूल में हुई। जूनियर हाई स्कूल मैंने गांव के पास के लछिया गांव से किया और हाई स्कूल तथा इण्टर की शिक्षा फाजिलनगर बाजार में पावानगर महावीर इण्टर कालेज में हुई। बी.एस.सी और एम.एससी. की पढ़ाई गोरखपुर विश्वविद्यालय में हुई।

युवा सुभाषचन्द्र कुशवाहा

उन दिनों स्कूल में पढ़ाई का कैसा माहौल था ? स्कूल की कोई ऐसी घटना जो आपके ज़हन में आज भी ताज़ा है. पिछड़ी जाति के होने के कारण कोई भेदभाव या कोई घटना जिसने आपके मन को ठेस पहुंचाई हो.

उन दिनों स्कूल में जो भी मास्टर थे, मन से पढ़ाते थे। जातिवादी नजरिये से दलितों और पिछड़ों को देखा जाता। उन्हें आगे की पंक्ति में कम स्थान मिलता मगर एक थे मौलवी साहब। कनक पीपरा गांव के। उन्होंने सभी बच्चों से सदा समान व्यवहार किया। इसके बावजूद पढ़ाई ठीक होती थी। शिक्षा के दरवाजे तक जाति पीछा करती रही।  मेरी प्राथमिक पाठशाला में एक मास्टर साहब, गांव के बाबू साहब थे, जिनका नाम आत्मा राय था। अभी भी हैं वह। घोर जातिवादी थे। हर बच्चे को जाति सूचक शब्दों से बुलाते।  ‘का हो कोईरी भाई, तुहों पढ़ब त बैगन के उगाई’ उनके शब्द कान को छेदते हुए दिमाग में ऐसे घुसे कि वह बाबू साहब कई कहानियों में भिन्न-भिन्न वेष में आए।  मैं उन्हें अतीत से वर्तमान में खींच लाया।  बचपन में गांव और स्कूल हर कहीं जातिवादी लोग थे मगर यह भी सही है कि सभी मास्टर ऐसे नहीं थे। कुछ बेहतर थे जिनमें पीपराकनक के मौलवी साहब।

 बचपन के दिनों में जब आप गाँव में रहते थे, उन दिनों क्या माहौल था? और आज जब गाँव जाते हैं तो उसमें क्या बदलाव दिखता है?  

बचपन में गांव का माहौल वैसे ही जातिवादी था जैसा आज है। ओबीसी समाज ज्यादा गरीब था। खाने-पीने की परेशानी थी।  खेती और भी खराब हालत में थी। आज कुछ स्थिति बेहतर तो है मगर पहले की तरह लोग स्वाभिामानी नहीं रहे। पहले एक अच्छी बात यह थी कि तब ओबीसी समाज के लोग, गरीब होते हुए भी एकजुट हो जाते थे। आज लोग कुछ सम्पन्न हैं मगर बेहतर शिक्षा न मिलने से मानसिक रूप से गुलाम हैं। गांवों  की पूरी तस्वीर, पंचायती राज व्यवस्था की लूट के कारण फूट में बदल चुकी है। हर व्यक्ति दूसरे से नफरत करता है। पहले की तरह सामाजिक सद्भाव नहीं है। विभाजन बढ़ा है। पहले लोग अपना काम करते हुए दूसरे की मदद कर देते थे। अब यह सब खत्म हो चुका है। हर चीज व्यावसायिक हो चुकी है।

 आप किस तरह की सामाजिक-सांगठनिक गतिविधियों में शामिल रहे हैं?

मैं कभी अकेला नहीं जिया। जीवन को सामाजिक संदर्भों में बचपन से ही शुरू किया। कक्षा पांच में था तो गांव के गरीब बच्चे पुआल का गेंद बनाकर खेलते थे। पैसे नहीं थे हम लोगों के पास कि रबड़ की बॉल खरीदें। सबसे पहले चार-पांच लड़कों ने धान सुरुक कर चार आने का एक बॉल खरीदा। फिर धान बीनकर आठ आने की बॉल खरीदी। उसके बाद हमने खेतों से बालियों को बीनकर बारह आने या एक रुपए की बॉल खरीदी। अब हमारे टोले के बच्चे पुआल की गेंद के बजाए, रबड़ की गेंद से खेलने लगे। जब मैं कक्षा छ: में पहुंचा तब चंदा जमा कर सात रुपए की एक फुटबॉल खरीदी। एक बार 22 किलोमीटर दूर, सेखवनियां पैदल चला गया था फुटबॉल खरीदने। कक्षा नौ में आते-आते, गांव में फुटबॉल प्रतियोगिता शुरू करा दिया था। इण्टर में नाटकों का मंचन गांव में कराया। खुद मुख्य नायक का पार्ट किया। वीर अभिमन्यु नाटक में अभिमन्यु का रोल किया। अंधेर नगरी चौपट राजा को तत्कालिक सत्ता विमर्श से जोड़कर मंचित किया। फुटबॉल प्रतियोगिता जारी रही। बीएससी में आते-आते शहीद भागत सिंह पुस्तकालय खोला जिसमें गरीब बच्चों को पढ़ने के लिए किताबें मुफ्त दी जाने लगीं। चंदा जुटाकर गरीब किंतु मेधावी छात्रों को छात्रवृत्ति देने का कार्य भी किया गया और छात्रों के चयन के लिए तीन केन्द्रों पर लिखित परीक्षा आयोजित कराया। बाद में ये दोनों योजनाएं बंद हो गयीं मगर फुटबॉल प्रतियोगिता चलती रही। गांव वालों को साहूकारों के कर्ज से बचाने के लिए भी एक कोष बनाकर मदद शुरू की गयी मगर यह योजना चल न सकी। गांव पर सांस्कृतिक कार्यक्रम होते रहे। 2008 से लोकरंग सांस्कृतिक समिति का गठन कर हमने लोक कलाओं के सामाजिक पक्षों को सामने लाने का जो अभिायान शुरू किया, उसकी ख्याति देश-विदेशों तक गयी। वह आज भी जारी है। गांव से बाहर, विश्वविद्यालय जीवन में वामपंथी छात्र राजनीति की ओर झुकाव हुआ। गोरखपुर विश्वविद्यालय में प्रगतिशील छात्र आंदोलन का पहला सचिव रहा और शुल्क विरोधी आंदोलन का सूत्रपात कर पूरे एक माह तक आंदोलन चलाया जिसके फलस्वरूप आंशिक रूप से फीस बढोत्तरी कम हो सकी। कुछ समय तक जन संस्कृति मंच से भी जुड़ा रहा।

क्या आपको लगता है कि सामाजिक संगठनों का कोई राजनीतिक एजेंडा होता है?

बिल्कुल होता है। कहने को आरएसएस एक सामाजिक संगठन है मगर वह खुले तौर पर राजनीतिक गतिविधियों में शामिल है। राजनीतिक एजेंडा कोई बुरी चीज नहीं होती बशर्ते उसमें लोकतंत्रात्मक विधान हो और वह जनपक्षधर हो या वह हाशिए के समाज की भलाई के लिए हो। व्यापक समाज के विरुद्ध, कुछ खास लोगों के हित-साधन वाले संगठनों को मैं सामाजिक संगठन नहीं मानता।

क्या आप महसूस करते हैं कि हिन्दी साहित्य अपने समय और समाज का आईना है?

यात्रा पर सुभाष…

साहित्य समय का आईना होता ही है। हिन्दी साहित्य भी अपने समय को ही व्यक्त कर रहा है। कम या ज्यादा, वही हिन्दी साहित्य जिंदा है, जिसने समय से साक्षात्कार किया है। हां यह भी सही है कि ज्यादातर हिन्दी साहित्य सवर्ण साहित्य रहा है और वहां हाशिए के समाज के लिए बहुत कम स्थान रहा है। खाये-पीये,अघाये लोगों की बहुलता के कारण, समाज की बजबजाहट से किनारे चलने की प्रवृत्ति रही है। जातिवादी समाज में जातिदंश पर प्रहार करने वाले सवर्ण समाज के बहुत कम लेखक दिखते हैं। अकादमियों और विश्वविद्यालयों में तो अपनी जाति-बिरादरी को स्थापित करने का खेल ही चलता रहा है। वहां हाशिए का समाज अनुपस्थित रहा है। इन सब चरित्रों का भी प्रतिबिम्ब, हिन्दी साहित्य में देखने को मिलेगा।

हाशिए के समाज के कवि को आप जगह कहां देते हैं? कबीर तक को उपेक्षित करने का प्रयास किया गया तो बाकी की क्या बात? हीरा डोम की एक ही कविता क्यों प्रकाश में आती है? क्या जैसी कविता हमें पढ़ने को मिलती है, उससे यह विश्वास किया जा सकता है कि हीरा डोम ने मात्र एक कविता लिखी होगी? अनपढ़ रखे गए समाज ने वाचिक परंपरा में लोक गीतों के माध्यम से अपनी व्यथाओं को सामने लाने का प्रयास किया, बिना किसी संग्रह के। वाचिक परंपरा की सारी कविताएं या गीतों की रचना लोक भाषा में हुई है। जब कवि लोक समाज से नहीं आयेगा तो उसकी भाषा लोक की कैसे होगी?

वे कौन-से मुद्दे हैं जो आपको लगता है साहित्य से गायब हो गए हैं?

साहित्य से गांव और गंवई आपदाएं गायब दिख रही हैं। पूरी तरह से नहीं, मगर गांव और खेती-किसानी की उपेक्षा हुई है। अल्पसंख्यक, आदिवासी और जनजातीय मुद्दों पर कम चर्चा हुई है। जातिदंश और साम्प्रदायिक ध्रुवीकरण के विरुद्ध बहुत कम साहित्य रचा गया है जबकि इनकी मार से समाज का गरीब तबका ज़हालत की जिन्दगी जीने कोे अभिशप्त है।

तो फिर साहित्य में ज्यादातर किन मुद्दों का समावेश हुआ है?

साहित्य में ज्यादातर मध्यमवर्ग की कुंठाएं और सरोकर सामने आए हैं। हाशिए के समाज की आपदाएं, उनके सरोकार से गायब हैं। सामाजिकता गायब है। खेती-किसानी गायब हैं। कथ्य पर शिल्प हावी है।

किसी साहित्यिक कृति में कथ्य की ही सामाजिकता नहीं होती, उसके शिल्प और भाषा की भी सामाजिकता होती है। इसलिए साहित्य के नए शिल्प और भाषा की सार्थकता, उसकी सामाजिकता से आंकी जानी चाहिए। बेशक उपेक्षित या अप्रत्याशित विषय को लेकर रचना का निर्माण किया जा सकता है। बशर्ते कि उपेक्षित या अप्रत्याशित विषय का, समय और सामाजिकता से नाता बन रहा हो या बन गया हो। साथ ही साथ उपेक्षित और अप्रत्याशित विषय नए जीवन मूल्यों को समझने में सहायक सिद्ध हो रहे हों। इससे इतर अप्रत्याशित और उपेक्षित विषय की रचना, उसकी भाषा और शिल्प के उपेक्षित हो जाने की संभावना बनी रहेगी। जो भाषा और शिल्प, हिन्दी साहित्य में प्रयुक्त हुई, वह खास वर्ग की मनोदशाओं को संबल प्रदान कर रही थी। पहली बार दलित साहित्यकारों ने इसे झकझोरा। अपनी भााषा और शिल्प से हिन्दी साहित्य की कुलीनतावादी मनोदशाओं के सामने अवरोध पैदा कर दिया।

आज साहित्य सामाजिक सम्मान पाने का एक आसान रास्ता हो गया है इसलिए पुरस्कारों की छुद्र राजनीति, चापलूसी और जोड़-तोड़ साहित्यिक सफलता के जरूरी शर्त हो गए हैं। आपको क्या लगता है?

दरबारीकरण पहले भी था और आगे भी रहेगा। दरबारी संस्कृति वाले तथाकथित साहित्यकारों की अपनी अलग प्रजाति है। हिन्दी समाज में मूल्य और निष्ठाएं कमजोर रही हैं। विभिन्न जातियों और ऊंच-नीच में विभाजित समाज शुरू से अमानवीय रहा है और वही उसकी वैचारिकी भी। ऐसे में मूल्यहीन वैचारिकी में सीधे खड़े रहने का गुण नहीं होता। रेंगने का संस्कार पैदा होता है। पुरस्कारों के जुगाड़ में चरणवंदना करना कोई अप्रत्याशित चीज नहीं है। मैं किसी भी पुरस्कार की अपेक्षा नहीं करता और केवल हाशिए के समाज के मुद्दे को उठाना ही अपना पुरस्कार समझता हूं।

यही संतुष्टि देता है- जैसे लोक कलाकार रसूल मियां की खोज,चौरी चौरा विद्रोह के गलत इतिहास को दुरुस्त किया। अवध किसान विद्रोह के मूल नायकों को सामने रखा, कबीर पर जो कुछ विदेशी अखबारों में लिखा-छपा था, उसे और भील विद्रोह के सैकड़ों नायकों को पहली बार सामने लाने का काम पूरा किया हूं। इसका संतोष है।

प्राय: साहित्यकार मानते हैं कि विचार और राजनीति लेखन के लिए गैरजरूरी है और इस क्रम में वे मार्क्सवाद और जनवाद को तो बुरा कहते हैं लेकिन कांग्रेस और भाजपा को बख्श देते हैं। इसके पीछे आपको क्या लगता है?

बिल्कुल नहीं। बिना विचार या राजनीतिक समझ के आप क्या लिखेंगे? मार्क्सवाद और जनवाद, गरीबों के हक-हकूक के विचार हैं, जो हाशिए के समाज के साहित्य के लिए जरूरी हैं। निश्चय ही साहित्य और साहित्यकार का एक वर्गाधार होता है, एक जाति होती है। वर्गाधार और जाति की एक निश्चित विचारधारा होती है। विचारधारा बिन कोई साहित्य लिखा ही नहीं जा सकता। आजकल दक्षिणपंथी हीनता के बचाव के लिए, विचारधारा को मजाक का विषय बना लिया जाता है। साहित्य को विचारधारा से मुक्त रहने की सलाह दी जाती है। खास विचारधारा से मुक्ति की बात करने वालों से पूछिये कि आज जो लोग सत्ता-सिंहासन पर आरूढ़ हैं, क्या किसी खास विचारधारा से नहीं जुड़े हैं? विचार शून्य चीज तो जड़ ही हो सकती है। इसलिए प्रतिबद्धता या पक्षधरता तब तक हेय नहीं होती, जब तक कि वह आरोपित न हो। जब तक वह सामाजिक सरोकारों की अनदेखी न करती हो या वह नारा न बनती हो। जब तक कि वह येन-केन प्रकारेण स्वयं का पक्ष पोषण न करती हो। सामाजिक होने के नाते सामाजिकता या आमजन से जुड़े होने के कारण आमजन के प्रति प्रतिबद्धता या पक्षधरता तो होगी ही। अगर व्यवस्था का स्वरूप सर्वग्रासी हो, गांव और गरीबों को तबाह करने वाला हो तो संवेदनशील रचनाकार उस पर जश्न तो मनायेगा नहीं? गांव और गरीबों का पक्ष तो लेगा ही ?

आप अपने जीवन में कितने ऐसे लेखकों से मिलें जो भारतीय इतिहास, संस्कृति और राजनीति की सही समझ रखते हों?

प्रतिबद्ध लेखकों से दुनिया खाली नहीं है। उनकी संख्या कम हो सकती है, मगर है। त्रिलोचन जी को बहुत करीब से देखा हूं। उनकी सारी गृहस्थी उनके कुर्ते की जेब में होती थी। भारतीय समाज और संस्कृति के हर पहलू पर उनके बेबाक विचार होते थे। वह जो कहते थे, उसे ही जीवन में ओढ़ते और बिछाते थे। आज के समय दृढ़ता से खड़ी, अरुंधति राय की राजनैतिक समझ, सत्ता प्रतिष्ठानों को हिलाती रहती है। अनिल सिन्हा मेरे दूसरे मित्र और साहित्यकार रहे जिन्होंने हिन्दी साहित्यकारों के टांग खींचू प्रवृत्ति से आगाह किया था। उनकी सरलता और प्रतिबद्धता ने वैचारिक रूप से मजबूत करने का काम किया। ओमप्रकाश वाल्मीकि, बल्ली सिंह चीमा, अदम गोण्डवी, प्रो. मैंनेजर पाण्डेय, पंकज बिष्ट, कंवल भारती, राजेन्द्र प्रसाद सिंह, हरिभाटनागर, संजीव, रामजी यादव जैसे साहित्यकारों की समझ को अपने करीब पाया।

आप अपने लेखन से कितने संतुष्ट हैं?

संतुष्ट कैसे हो सकता हूं? जब संतुष्ट हो जाऊंगा तो रचना प्रक्रिया ठहर जायेगी। हाँ, जो कुछ किया हूं, उनमें से कुछ ऐसा जरूर है जो लगता है, यह मैंने ही किया है। यही संतुष्टि देता है- जैसे लोक कलाकार रसूल मियां की खोज,चौरी चौरा विद्रोह के गलत इतिहास को दुरुस्त किया। अवध किसान विद्रोह के मूल नायकों को सामने रखा, कबीर पर जो कुछ विदेशी अखबारों में लिखा-छपा था, उसे और भील विद्रोह के सैकड़ों नायकों को पहली बार सामने लाने का काम पूरा किया हूं। इसका संतोष है।

हर रंग में सुभाष…

अपनी पहली कहानी से लेकर आज तक आपने कई कहानियाँ लिखी हैं। तब से लेकर आजतक लिखी कहानी के कथ्य, शिल्प और  प्रस्तुतिकरण में आपके हिसाब से क्या बदलाव आया है?

इसका उत्तर आलोचकों या पाठकों को देने दीजिए। मेरी कहानियों के कथ्य और शिल्प में नि:संदेह परिवर्तन देखने को मिलेंगे। समयानुसार ऐसा होता ही है मगर सरोकार साफ और अपनी जगह पर होंगे यानी हाशिए के समाज के साथ, वंचित समाज के साथ और कुलीनतावाद के खिलाफ।

आज आप अनेक भूमिकाओं में हैं। कथाकार, इतिहासकार और लोकसंस्कृति मर्मज्ञ और सभी में आपका काम बहुत उल्लेखनीय  है। आपको अपनी यात्रा के इस मुकाम पर क्या महसूस होता है?

लगता है जीवन बहुत कम है, अभी शुरुआत की है। बहुत कुछ किया जाना जरूरी है। खासकर हाशिए के समाज की लोक संस्कृति और इतिहास का लिखा जाना बहुत जरूरी है। कविता, कहानी तो लिखी ही जायेगी लेकिन जो बात सामने रखने की जरूरत है वह उसके संघर्षों का विश्लेषण।

ज्यादातर लेखक कुलीनतावादी समाज से आते हैं। लेखन कार्य पेट भरने का साधन नहीं है। इस समाज की ज्यादातर आबादी अभी भी पेट पालने में सिमटी हुई है। ऐसे में वह लेखन की ओर नहीं आती। सुनने-सुनाने की परंपरा समाप्त हो गई। ऐसे में जो कुलनतावादी लेखक हैं, वे सुविधाजनक रास्ते पर ही रहेंगे। आरएसएस उनके लिए सुरक्षित जोन है। वहां वे अपनी संस्कृति की हिफाज़त करेंगे। ऐसा करने से उन्हें कुछ पद-प्रतिष्ठा हासिल हो सकेगी। विरोधी लेखकों को यह खतरे तो उठाने ही होंगे कि उन्हें कोई पद-प्रतिष्ठा नहीं मिलेगी

आपने कई विधाओं में लिखा है। सबसे सही और सुविधाजनक किस विधा में पाते हैं?

समय के साथ विधाओं में बदलाव आए। जिस समय में जिस विधा में काम किया, वही सुविधाजनक लगा। हिन्दी ग़ज़ल, कहानी, आलेख, लोक संस्कृति सबमें काम किया। आज लगता है कि बात को कलात्मक ढंग की बजाए, साफ-साफ कहा जाए। जो ओझल कर दिए गए हैं, उन्हें सामने लाया जाए। तब मैंने वंचित समाज के संघर्षमय इतिहास लेखन की ओर स्वयं को लगाया और इसमें भी मुझे कतई असुविधाजनक नहीं लगता।

यात्राओं पर निकलने पर रास्ते निकलते हैं और फिर यात्राएँ फैलती जाती हैं। इसकी शुरुआत की कोई एक तिथि नहीं है। हाशिए के समाज की संस्कृति, स्वर और सवाल को जिस विधा में उठाने को आगे बढ़ा, वहीं से एक यात्रा की शुरुआत हुई।

आप शुरू में कविता लिखते रहे हैं। हिंदी कविता में बहुत बदलाव हुए। हाशिये के लोग केंद्र में आए और बहुत से चमकते चेहरे अँधेरे में विलीन हो गए। क्या आपको लगता है कि कविता ने अपना कर्त्तव्य पूरा किया?

संत साहित्य मूलत: कविता में ही है और उसने कभी व्यापक पैमाने पर वंचित समाज को उद्वेलित किया था। आज भी वह मार्गदर्शक की भूमिका में है। आज भी बहुत से जरूरी कवि, जरूरी कविताएं लिख रहे हैं। कर्तव्यों की पूर्ति समस्या के सापेक्ष आंकी जानी चाहिए। जब अन्यायपरक समाज के निर्माण में शोषकों की सत्ता कायम हो तब तक कविता या साहित्य की दूसरी विधाएं कर्तव्य निभाती रहेंगी। उनका कर्तव्य कभी पूरा नहीं होगा। हां, यह सवाल तो मौजूं रहेगा ही कि वंचित या संघर्षशील तबके से आए कवि की कविता का कर्तव्य या सुविधाभोगी तबके से आए कवि के कविता का कर्तव्य क्या है?

हाशिये की आवाज की जब हम बात करते हैं तो बिलकुल गूंगा नहीं है वह समाज। उसकी संस्कृति है, लोक है और भाषा है लेकिन हिंदी कविता अधिकांश लोक से हीन है। क्या कारण लगता है आपको?

सवाल वही है कि हाशिए के समाज के कवि को आप जगह कहां देते हैं? कबीर तक को उपेक्षित करने का प्रयास किया गया तो बाकी की क्या बात? हीरा डोम की एक ही कविता क्यों प्रकाश में आती है? क्या जैसी कविता हमें पढ़ने को मिलती है, उससे यह विश्वास किया जा सकता है कि हीरा डोम ने मात्र एक कविता लिखी होगी? अनपढ़ रखे गए समाज ने वाचिक परंपरा में लोक गीतों के माध्यम से अपनी व्यथाओं को सामने लाने का प्रयास किया, बिना किसी संग्रह के। वाचिक परंपरा की सारी कविताएं या गीतों की रचना लोक भाषा में हुई है। जब कवि लोक समाज से नहीं आयेगा तो उसकी भाषा लोक की कैसे होगी? इस सदी में उपेक्षित समाज को, तथाकथित विकास के बावजूद, पहले से भिन्न प्रकार की समस्याओं से जूझना पड़ रहा है। गांवों की उपेक्षा, अल्पसंख्यकों, दलितों, पिछड़ों, किसानों और आदिवासियों पर बढ़ते जुल्म, उनकी लूट और विस्थापन, संघर्ष के स्वरूप को आतंक के स्वरूप में बदलने की कला, ज्वलंत मुद्दे बन चुके है। अंधराष्ट्रवादी रुझानों ने धार्मिक पाखंड़ों, अंधविश्वासों, ठगी और हिंसा को संस्थाबद्ध कर लूट और सत्ता का नया हथियार गढ़ लिया है। स्त्रियां उपभोग की चीज बताई जा रही हैं। इन सब विडंबनाओं से इतर, अगर कविता लिखी जायेगी तो वह लोक के नजदीक नहीं होगी। ‘अहो प्रकाश रमणीयता’ या ‘कमल के पत्तों पर मोती सदृश्य चमकती पानी की बूंदों की नैसर्गिकता?’ या ‘पैबंद लगी धोती, पैरों की बिवाइयां या रोटी और चटनी पर नीलाम होता गरीब का जिस्म? हमारे लिए साहित्य के मूल्यांकन में यही ध्यान देने योग्य संदर्भ होंगे।

कहानियों से लेकर इतिहास लेखन तक, वैचारिक आलेखों से लेकर लोकसंस्कृतियों के सामाजिक पक्ष तक, ऐसा लगता है जैसे मैं अपने अतीत से मुक्त होने की लड़ाई लड़ रहा हूं।

कविता से कहानी में आने पर आप लोक के ज्यादा नजदीक गए हैं। क्या गद्य कविता के मुकाबले अभिव्यक्ति का सहज माध्यम है?

देखिए, मेरा जीवन संतों का नहीं था कि रूखे जीवन को भी कविता से नम कर देता। कविता में मैं बहुत दूर तक नहीं चल सकता था। इसलिए मैंने हाशिए के समाज की लोक संस्कृतियों को सामने रख, स्वयं को नम करने का प्रयास किया। कविता में कठोरता से कहने के औजार सभी के पास नहीं होते। मेरे पास वे नहीं थे। इसलिए गद्य की ओर निकल आया। कहानी या इतिहास लेखन में आकर मुझे लोक अभिव्यक्तियों या संस्कृतियों को ऐतिहासिक संदर्भों में व्यक्त करने में सुगमता और संतुष्टि मिली। कहानियों से लेकर इतिहास लेखन तक, वैचारिक आलेखों से लेकर लोकसंस्कृतियों के सामाजिक पक्ष तक, ऐसा लगता है जैसे मैं अपने अतीत से मुक्त होने की लड़ाई लड़ रहा हूं। मेरा लेखन, उस लड़ाई को विजयश्री में बदले या न बदले, मेरे मन को सुकून देता है। लगता है मैं ज़िंदा हूं।

ज्यादातर हिंदी लेखन राजनीति विरोधी लेखन है। ऐसा क्यों है?

गैर राजनैतिक लेखन, स्वांत: सुखाय होता है। जनसामान्य के लिए नहीं होता।  राजनीति जब समाज को अपने इशारे पर चला रही हो तब लेखन उससे बहुत दूर नहीं रहेगा। आमजन के दुखों का कारण ही आज की कॉरपोरेटपरस्त राजनीति है। अब सवाल यह है कि किस राजनीति का विरोध? किसका समर्थन? जो राजनीति आम जनता की हो, जनता की मुक्ति के लिए हो, जनता के दुख-दर्दों के निराकरण के लिए हो तो उसका विरोध क्यों? आज की राजनीति के जब अमानवीय आवरण में मंदिर-मस्जिद में स्वयं को समेट लिया हो, जब सड़कों पर बूढ़े किसान दम तोड़ रहे हों और राजनीति बांसुरी बजा रही हो, जब मुट्ठीभर कॉरपोरेट के पंजे में देश की संपदा दबा दी जा रही हो, तब उस राजनीति का विरोध ही सच्चा लेखन होगा। मुझे तो आज दूसरी तस्वीर दिखाई दे रही है। वह यह कि ज्यादातर लेखक आज की राजनीति का विरोध नहीं कर रहे अपितु शुतुर्मुर्गी गरदन छिपाए हुए हैं।

देखा यह गया है कि ऐसे लेखकों का कन्फर्ट जोन आरएसएस होता है और जिस प्रकार वे सत्ता विरोधी आवाज को नकारते हैं वह एक खतरनाक संकेत है। इससे कैसे मुकाबला करना चाहिए?

सही कहा आपने। ज्यादातर लेखक कुलीनतावादी समाज से आते हैं। लेखन कार्य पेट भरने का साधन नहीं है। इस समाज की ज्यादातर आबादी अभी भी पेट पालने में सिमटी हुई है। ऐसे में वह लेखन की ओर नहीं आती। सुनने-सुनाने की परंपरा समाप्त हो गई। ऐसे में जो कुलनतावादी लेखक हैं, वे सुविधाजनक रास्ते पर ही रहेंगे। आरएसएस उनके लिए सुरक्षित जोन है। वहां वे अपनी संस्कृति की हिफाज़त करेंगे। ऐसा करने से उन्हें कुछ पद-प्रतिष्ठा हासिल हो सकेगी। विरोधी लेखकों को यह खतरे तो उठाने ही होंगे कि उन्हें कोई पद-प्रतिष्ठा नहीं मिलेगी। सत्ता के साथ सुविधाजनक जोन में रह रहे साहित्यकारों का मुकाबला, मार्क्सवाद, अम्बेडकर विचार से सीखते हुए, दलित, आदिवासी, ओबीसी और अल्पसंख्यक के सम्मान की लड़ाई से निकलेगा।

Ramswaroop Mantri

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