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नेताजी सुभाष चंद्र बोस की बेटी आरएसएस की विचारधारा से सहमत नहीं

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मुनेश त्यागी 

       आर एस एस के मोहन भागवत ने सुभाष चंद्र बोस के जन्मदिन दिवस पर  पश्चिमी बंगाल में कार्यक्रम करने का निर्णय किया था मगर सुभाष चंद्र बोस के सगे संबंधी आरएसएस की विचारधारा से सहमत नहीं थे। सुभाष चंद्र बोस के परिवार जनों ने कोलकाता के शाहिद मीनार में किए गए कार्यक्रम से अपने आपको अलग कर लिया।  उनका कहना था कि आर एस एस  सुभाष चंद्र की क्रांतिकारी सोच, सबको साथ लेने की थी।

       नेताजी सुभाष चंद्र बोस की बेटी अनीता बोस फाफ ने जर्मनी में अपने घर से दिए एक बयान में कहा है कि आरएसएस की विचारधारा उसके पिता के आदर्शों से मेल नहीं खाती।  उनका कहना था कि मेरे पिता एक हिंदू थे मगर वह सब धर्मों के लोगों का आदर करते थे और उनका मानना था कि हर एक को एक साथ रहना चाहिए, आर एस एस उनकी इस विचारधारा में विश्वास नहीं रखती।

      उनकी बेटी ने कहा है कि यह आर एस एस के लिए अच्छा होगा कि वह नेता जी की विचारधारा को आत्मसात करें। नेताजी धर्मनिरपेक्षता के सिद्धांत में विश्वास करते थे जबकि आर एस एस का ऐसा मानना नहीं है। अगर आर एस एस हिंदुत्व के एजेंडे से चिपका रहना चाहती है तो यह नेता जी के विचारधारा से मेल नहीं खाएगी और मैं इसे अप्रिशिएट नहीं करूंगी।

       नेता जी के भतीजे चंद्र बोस, जो बीजेपी के पूर्व कार्यकर्ता है, उन्होंने बताया कि नेताजी के परिवार का कोई भी सदस्य आर एस एस ने, अपनी मीटिंग के लिए नहीं बुलाया है। उन्होंने कहा है कि अगर आर एस एस मुझे बुलाना चाहेगी तो सबसे पहले मोहन भागवत को यह खुलेआम घोषित करना पड़ेगा की अब यह आर एस एस नेता जी के विचारों से सहमत है। अगर वह ऐसा नहीं करती तो नेताजी की गले में फूल माला डालने से कोई परिणाम नहीं निकलने वाला है।

       उनका कहना है कि नेताजी सारे धर्म और संप्रदायों की एकता में विश्वास रखते थे। वह “भारतीयता” के सिद्धांत में विश्वास करते थे। आज भारत का धर्मनिरपेक्ष ताना-बाना समाज को तोड़ने वाली राजनीति से प्रभावित हो रहा है जिसका नेता जी ने जमकर विरोध किया था। नेताजी वर्तमान भारत के लिए आज भी प्रसांगिक हैं बस सब धर्म और समुदाय के लोगों के विकास का विचार किया जाए। उन्होंने कहा कि है दुर्भाग्य की बात है कि आज कई राजनीतिक पार्टियां नेताजी के सर्व कल्याण के विचारों में विश्वास नहीं रखती हैं।

        हकीकत यह है कि आर एस एस के पास अपना कोई स्वतंत्रता सेनानी नहीं है जिसे आर एस एस अपने लिए प्रचारित  प्रसारित कर सके। इसलिए वह कभी पटेल को अपनाने की विफल कोशिश करती है और अब नेताजी पर डोरे डाल रही है। मगर यहां नेताजी के निकट संबंधियों ने आर एस एस के इस अभियान की पोल खोल दी है।

       हमें यह जानने की जरूरत है कि नेताजी सुभाष चंद्र बोस भारत को एक संप्रभु, धर्मनिरपेक्ष, जनवादी, समाजवादी, गणतंत्र में देखते और विश्वास करते थे। वह भारत से सब तरह का अन्याय सामाजिक, राजनीतिक, आर्थिक खत्म करना चाहते थे। वह जातिवाद का खात्मा और विनाश चाहते थे। वह भारत में किसी भी तरह से आजादी, शांतिपूर्ण तरीके से या युद्ध के तरीके से, प्राप्त करना चाहते थे। इसको लेकर उन्होंने आजाद हिंद फौज का गठन किया था।

      सुभाष चंद्र बोस की 1938 कांग्रेस के अध्यक्ष काल में कांग्रेस का एक “मास कांटेक्ट” प्रोग्राम बनाया गया था जिसके तहत यह शर्त रखी गई थी कि सांप्रदायिक संगठनों ,,,, हिंदू महासभा, मुस्लिम लीग और आर एस एस के सदस्यों को, कांग्रेस का सदस्य नहीं बनाएंगे।

     हकीकत यह भी है कि सुभाष चंद्र बोस ने अपने भाषणों में अनेकों बार घोषित किया था कि “वे धर्मनिरपेक्षता के सिद्धांतों पर आधारित, भारत के पूर्णतः स्वाधीन, समाजवादी, गणराज्य के पक्ष में हैं” यही है सुभाष चंद्र बोस की असली विरासत।

       1944 में टोक्यो विश्वविद्यालय में दिए गए भाषण में सुभाष चंद्र बोस ने कहा था कि “हमारा दर्शन राष्ट्रीय समाजवाद और साम्यवाद का संश्लेषण होना चाहिए।” उन्होंने यह भी कहा था कि “भारत में एक नई पार्टी बनाई जानी चाहिए इस पार्टी का नाम ‘साम्यवादी संघ’ होगा। साम्यवादी संघ भारत की सामाजिक, आर्थिक, और राजनीतिक सभी प्रकार की स्वतंत्रता के लिए लड़ेगा।”

        सुभाष चंद्र बोस भारत के समस्त भारतवासियों, हिंदू मुसलमान की एकता में सबसे ज्यादा विश्वास करते थे। उनकी गतिविधियों और तमाम कार्यक्रमों को देखकर लगता है कि जैसे वे मुसलमान भारतीयों पर सबसे ज्यादा विश्वास करते थे। इसके कुछ उदाहरण आपके सामने हैं। एक, ”””””जब सुभाष चंद्र बोस जापान के तानाशाह तोजो से मिलने जा रहे थे तो उन्होंने दक्षिण अफ्रीका से जाते हुए आबिद हसन को अपने साथ लिया था और इस पूरी समुद्री यात्रा में आबिद हसन उनके साथ थे। यह वही आबिद हसन हैं जिन्होंने “जय हिंद” का नारा दिया था।

      दूसरे,”””” जब जापान के तानाशाह तोजो से आजादी को लेकर सुभाष चंद्र बोस के विचार मेल नहीं खाए तो उन्होंने स्टालिन से मिलने के लिए रूस जाने की योजना बनाई। जब टाइपिंग से हवाई जहाज में नेताजी सुभाष चन्द्र बोस रूसी राष्ट्रपति स्टालिन से मिलने जा रहे थे तो उनके साथ हबीबुर्रहमान थे।

      तीसरे,”””” जब सुभाष चंद्र बोस ने आजाद हिंद फौज बनाई तो उसमें उनके सैनिक विभाग में आठ सैन्य अधिकारी लोग शामिल थे जिनमें चार हिंदू थे चार मुसलमान थे। चौथे,”””” जब आजाद हिंद फौज के जनरल बनाने की बात आई तो सुभाष चंद्र बोस ने, जनरल सहगल, जनरल ढिल्लो और जनरल शाहनवाज को शामिल किया और पांचवें,”””” जब सुभाष चंद्र बोस आजाद हिंद का गठन कर रहे थे तो उन्होंने आजाद हिंद फौज की जो ब्रिगेड बनाईं थीं तो उनमें गांधी ब्रिगेड, नेहरू ब्रिगेड, पटेल ब्रिगेड, आजाद ब्रिगेड और सुभाष ब्रिगेड शामिल थीं और इसी के साथ साथ रानी लक्ष्मीबाई रेजीमेंट भी शामिल थी। इस प्रकार सुभाष चंद्र बोस भारत के प्रथम स्वतंत्र संग्राम में 1857 की महान विरासत, हिंदू मुस्लिम एकता की विरासत को आगे बढ़ा रहे थे।

     सुभाष चंद्र बोस ने अपने जीवनकाल 1941 में एक अखिल भारतीय फॉरवर्ड ब्लॉक नामक पार्टी की स्थापना की थी जो भारत की पूर्ण आजादी, जनतंत्र, धर्मनिरपेक्षता, समाजवाद और गणतंत्र सिद्धांतों में विश्वास करती थी आज भी उसकी यही नीति है। सुभाष चंद्र बोस की स्थापित यही पार्टी पिछले पचास साल से भी अधिक बंगाल में “लेफ्ट फ्रंट” के तहत काम कर रही है।

         इस प्रकार हम देखते हैं कि सुभाष चंद्र बोस, किसी हिंदू या मुसलमान में नहीं, किसी साम्प्रदायिक विचारधारा या संगठन में विश्वास नहीं करते थे, बल्कि वे धर्मनिरपेक्षता के सिद्धांतों और हिंदू मुस्लिम एकता की महान विरासत में सबसे ज्यादा विश्वास करते थे। वे हिंदू मुस्लिम एकता की विरासत में सबसे ज्यादा विश्वास करते थे। सारे के सारे भारतीयों की एकता और अखंडता में और सारे भारतीयों की भलाई और कल्याण में विश्वास करते थे। वे किसी एक धर्म विशेष या सम्प्रदाय विशेष का ही भला नही चाहते थे। वे भारत में पूर्ण स्वतंत्रता पर आधारित जनतांत्रिक, धर्मनिरपेक्ष, समाजवादी, गणतंत्र संघ बनाना चाहते थे। यही है सुभाष चंद्र बोस की असली हकीकत और हमें इस हकीकत को एक बार फिर जनता के सामने ले जाना चाहिए।

      इस प्रकार, महान क्रांतिकारी, देशभक्त और आजादी के स्वप्नदर्ष्टा, सुभाष चंद्र बोस की बेटी अनीता बोस फाफ और उनके भतीजे चंद्र बोस ने, नेताजी सुभाष चन्द्र बोस को अपनाने की और साम्प्रदायिक छबि गढ़ने की, आर एस एस की योजना में पलीता लगा दिया है।

Ramswaroop Mantri

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