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तंत्र विद्या के छलावे से दूर रहें ध्यान साधक

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डॉ. विकास मानव

    _विभिन्न ऑनलाइन-ऑफलाइन न्यूज़ पोर्टल/मैगज़ीन में मेरे तंत्र विषयक लेख-घटनाक्रम पढ़कर युवक-युवतियों द्वारा मुझे किसी क़ीमत पर यह विद्या सिखाने के लिए लिखा जाता है और ध्यानसाधना का निःशुल्क प्रशिक्षण लेने के लिए मेरा आमंत्रण तक स्वीकार नहीं किया जाता है. बेशक मैं तंत्रसाधना का कोई स्तर शेष नहीं छोड़ा हूँ. लेकिन मैं इस विद्या की किसी भी शक्ति का कोई प्रयोग-प्रदर्शन नहीं करता. मेरा सारा जोर ध्यान पर होता है. मैं तंत्र के क्षेत्र में युवावर्ग को नहीं जाने देना चाहता. क्यों? यह लेख इसी क्यों का जबाब है._

   तांत्रिक विध्या का तंत्र-साधना या ध्यान-साधना से कोई भी लेना-देना नहीं है। यह सारा धंधा सम्मोहन, तीसरी आंख और अचेतन मन के दुरुपयोग पर टिका हुआ है। तांत्रिक विध्या में जो लोग लगे हुए होते हैं उन्हें तो इस विज्ञान का सही-सही पता भी नहीं होता है! उन्हें तो यह जानकारी ही नहीं होती है कि वे अचेतन, तीसरी आंख और सम्मोहन का प्रयोग कर रहे हैं, क्योंकि वे लगभग अनपढ़ होते हैं और इस विज्ञान की उन्हें कोई समझ ही नहीं होती है।

       वे इसे वैज्ञानिक तथ्य तो समझते ही नहीं हैं, वे तो इसे देवी-देवताओं का चमत्कार समझते हैं और वे ऐसा कहते भी हैं। यदि उनमें इसकी कोई समझ होती तो वे इस विज्ञान का व्यवस्थित और परोपकार के लिए उपयोग करते और किसी देवी-देवताओं का सहारा नहीं लेते! 

    सम्मोहन और तीसरी आंख या कहें कि मन के विज्ञान का उन्हें कोई पता ही नहीं होता है। इस विज्ञान से संबंधित बहुत थोड़े से और अधूरे सूत्र ही उनके हाथ में होते हैं जो खतरनाक सिद्ध होते हैं। तभी तो कई बार इसमें या तो लोग विक्षिप्त हो जाते हैं या फिर अपनी जान गंवा देते हैं। 

तांत्रिक विध्या में एक प्रयोग है जिसे यह लोग ‘अंजन चढ़ाना’ कहते हैं। इस प्रयोग के जानने वाले सिर्फ और सिर्फ धन अर्जित करने, गड़ा हुआ धन देखकर प्राप्त करने, और जुएं का नंबर देखने के लिए ही इस सम्मोहन और तीसरी आंख के विज्ञान का दुरुपयोग करते हैं।

     जो विज्ञान उन्हें मुक्त कर सकता है उसी विज्ञान में वे बुरी तरह से भटक जाते हैं और अपना तथा दूसरों का नुकसान करते रहते हैं। 

      तांत्रिक विध्या के इस प्रयोग में जिस व्यक्ति ने अपनी मां के पेट से पैरों की तरफ से जन्म लिया है, उसकी महत्वपूर्ण भूमिका होती है। उसे पग-पालिया कहा गया है। जिसने संसार में अपने पैरों को पहले पाया है, जो अपने पैरों की तरफ से पैदा हुआ है।

सामान्यतः बच्चे मां के पेट में उल्टे होते हैं और सिर की तरफ से जन्म लेते है। लेकिन कुछ बच्चे सीधे होते हैं और पैरों की तरफ से जन्म लेते हैं। 

     ऐसा व्यक्ति जिसने अपनी मां के पेट से पैरों की तरफ से जन्म लिया है, वह व्यक्ति महत्व का होता है। जब हम पैदा होते हैं तो उस समय ग्रह नक्षत्रों की जो दशा होती है वह हमारे शरीर और चेतना के तलों को प्रभावित करती है।

       जब हमारा जन्म होता है तो पहले हमारा सिर बाहर आता है, फिर बाकी शरीर, तो प्रकृति में सारे ग्रहों का जो प्रभाव होता है वह पहले हमारे सिर पर होता है फिर जैसे-जैसे शेष शरीर बाहर आता है बाकी शरीर भी प्रकृति के प्रभाव में आ जाता है। लेकिन जो व्यक्ति पैरों के तरफ से जन्म लेता है उसके पहले पैर बाहर आते हैं फिर बाकी शरीर बाहर आता है और अंत में सिर बाहर आता है।

       जब तक उसका सिर बाहर आता है तब तक उसका शरीर प्रकृति के सारे प्रभावों को झेल चुका होता है। अतः उसका सिर कम प्रभावित होता जिससे उसका आज्ञाचक्र बहुत ज्यादा संवेदनशील हो जाता है। इसलिए पग-पालिया व्यक्ति की तांत्रिक-विध्या में महत्वपूर्ण भूमिका होती है। 

आज ऐसा व्यक्ति खोजना मुश्किल है जिसका पैरों के तरफ से जन्म हुआ हो। क्योंकि मां के पेट में बच्चा यदि सीधा होता है, उसके पैरों की ओर से जन्म लेने की संभावना हो तो मां और बच्चा दोनों की जान को खतरा है। क्योंकि जब बच्चा मां के पेट में होता है तो उसका सिर बड़ा होता है और कंधे तथा छाती सिर से छोटे होते हैं।

      बाहर आने के बाद छाती और कंधे बड़े हो जाते हैं और सिर छोटा हो जाता है। अतः यदि मां के पेट से पहले सिर बाहर आ जाएगा तो बाकी शरीर आसानी से बाहर आ जाएगा क्योंकि सिर कंधों से बड़ा होता है। और यदि पैर पहले बाहर आ जाते हैं तो बड़ा होने की वजह से बच्चे का सिर अंदर फंस सकता है और दम घुटने से बच्चे की मौत होने की संभावना हो सकती है और मां को संक्रमण हो सकता है।

        इसीलिए बच्चा यदि मां के पेट में सीधा होता है, यानि उसकी पैरों की तरफ से जन्मने की संभावना हो तो डाक्टर आपरेशन करके बच्चे को बाहर निकालते हैं। सामान्य प्रसूति नहीं करवाते हैं। पहले आप्रेशन की इतनी सुविधाएं नहीं थीं, तो सामान्य प्रसूतियां ही होती थीं और कुछ बच्चे जो सीधे होते थे, वे पैरों की तरफ जन्म लेते थे। सभी बच्चों के सिर नहीं फंसते थे, किसी-किसी बच्चों के साथ ऐसा होता था।

आज भी हमारे यहां सरकारी अस्पतालों में लगभग सामान्य प्रसूतियां ही होतीं हैं! लेकिन पैरों की तरफ से पैदा होने वाले बच्चे को आप्रेशन करके ही मां के पेट से बाहर निकालते हैं। हमारे पास सुविधाएं हैं तो फिर खतरा उठाने की जरूरत नहीं रह जाती है? 

      तंत्र-विद्या में इस पग-पालिया व्यक्ति की, जिसने अपनी मां के पेट से पैरों की तरफ से जन्म लिया है, ऐसे व्यक्ति की महत्वपूर्ण भूमिका होती है क्योंकि इस व्यक्ति का आज्ञाचक्र जिसे तीसरी आंख कहा गया है सामन्य व्यक्ति से बहुत ज्यादा संवेदनशील होता है, जिसे बहुत ही आसानी से प्रभावित किया जा सकता है।

       इस पग-पालिया व्यक्ति को सम्मोहित करके इसके चेतन मन को सुलाकर, इसी व्यक्ति के अचेतन से संपर्क करके, इसी व्यक्ति के अतिचेतन से चिजों को देखा जाता है। 

      हमारा अतिचेतन सक्रिय है लेकिन हम उसके प्रति सजग नहीं है। हम तो अपने चेतन मन के प्रति भी सजग नहीं हैं।

यदि हम अपने चेतन मन के प्रति सजग या होश से भर जाते हैं, हम अपने विचारों को शिथिल कर लेते हैं तो हमारा अचेतन मन में प्रवेश हो जाता है। और यदि हमारा अचेतन मन में प्रवेश हो जाता है तो हम आंख बंद करके अतिचेतन का देखने के लिए उपयोग कर सकते हैं, क्योंकि यह एक वैज्ञानिक तथ्य है। 

     तंत्र विद्या में तांत्रिक इस व्यक्ति को सम्मोहित करता है। वह देवी देवताओं के नाम लेता है, उनकी जय बोलता है, उनके नाम पर मंत्र पढ़ता है, जिससे वाहक के मन पर मनोवैज्ञानिक प्रभाव होता है, उसे भरोसा आ जाता है कि जिस देवता का आह्वान तांत्रिक ने किया है वह उसकी रक्षा करेगा और वह निर्भय होकर सम्मोहन में प्रवेश कर जाता है। 

      उसे आराम कुर्सी पर या दीवार के सहारे विश्राम अवस्था में बिठाया जाता है। उसके ऊपर पतली चादर ओढ़ा दी जाती है ताकी प्रकाश हल्का हो जाए, क्योंकि प्रकाश ज्यादा होगा तो वाहक को अचेतन में प्रवेश करने में असुविधा होगी। और दूसरों को पता भी नहीं चलेगा कि भीतर क्या हो रहा है।

        उसके दाहिने हाथ की हथेली पर, हथेली में समा जाए इतना छोटा सा गोल आईना रख दिया जाता है, आईना इतना छोटा होता है कि उसमें सिर्फ उसकी दोनों आंखें ही दिखलाई पड़ती है।

     जिस हथेली पर आईना रखते हैं उसी हाथ की मध्यमा उंगली, बीच वाली बड़ी उंगली को दोनों आंखों के बीच आज्ञाचक्र पर टिका दिया जाता है, जिससे उसकी दोनों आंखें हथेली पर रखे आईने के एकदम पास आ जाती है और आईने में उसे सिर्फ अपनी दोनों आंखें ही दिखाई देती है। जैसे ही मध्यमा उंगली तीसरी आंख को छूती है वह कंपीत होने लगती है।

 यदि हम अपनी दोनों आंखों को बंद करके, दोनों आंखों के बीच स्थित तीसरी आंख के पास पेंसिल या फिर अपनी उंगली ले जाते हैं तो वहां कंपन होने लगता है, क्योंकि वह बहुत ही संवेदनशील है। 

     तांत्रिक उस व्यक्ति को आईने में दिख रही अपनी आंखों में एकटक देखने को कहता है।

    ज्यों ही वह व्यक्ति, वह वाहक आईने में अपनी दोनों आंखों में देखता है, दोनों आंखों की उर्जा आईने से टकराकर वापस आंखों की तरफ लौटती है, तो उंगली रखने से आज्ञाचक्र कंपीत होने की वजह से तुरंत दोनों आंखों की आईने से टकराकर लौटती हुई उर्जा को अपनी ओर खींच लेता है और उसकी दोनों आंखें आईने पर थींर हो जाती है। ठहर जाती है। और दोनों आंखों की बाहर देखने वाली ऊर्जा आईने से टकराकर तीसरी आंख में प्रवाहित होने लगती है। 

जब दोनों आंखों की देखने वाली ऊर्जा आईने से टकराकर आज्ञाचक्र यानी दोनों आंखों के बीच स्थित तीसरी आंख में प्रवाहित होने लगती है, तो तीसरी आंख वाहक की दोनों आंखों को पूरी तरह से सम्मोहित कर लेती है। दोनों आंखों के आगे अंधेरा छा जाता है। क्योंकि देखने को कुछ है ही नहीं, आंखें अपने को ही देख रही होती है और अचानक उनकी उर्जा तीसरी आंख खींच लेती है।

     अतः दोनों आंखों के पास देखने के लिए ऊर्जा नहीं होती है और उनके आगे अंधकार छा जाता है और वाहक का शरीर सम्मोहन वाली नींद में प्रवेश करने लगता है। 

      हमारी आंखें विचारों के साथ गति करती हैं । यदि विचार ठहर जाएंगे तो आंखें भी ठहर जाएंगी और इसके उलट यदि हम आंखों को ठहरा लेते हैं तो हमारे विचार भी ठहर जाते हैं। हमने बुद्ध पुरूषों की आंखों को ठहरा हुआ देखा है, क्योंकि उनके विचार ठहर गए हैं। 

     जब वाहक दोनों आंखों से अपनी हथेली पर रखे आईने में देखता है तो उसकी आंखों की उर्जा आईने टकराकर वापस लौटती है… तब मध्यमा उंगली से कंपीत हो रही तीसरी आंख दोनों आंखों की आईने से लौटती हुई उर्जा को तुरंत अपनी ओर लपक सा लेती है। 

जैसे ही तीसरी आंख आईने से टकराकर लौटती हुई दोनों आंखों की उर्जा को अपनी ओर खींचती है, दोनों आंखें वहीं आईने में ठहर जाती है। और जैसे ही दोनों आंखें ठहरती है, वाहक के विचार भी ठहर जाते हैं।

      और ज्यों ही विचार ठहरते हैं, वाहक के शरीर से सारे तनाव हट जाते हैं, उसकी श्वास नभि तक जाने लगती है और उसका शरीर नींद में जाने लगता है। शरीर के नींद में जाते ही उसका चेतन मन सो जाता है और अचेतन मन जाग जाता है।

      चूंकि चेतन मन तांत्रिक के संपर्क में होता है और जैसे ही चेतन मन सोता है और अचेतन जागता है, तांत्रिक के सुझाव अचेतन मन सुनने लगता है और उसका अनुपालन करने लगता है। क्योंकि चेतन मन सोने के पूर्व अचेतन को अपनी बात का अंतिम सिरा थमा जाता है और अचेतन उसी बात पर आगे काम करने लगता है।

        यानि वह तांत्रिक के संपर्क में आ जाता है। चेतन मन के सोते ही और अचेतन मन के जागते ही वाहक का शरीर विश्राम में चला जाता है, और सम्मोहन वाली नींद में प्रवेश कर जाता है। 

अब तांत्रिक वाहक के अचेतन मन से उसका नाम पूछता है और फिर उसे देखने को कहता है   कि “देखो… तुम्हें कुछ दिखाई पड़ रहा है। कि फलां जगह पर क्या दिखाई दे रहा है?” वाहक का अचेतन देखने की कोशिश करता है और उसे चिजें दिखाई देने लगती है।

      वाहक के स्थूल शरीर की आंखों के आगे तो अंधेरा है। वे निष्क्रिय हैं, क्योंकि स्थूल शरीर सम्मोहन की नींद में चला गया है, और दोनों आंखों से देखने वाला चेतन मन भी दोनों आंखों के तीसरी आंख में थीर होने के बाद विचारों के रुकने से सो गया है और अचेतन जाग गया है। तथा दोनों आंखों की ऊर्जा तीसरी आंख में प्रवाहित हो रही होती है। 

      तीसरी आंख यानी कि आज्ञाचक का यहां इतना ही काम है कि आईने द्वारा दोनों आंखों को उसमें में ठहरा दिया जाए, जिससे दोनों आंखों की उर्जा तीसरी आंख में प्रवाहित होने लगे, विचार ठहर जाए और विचारों के ठहरते ही शरीर शिथिल होकर नींद चला जाए, जिससे चेतन मन सो जाए और अचेतन मन जाग जाए।

     यानि तीसरी आंख का उपयोग चेतन मन को सुलाकर अचेतन मन को जगाने के लिए किया जाता है। 

     तीसरी आंख के चुंबकीय आकर्षण के कारण कभी-कभी तो मध्यमा उंगली वाहक की तीसरी आंख से इतना बुरी तरह से चिपकती है कि दो आदमी मिलकर अपनी ताकत लगाते हैं तब कहीं तीसरी आंख से उंगली को अलग कर पाते हैं।

तीसरी आंख का खींचाव इतना ज्यादा होता है कि तीसरी आंख वाली जगह में उंगली का गढ्ढा बन जाता है। तीसरी आंख के इसी खींचाव के कारण वाहक गहरी नींद में चला जाता है। और गहरी नींद में वह अचेतन से अतिचेतन मन में प्रवेश कर जाता है और उसे चिजें दिखाई देने लगती है। 

       चेतन मन दोनों आंखों से ज्ञात को देखता है स्थूल जगत को देखता है और हमारा अचेतन मन अज्ञात को देखता है, सूक्ष्म जगत को देखता है। चेतन मन विचार करता है और अचेतन मन विचार को सपना बनाता है और अतिचेतन सपने को दर्शन बनाकर देखता है।

     यानि अतिचेतन में जागने पर हमें दर्शन उपलब्ध होता है और हम अपनी आंखों को बंद करके भी चिजों को देखने लगते हैं। 

     दोनों आंखों से हम ज्ञात जगत को देखते हैं और अचेतन से हम अज्ञात जगत को देख सकते हैं। इसके लिए हमारे चेतन मन का सोना और अचेतन मन का जागना जरूरी है।

चेतन मन जब सो जाता है तो अचेतन मन अतिचेतन मन का उपयोग कर अज्ञात जगत को देखने लगता है। चूंकि नींद में अचेतन मन जब जागता है तो हम बेहश हो जाते हैं इसलिए अचेतन हमें सपने में ले जाता है। यदि हम नींद में जाग जाते हैं, साक्षी हो जाते हैं तो हमारा अचेतन मन सपने की जगह हमें अतिचेतन के द्वारा हकीकत को दिखाने लगेगा। 

      हमारी जो ऊर्जा जागते में चेतन मन विचारों में खर्च करता है, उसी उर्जा को नींद आने पर अचेतन मन स्वप्न में खर्च करता है और अचेतन मन में जागने पर, यानि सपने में जागने पर यही उर्जा अतिचेतन पर दर्शन बनकर दूर की चिजों को देखने में काम आने लगती है। 

      तांत्रिक विद्या की इस प्रक्रिया में ज्यादातर असफलता ही हाथ आती है। क्योंकि वाहक का कभी-कभी भय के कारण चेतन मन पूरी तरह से सो नहीं पाता है और उसका अचेतन मन में पूरी तरह से प्रवेश ही नहीं हो पाता है इसलिए कभी-कभी अचेतन जुंए के नंबर और गड़े हुए धन का सपना भी दिखा देता है।

       लगभग ज्यादातर मौकों पर इन्हे असफलता ही हाथ लगती है। लेकिन एक सफलता और-और प्रयासों को जन्म देती है और वे इसमें उलझे रहते हैं। 

सम्मोहन की इस प्रक्रिया में अचेतन मन के तल पर खड़े वाहक को गहरा ले जाने के लिए तांत्रिक को स्वयं भी अचेतन मन के तल पर आना होता है। और अचेतन मन के तल पर आने के लिए शरीर का नींद की भावदशा में होना जरूरी है। इसलिए यह लोग गांजा या शराब का प्रयोग करते हैं ताकि शरीर नींद की भावदशा में आ जाए और इनका अचेतन मन में प्रवेश हो सके।

      इस चक्कर में इन्हें रोज नशा करना पड़ता है और परिणाम स्वरूप ये गंभीर बिमारियों से पीड़ित होकर मरते हैं। 

      तो तांत्रिक विद्या एक छलावा है, इससे किसी का कोई भी आत्मिक लाभ नहीं होता है। और ध्यानी को, साधक को इन सब बातों से दूर ही रहना चाहिए।

Ramswaroop Mantri

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