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औरत विरोधी सुनामी अपराधों के रूप में हमारे सामने आ रही है

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,,मुनेश त्यागी 

       आजकल हम औरत विरोधी अपराधों की सुनामी को देख रहे हैं। औरत विरोधी अपराध रोज-रोज अखबारों में, पत्र पत्रिका में और मीडिया में आ रहे हैं। औरत विरोधी अपराध तो मानो रुकने का नाम ही नहीं ले रहे हैं। औरतों को ही नहीं, अब तो बच्चियों को भी वहशी और विकृत मानसिकता का शिकार बनाया जा रहा है।

        अभी-अभी अखबारों में चार-पांच बहुत ही हृदय विदारक घटनाएं सामने आई हैं। इस साल के शुरू होते ही दिल्ली की लड़की के खिलाफ अपराध पूरी देश दुनिया के सामने आया जिसमें कार में फंसी लड़की को 16 किलोमीटर तक गाड़ी में फंसा कर मौत के घाट उतार दिया गया। इसके अलावा बरेली में 8 साल की लड़की से उसके पिता ने ही बलात्कार कर दिया। इसी के साथ मथुरा में 8 साल की लड़की के साथ बलात्कार की घटना सामने आई है और बरेली में ही 16 साल की लड़की के साथ 4 लोगों ने बलात्कार किया है।

      यहां पर तन मन को हिला देने वाली बात यह है कि आखिर यह सब क्या हो रहा है? आज हम विश्व गुरु बनने की बात कर रहे हैं, हमारी सरकार बड़ी-बड़ी बातें कर रही है, मगर धरातल पर क्या हो रहा है? पहले तो औरतों को नहीं बख्शा जाता था। अब तो छोटी-छोटी लड़कियों को नहीं बख्शा जा रहा है और इन दरिंदों ने औरतों और बच्चियों को हिंसा और हत्या का शिकार बना डाला है। आखिर इसका कारण क्या है?

       इसका कारण है कि हजारों साल से औरत विरोधी मानसिकता और सोच एवं पितृसत्तात्मक माहौल हमारे समाज में काम कर रहे हैं। औरत विरोधी इस सोच को आजाद होने के 75 साल बाद भी नहीं बदला गया है। हमारे समाज में पहले औरतों को “भोग्या और मनोरंजन का सामान” समझा जाता था। उनकी तस्वीरों को मंदिरों पर नग्न रूप से लटकाया जाता था, उनकी नंगी तस्वीरें बनाई जाती थी और प्रकाशित की जाती थीं। अजंता एलोरा में यही देखने को मिलता है। इसके अतिरिक्त उड़ीसा के सन टेंम्पिल में भी नंगी औरतों के चित्र बनाए गए हैं। आखिर यह सब क्या है? और तो और अब तो मीडिया और मोबाइल में “पीत साहित्य” भरा पड़ा है जो किसी का भी दिमाग खराब करने के लिए काफी है।

       आजाद होने से पहले यह सोचा गया था कि भारत में औरतों को अपराधों से मुक्ति मिलेगी। उनको लेकर समाज में समता और समानता का  बर्ताव किया जाएगा, मगर अब तो औरत विरोधी अपराधों का साम्राज्य लगातार बढ़ता जा रहा है और इस पर ईमानदारी से नियंत्रण पाने की सरकार की लगभग कोई कोशिश नहीं है। सरकारें औरत विरोधी अपराधों को रोकने के लिए कोई समुचित उपाय नहीं कर रही है। हमारे समाज में औरतों को आज भी “भोग्या और मनोरंजन” का सामान समझा जाता है। उन पर छींटाकशी की जाती है, उन पर तंज कसे जाते हैं, कई कविताओं में उनको लेकर मखौल उड़ाया जाता है, उनके साथ बलात्कार और अपराध किए जाते हैं और अब तो यह भी हो रहा है कि बलात्कार करके उनकी हत्या कर दी जाती है। उन्हें आज भी दहेज लाने का सामान ही समझा जाता है।

      आज हकीकत यह है और समस्या ने इतना विकराल रूप धारण कर लिया है कि आज सभी परिवार वाले डरते हैं कि बाहर निकलने पर उनकी मां बेटी बहन बहुओं के साथ क्या सुलूक किया जाएगा और क्या वे शाम को दफ्तरों और बाजारों से, सही सलामत लौट आएंगी? आज यही डर सबको सताने लगा है। सब इसी डर से खौफ ज्यादा है कि कहीं कोई अपराधी औरत औरत औरत विरोधी लोग, औरतों पर और उनकी इज्जत और आबरू पर झपट्टा न मार दें और आज यह भी एक हसीन हकीकत है कि इन अपराधियों को अपनी और अपने परिवार की मान मर्यादा और सम्मान की कोई परवाह नहीं है और इन्हें पुलिस व्यवस्था और कानून व्यवस्था से कोई डर नहीं लगता है, ये कानून और पुलिस से बिल्कुल बेखौफ हो गए हैं।

       हजारों साल की यही सोच आज भी काम कर रही है। इसी सोच की वजह से औरतों के बारे में कहा गया था कि,,,

ढोल गवार शुद्र पशु नारी 

ये सब ताड़न के अधिकारी।

जो सोच अब से छः सौ साल पहले काम कर रही थी, वही सोच आज भी समाज में काम कर रही है। औरतों को रोज हो रहे इन अपराधों से निजात नहीं मिली है। औरत विरोधी अपराधों को लेकर हमारी पुलिस भी संजीदा नहीं है। हमारे बहुत सारे न्यायालय भी संजीदा नहीं हैं, वे भी औरत विरोधी अपराधों को दूसरे अपराधों की तरह ही ट्रीट करते हैं।

       आज औरत विरोधी अपराधों को रोकने के लिए यह सबसे ज्यादा जरूरी हो गया है कि इस मामले को लेकर सारे देश में विचार-विमर्श हों, संभाषण हों औरत विरोधी अपराधों को रोकने के लिए भाषणबाजी हो, व्याख्यान हों, बड़े पैमाने पर बहसबाजी हो और इसमें सारी जनता को किसानों मजदूरों, नौजवानों, महिलाओं, शिक्षिकाओं, वकीलों, जजों, डॉक्टर्स, नर्सेज, लेखकों, कवियों, संस्कृतिकर्मियों और तमाम मीडियाकर्मियों को जोड़ा जाए, सब को एकजुट किया जाए और इसके खिलाफ एक अभियान चलाया जाए।

     और यही पर मां बाप अपने बच्चों, लडकों पर ध्यान दें, उनके लड़की विरोधी नज़र और नजरिए पर कड़ी लगाम लगायी जाए, उनको विरोधी अपराध करने से रोकें और एक नई देशव्यापी मानसिकता का, एक नए विचार का उदय किया जाए जिसमें औरत को मां बहन बेटी दोस्त और सहयोगी समझा जाए। उन्हें भोग्या तंज कसने, मज़ाक करने और मनोरंजन की वस्तुएं न समझा जाए।

      इसमें हमें यह भी देखना चाहिए कि दुनिया भर में जहां जहां औरत विरोधी अपराध कम हुए हैं, उनका अध्ययन करना चाहिए, उनसे सबक लेने चाहिएं कि विदेशों में, रूस में, चीन में, जापान में, कोरिया में, क्यूबा में, अमेरिका में, इंग्लैंड आदि में किस तरह से औरत विरोधी अपराधों को रोका गया है? यहीं पर हम जोर देकर कहना चाहेंगे कि जब सौ साल पहले रूस में 1917 की क्रांति की गई तो क्रांति के बाद वहां की औरतों को वे सब अधिकार दिए गए जो मर्दों को दिए गए थे। रोटी कपड़ा मकान शिक्षा स्वास्थ्य और रोजगार में उन्हें बराबर का स्थान दिया गया, बराबर के अवसर दिए गए और देखते ही देखते रूसी और समाजवादी समाजों और देशो की महिलाएं, जिंदगी के लगभग हर क्षेत्र में  मर्दों से आगे निकल गईं। हमें आज उन देशों के समाज से सबसे ज्यादा सीखने की जरूरत है तभी इस औरत विरोधी माहौल और अपराध की सुनामी को बदला जा सकेगा।

      यह सब जानने की जरूरत है और इसके खिलाफ हमारी जनता को, किसानों मजदूरों को, विधायिका को, कार्यपालिका को, न्यायपालिका को, पुलिस व्यवस्था को मिलजुल कर और संवेदनशील होकर कार्य करना होगा और एक ठोस नीति को जन्म देना होगा जिसमें एक नये मानव की सोच पैदा की जाए कि हम अपनी बहन, बेटियों,  माओं,  सखियों, सहयोगियों से कोई अपराध नहीं करेंगे, उनको अपने बराबर का नागरिक समझेंगे और उनको आगे बढ़ने का मौका देंगे। ऐसा किए बिना और ऐसी समानता वाली सोच को जन्म दिये बिना, औरत विरोधी अपराधों को नहीं रोका जा सकता।

     आज हमारे पूरे समाज, पूरी राजनीति और पूरी जनता की और पूरी पुलिस व्यवस्था और न्याय व्यवस्था की यही सबसे बड़ी जिम्मेदारी है। 

औरतों पर अपराध करने वाले अपराधियों को विशेष अदालत में एक महीने के अंदर कड़ी से कड़ी सजा दी जाए और उन्हें आजीवन जेल की सींकचों के पीछे कठोर परिश्रम की व्यवस्था के साथ रखा जाए और इन अपराधियों को किसी भी प्रकार की रू रियायत न दी जाए। जब तक समाज के हर एक तबके को, औरत विरोधी अपराध, मानसिकता और सोच को, रोकने में नहीं लगाया जाएगा, तब तक औरत विरोधी अपराधों की वर्तमान सुनामी को नहीं रोका जा सकेगा।

Ramswaroop Mantri

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