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समाजवाद के मर्म को समझ कर धरती पर उतारना होगा समाजवाद को 

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मुनेश त्यागी 

       आजकल पिछली सदी के तीसरे दशक में बनी समाजवादी पार्टी के निर्माण के अवसर पर भारत के अधिकांश समाजवादी कार्यकर्ताओं, लेखकों और समाजवादी बुद्धिजीवियों द्वारा समाजवाद पर बहुत गहन चर्चा हो रही है। हम समाजवाद और वैज्ञानिक समाजवाद के बारे में बहुत चर्चाएं सुनते आए हैं। हमारे बहुत सारे मित्र, जो समाजवादी विचारों से प्रभावित रहे हैं,भी कई बार समाजवाद की बात किया करते थे। हम कई बार सोचा भी करते थे कि आखिर यह समाजवाद क्या है? और इसके बारे में जानने की इच्छा लगातार बलवती होती चली गई।

     कम्युनिस्ट पार्टी में आकर संघर्ष और पढाई पढ़ते-पढ़ते पता चला कि समाजवाद के असली जनक कार्ल मार्क्स और एंगेल्स हैं जिन्होंने समाजवाद को वैज्ञानिक समाजवाद की संज्ञा दी और 19वीं सदी के उत्तरार्द्ध से दुनिया में वैज्ञानिक समाजवाद की धूम मच गई, जो आज भी दुनिया की सर्वश्रेष्ठ और सबसे चर्चित विचारधारा का रूप धारण किए हुए हैं।

     अब यहां पर यह जानना आवश्यक है कि आखिर यह वैज्ञानिक समाजवाद क्या है? संक्षेप में इसे जानना बहुत जरूरी है। कार्ल मार्क्स ने मानव समाज का अध्ययन करके बताया कि मानव समाज अभी तक आदिम साम्यवाद, दास समाज, सामंती समाज, पूंजीवादी समाज से होकर गुजरा है। इसके आगे का विकास समाजवादी समाज से होकर गुजरेगा और इस समाजवाद को ही मार्क्स ने वैज्ञानिक समाजवाद की संज्ञा दी और बताया कि पूंजीवादी व्यवस्था के बाद दुनिया में समाजवादी व्यवस्था कायम होगी और आज इसे ही आज वैज्ञानिक समाजवाद कहा जाता है।

      वैज्ञानिक समाजवादी व्यवस्था में मार्क्स और एंगेल्स ने अवधारित किया था कि दुनिया में दो वर्ग हैं पूंजीपति वर्ग और मजदूर वर्ग, पूंजीवादी व्यवस्था में पूंजीपतियों और मजदूर वर्ग के बीच जीवन मरण का संघर्ष होगा जिसके परिणाम स्वरूप मजदूर वर्ग के नेतृत्व में समाजवादी व्यवस्था कायम होगी और सरकार मजदूर वर्ग की होगी। यह व्यवस्था समाज के सब लोगों के कल्याण और सबके विकास के लिए काम करेगी, जिसमें सबको शिक्षा, सबको काम, सबको स्वास्थ्य, सबको घर मोहिया कराए जाएंगे और जमीन, जल, जंगल, उत्पादन और सार्वजनिक संपत्तियों पर समाज का कब्जा हो जाएगा।

    मार्क्स और एंगेल्स की इस विचारधारा को लेनिन और पुख्ता किया और पहली दफा किसानों और मजदूरों में एकता कायम करके कम्युनिस्ट पार्टी के नेतृत्व में, रुस में जार की सरकार से लोहा लिया और वहां पर भयंकर संघर्ष के बाद, जार की सत्ता को ध्वस्त करके, उसमें मजदूर और किसानों के नेतृत्व में मेहनतकशों का राज कायम किया गया। यह संघर्ष रूस की कम्युनिस्ट पार्टी के नेतृत्व में आगे बढ़ा और कम्युनिस्ट पार्टी के नेतृत्व में रूस में समाजवादी समाज की स्थापना की गई।

      क्रांति के बाद रूस में सबको मुफ्त शिक्षा, सबको मुफ्त इलाज, सब को मुफ्त बिजली, सबको घर मुहैया कराए गए। हजारों साल से चले आ रहे शोषण, अन्याय, भेदभाव और जुल्मों सितम का खात्मा करके समानता, न्याय और भाईचारे के सिद्धांतों पर समाजवादी व्यवस्था की स्थापना की गई। उत्पादन, वितरण, उद्योग, जमीन पर सब का निजी अधिकार खत्म करके इन सब को पूरे समाज की संपत्ति बना दिया गया। इस समाजवादी क्रांति के बाद, रूस दुनिया की एक महाशक्ति बन गया।

    1917 की रूसी क्रांति के बाद, दुनिया में सबसे पहले किसानों मजदूरों को अपना भाग्य विधाता बनाया गया। उनकी सरकार और सत्ता कायम की गई और समाज में शोषणरहित व्यवस्था कायम की गई और इस प्रकार मानव इतिहास में सबसे पहले वैज्ञानिक समाजवाद के सिद्धांतों को, अमलीजामा पहनाकर, धरती पर उतारा गया।

      इसके बाद दुनिया में वैज्ञानिक समाजवादी व्यवस्था की आंधी चल गई। देखते ही देखते दुनिया समाजवादी और पूंजीवादी दो धडों में बंट गई। उसके बाद चीन, पूर्वी यूरोप, कोरिया, वियतनाम, बोलिविया, क्यूबा और दुनिया का तीसरा हिस्सा, लाल हो गया। दुनिया दो हिस्सों में बंट गई, कमेरा यानी मेहनतकश वर्ग और लुटेरा यानी पूंजीपति वर्ग।

      इसके बाद पूरी दुनिया में समाजवाद की आंधी चल पड़ी। हमारा देश भी रुसी क्रांति के प्रभाव से अलग थलग न रह पाया। हमारे देश में कम्युनिस्ट पार्टी और हिंदुस्तानी समाजवादी गणतंत्र संघ के नेतृत्व में वैज्ञानिक समाजवादी व्यवस्था की व्याख्या और बड़े पैमाने पर प्रचार प्रसार किया गया। इस अभियान में भगत सिंह और उसके साथियों ने बहुत बड़ी भूमिका अदा की। उन्होंने इंकलाब जिंदाबाद का नारा दिया, इसे मजदूरों, किसानों, छात्रों और नौजवानों और सारी संघर्षरत जनता का नारा बनाया और कहा कि जब तक मार्क्सवादी सिद्धांतो पर आधारित समाजवादी व्यवस्था की स्थापना नहीं की जाती तब तक जनता को, किसानों, मजदूरों और मेहनतकशों को हजारों साल पुराने शोषण, अन्याय,दमन और भेदभाव से मुक्ति नहीं मिल सकती।

       भारत की कम्युनिस्ट पार्टी ने भी इस वैज्ञानिक समाजवादी व्यवस्था के अभियान को आगे बढ़ाया। इस अभियान ने करोड़ों किसानों, मजदूरों, नौजवानों, महिलाओं, लेखकों और नौजवानों को अपने आगोश में ले लिया। इस प्रकार पूरे भारत में वैज्ञानिक समाजवाद क्रांति और कम्युनिस्ट पार्टी की बयार बहने लगी। समाज और देश का बड़ा हिस्सा गीत, संगीत, फिल्में, लाल रंग की विचारधारा में रंग गयी।

     दुनिया और देश में छायी समाजवादी विचारधारा से, हमारे देश के दूसरे दल और व्यक्ति भी अछूते नहीं रहे।  कांग्रेस में राम मनोहर लोहिया, जयप्रकाश नारायण, नेहरू और बाद में मुलायम सिंह की समाजवादी पार्टी ने भी समाजवादी विचारों को आगे बढ़ाया और समाजवादी पार्टी की स्थापना की। लोहिया ने सप्त क्रांति की बात की थी। जयप्रकाश नारायण ने “सम्पूर्ण क्रान्ति” की बात कही। इंदिरा गांधी ने भारतीय संविधान की उद्देशिका यानी प्रीएम्बल में “समाजवाद” शब्द को शामिल किया।

      आज हम देख रहे हैं कि जयप्रकाश नारायण,  राम मनोहर लोहिया, मधु दंडवते और इंदिरा गांधी का समाजवाद विलुप्त हो गया है। समाजवादी पार्टी भी बस नाम की पार्टी रह गई है। समाजवादी पार्टी कई बार उत्तर प्रदेश में सरकार में आने के बाद भी समाजवादी उसूलों और वैज्ञानिक समाजवाद की विचारधारा को धरती पर नहीं उतर पाई, किसानों मजदूरों और आम जनता के हक में कोई वैज्ञानिक कार्यक्रम और प्रचार-प्रसार नहीं कर पाई और अब तो इसका वैज्ञानिक समाजवादी मूल्यों को आगे बढ़ाने में कोई मतलब और इच्छा शक्ति नहीं रह गयी है।

       आखिर ऐसा क्यों हुआ? कि दुनिया की आधुनिकतम और सबसे ज्यादा जनहितकारी समाजवादी व्यवस्था और उसके आदर्शों को भारत की जमीन पर नही उतारा जा सका और एक के बाद एक ये सब सिकुडते क्यों चले गए? ऐसा इसलिए हुआ कि ये तमाम लोग वैज्ञानिक समाजवाद के मर्म को समझ ही नहीं पाए। इन्होंने कभी भी वर्गीय आधार पर अपनी राजनीति नहीं की, वर्गीय आधार पर जनता के कल्याण का कोई प्रोग्राम नहीं बनाया। इन्होंने समाजवादी मर्म के बगैर ही, समाजवाद का भारतीयकरण करने की कोशिश की। ये सब के सब वैज्ञानिक समाजवादी कार्यक्रम, वर्गीय राजनीति, कम्युनिस्ट पार्टी की नेतृत्वकारी भूमिका, किसानों मजदूरों और जनता के संगठन, उनके कल्याण के कार्यक्रम और उनकी सरकार और सत्ता में किसानों मजदूरों की सरकार की अहम भूमिका को भूल गए और इन सब कारणों से इनका समाजवाद विलुप्त हो गया।

     समाजवादी विचारधारा केवल कल्पनाओं में ही नहीं बस्ती है, वह केवल भावनाओं में भी नहीं रहती है और उसे लेकर समाजवादी होने का प्रदर्शन करना, दिखावा करना और एक वहम पाल लेना ही समाजवादी हो जाना नहीं है। वैज्ञानिक समाजवादी, सच्चा समाजवादी बनने के लिए समाजवाद के मर्म को समझना जरूरी है, उसके सिद्धांतों को, उसकी अंतर्वस्तु को और उसकी चेतना को समझना और उसकी असली विचारधारा को धरती पर उतारना बहुत जरूरी है। ऐसा किए बगैर कोई भी आदमी, कार्यकर्ता या नेता, वैज्ञानिक समाजवादी नहीं बन सकता।

    हमने कई लोगों से सुना है कि पश्चिमी देशों का समाजवाद, पूंजीवादी व्यवस्था का “सेफ्टी वाल्व” है। आज जब हम इस बात पर गंभीरता से विचार करते हैं, तो हम पाते हैं कि वास्तव में काल्पनिक समाजवाद पूरी दुनिया में पूंजीवाद का समर्थक, उसे बचाने वाला और उसका सेफ्टी वाल ही बना हुआ है। भारत के संदर्भ में भी कमोबेश यही स्थिति बनी रही, क्योंकि उन्होंने कभी भी वर्गीय आधार पर राजनीति नहीं की, किसानों और मजदूरों की मुक्ति का कार्यक्रम नहीं बनाया। वे बस समाजवाद के नाम पर सत्ता और सरकार बनाते रहे। मगर जनता का असली कल्याण नहीं हो पाया। इससे जनता का एक बड़ा हिस्सा समाजवाद को लेकर गुमराह होता रहा और वैज्ञानिक समाजवादी विचारधारा जनता की नजरों में बदनाम होती रही। इनके नेतृत्व के स्वार्थी कारनामों को देखकर, जनता मजाक उड़ाती रही और पूछती रही कि क्या ऐसा ही होता है समाजवाद?

      ऐसा इसलिए भी हुआ कि ये सब के सब तथाकथित समाजवादी, वैज्ञानिक समाजवाद से, सचमुच का वास्ता और राफ्ता कायम ही नहीं कर पाए। इनके समाजवाद का, वैज्ञानिक समाजवाद और वर्गीय संरचना से कोई लेना-देना नहीं रहा, इसलिए समाजवादियों का समाजवाद, कुछ दिनों की चांदनी के बाद, विलुप्ति और भूल भुलैया के कगार पर पहुंच गया।

       आज के समाजवादियों द्वारा समाजवाद पर गंभीर चिंतन करना बेहद खुशी की बात है कि आखिरकार वे समझ रहे हैं कि जब तक समाजवाद की असली विषय वस्तु पर गौर करके समाजवादी सिद्धांतों को धरती पर नहीं उतारा जाएगा, तब तक समाजवादी व्यवस्था भारत में कामयाब नहीं हो सकती। इसके लिए उन्हें भारत की तमाम समाजवादी ताकतों और कम्युनिस्टों से विचार विमर्श करना होगा, उन सब के साथ एक कॉमन मिनिमम प्रोग्राम बनाना होगा और तमाम समाजवादियों और वामपंथी ताकतों का “कोमन मिनिमम प्रोग्राम” बनाकर, एक जंगी संयुक्त मोर्चा बनाना पड़ेगा, तभी जाकर भारत में समाजवादी व्यवस्था को मजबूती से कायम किया जा सकता है।

     क्योंकि जनहित का कॉमन मिनिमम प्रोग्राम बनाए बिना समाजवादी आदर्शों को धरती पर नहीं उतारा जा सकता। इसके लिए भारत के तमाम समाजवादियों को जनता के कल्याण के लिए एक प्रोग्राम बनाना पड़ेगा जिसमें सबको शिक्षा, सबको काम, सबको रोजगार, सबको स्वास्थ्य, किसानों को फसलों का वाजिब दाम, मजदूरों को न्यूनतम, वेतन देश की संपत्ति का जन कल्याण के लिए इस्तेमाल करना, धन पतियों पर आयकर लगाना, देश के तमाम बुजुर्गों को बारह हजार न्यूनतम पेंशन की व्यवस्था करना, देश में हिंदू मुस्लिम सांप्रदायिक सौहार्द की मुहिम चलाना जैसी जरूरी मांगों को शामिल करना होगा।

     भारत के आज के तमाम जुझारू समाजवादियों की यह सबसे बड़ी जिम्मेदारी है कि वे उन तमाम कारणों का पता लगाएं कि जिनकी वजह से समाजवादी व्यवस्था भारत में धरती पर नहीं उतर पाई। इसी के साथ साथ उन्हें समाजवाद की असली विषय वस्तु को भारत की धरती पर उतारने के लिए रूस, चीन, वियतनाम, उत्तरी कोरिया, क्यूबा, मैक्सिको, अर्जेंटीना, चिल्ली आदि तमाम देशों की समाजवादी उपलब्धियों पर गौर करके और वैज्ञानिक समाजवाद के असली मर्म को समझ कर, उसे भारत की धरती पर उतारने के समस्त संभव उपाय करने होंगे, तभी जाकर वे अपनी समाजवादी समाज कायम करने की मुहिम में कामयाब हो पायेंगे। समाजवादी मूल्यों को भारत की धरती पर उतारने की इस नई मुहिम में लगे भारत के तमाम समाजवादियों को बहुत-बहुत मुबारकबाद।

Ramswaroop Mantri

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