सरकार और संगठन के नेताओ में शुरू हुई बदलाव की धुकधुकी
दक्षिण की एक बड़ी हार ने प्रदेश में समूची भाजपा की बोलती बंद कर दी हैं। कर्नाटक के नतीजों को आये 48 घण्टे बीत गए, बड़े और बड़बोले नेताओ के भी मुंह सिले हुए हैं। सब तरफ खामोशी और सन्नाटा पसरा हुआ हैं? भाजपा की अंदरूनी राजनीति के जानकर इसे तूफान के पहले का सन्नाटा करार दे रहे है तो जो सत्ता में है वे दावा कर रहे है कि सब कुछ ” एज इट इज ” ही रहना हैं। बावजूद इसके सबकी दिल्ली दरबार की तरफ टकटकी लगी हैं और दिल मे है धुकधुकी है कि सरकार और का चेहरा बदलायेगा?*
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नितिनमोहन शर्मा।
_” ऑपरेशन लोटस” के जरिये सत्ता में फिर से लौटा एमपी, अब दिल्ली दरबार की राडार पर आ गया हैं। हालांकि चुनाव तो बगल के छत्तीसगढ़ और राजस्थान में भी हैं लेकिन दिल्ली की चिंता देश का दिल यानी एमपी हैं। गुजरात के बाद एमपी ही है जो कमलदल का मजबूत गढ़ हैं। इस गढ़ को बचाकर रखना अब दिल्ली दरबार के लिए बेहद अहम हो चला हैं। सूत्र इशारा कर रहे है कि जल्द ही एमपी को लेकर कोई ठोस और बड़ा कदम उठाया जाएगा। इसके चलते प्रदेश में सरकार और संगठन के शीर्ष नेताओ में धुकधुकी शुरू हो गई हैं। सब तरफ एक ही सवाल तैर रहा है कि क्या सरकार के मुखिया बने रहेंगे या केंद्रीय नेतृत्व कोई जोखिम लेगा? संगठन के मुखिया की जगह कोई नया आएगा या एक्सटेंशन देकर काम चलाया जाएगा। दक्षिण की बड़ी हार के सदमे से केंद्रीय नेतृत्व के उबरते ही एमपी के लिए नई इबारत लिखी जाएगी। तब तक प्रदेश भाजपा के दिग्गजों की सांसे ऊपर होती रहेगी।_
*कर्नाटक के नतीजे सामने आने के बाद से ही प्रदेश भाजपा में सन्नाटा पसरा हुआ हैं। सारे बड़े नेताओं की बोलती बंद हैं। इस बड़ी हार पर बड़े और बड़बोले नेताओं की सफाई तक सामने नही आई। सब तरफ़ तूफान से पहले वाली ख़ामोशी पसरी हुई हैं। उधर कांग्रेस का उत्साह कुलाँचे मार रहा हैं और वो रामजी हनुमानजी के पोस्टर कटआउट के संग जीत का जश मना रही है और लड्डू पेड़े बाट रही हैं। मजे की बात है कि कांग्रेस नेता और कार्यकर्ता जीत का जश्न गले मे भगवा दुपट्टा डालकर मना रहे हैं। कांग्रेस की ये नई रणनीति भाजपाइयो को जमकर चिड़ा रही हैं। पर वे कर भी क्या सकते हैं। सिवाय इंतजार के कि केंद्रीय नेतृत्व एमपी को लेकर क्या करने वाला हैं।*
जो सत्ता के साथ है, उनका मत है कि बदलेगा कुछ नही। न सीएम न संगठन अध्यक्ष, महामंत्री। इसी नेतृत्व के साथ मिशन 2023 में उतरेंगे। क्योकि अब इतना समय नही की पार्टी इस स्तर पर जाकर जोखिम उठाये कि सरकार और संगठन का चेहरा बदल दें। जो सत्ता के बाद भी हाशिये पर हैं, वे नेता प्रदेश में आमूलचूल बदलाव की उम्मीद रखे हुए हैं और उत्तराखंड का उदाहरण सामने रख रहे है कि वहां चुनाव के 6 महीने पहले सीएम का चेहरा बदला गया और उसका परिणाम पॉजिटिव आया। पार्टी सत्ता में लौट आई।
*अब ये दिल्ली दरबार के कलेजे पर है कि वो कितना और किस स्तर का जोख़िम उठा सकता हैं? कर्नाटक की तर्ज पर एमपी में भी पीएम मोदी के चेहरे को आगे रखकर चुनाव लड़ने की रणनीति पर काम शुरू भी हो गया हैं। लेकिन कर्नाटक में जिस तरह से स्थानीय मुद्दों ने पीएम की मेहनत पर पूरी तरह पानी फेर दिया, उसे देखकर लगता है कि शीर्ष नेतृत्व नए सिरे से कोई रणनीति बनाये। इसकी उम्मीद ज्यादा है और ये उम्मीद ही सत्ता और संगठन के शीर्ष पर बेठे नेताओ को राहत दे रही है कि मोदी स्वयम को एक बार फिर से पूरी तरह शायद ही दांव पर लगाये। क्योकि अगर उनके चेहरे को सामने रखने के बाद भी अगर एमपी हार गए तो पीएम की छवि पर गहरा असर होगा जो 2024 के आम चुनाव के लिहाज से ठीक नही होगा। हालांकि हिंदी बेल्ट होने के कारण भाजपा का मानना है कि हिंदी पट्टी में मोदी मैजिक बरकरार हैं। यूपी के नगरीय निकायों के चुनाव का हवाला भी दिया जा रहा है जहां पार्टी ने सभी 17 मेयर जीत लिए।*
एमपी में बदलाव की वकालत करने वालो का मजबूत तर्क है कि बदलाव तो जरूरी ही नही, अवश्यम्भावी हैं। अन्यथा उन सब सर्वो का क्या होगा जो सरकार, संगठन और संघ ने किए हैं। *इन सर्वो ने एमपी में बीजेपी की जमीनी हालातों को कमज़ोर बताया हैं। सरकार और संगठन में तालमेल के अभाव, मंत्रियों के भृष्टाचार व कार्यकर्ताओ से दूरी, पुराने नेताओ और कार्यकर्ताओ की नाराजगी को सभी सर्वे ने स्वीकारा हैं।* क्षेत्रीय संगठन मुखिया अजय जामवाल ने जमीनी स्तर से फ़ीडबैक लेने की जो कवायद की थी उसे सरकार ने बड़े नेताओं को मैदान में उतारकर आगे बड़ाया था। सभी सर्वे की रिपोर्ट तो संघ और केंद्रीय नेतृत्व तक पहुँची तो जरूर लेकिन उस पर कर्नाटक चुनाव के मद्देनजर एक्शन नही लिया गया था। एमपी में बदलाव देखने वाले इन्ही सर्वे को आधार बना रहे हैं और दावा कर रहे है कि एमपी में दिल्ली दरबार चौकाने वाले फैसले लेगा।





