~ कुमार चैतन्य
“आस्थावाद यह सुविधा देता है कि हम उन अनिश्चितताओं और कठिनाइयों से बचकर निकल जाएं जिनसे एक अनास्थावादी ईमानदारी से जूझता है। और विडंबना यह कि आस्थावादी इसी पलायन के चलते जबरदस्त श्रेष्ठताबोध से भरा रहता है जब कि वस्तुत: यह उसकी कायरता है।”
— सिमन द बुआ.
इससे बड़ी विडंबना क्या हो सकती है कि जिन मज़हबों का आविष्कार मनुष्य की आदिम बर्बरता को नियंत्रित करने के लिए हुआ था, उन्हीं का इस्तेमाल वह अपनी बर्बरता को बढ़ाने के लिए कर रहा है?
आधुनिक तकनीक और आधुनिक हथियारों से लैस, कई गुना बढ़ाने के लिए।….[बंद विचारधाराएं भी धर्म की तरह ही काम करती हैं।]
मज़हब का उन्माद आदमी से बड़े-बड़े काम करवा लेता है–अच्छे भी, बुरे भी. मज़हब बरगलाने में उस्ताद है. बड़े सात्विक ढंग से बरगलाता है. और बड़े असरदार ढंग से बरगलाता है। इतने असरदार ढंग से कि अच्छा आदमी अच्छा होने के नाते जो अच्छा काम करता है, समझता है कि अपने मजहब के प्रभाव में कर रहा है.
बुरा आदमी बुरा होने के नाते जो बुरा काम करता है, वह भी समझता है, या कम से कम कहता है, कि अपने मज़हब के अनुसार कर रहा है। मज़हब का मक़सद पूरा कर रहा है. वह मजहब की उन बातों को चुनता है जो संदर्भ विशेष में सही हो सकती थीं , लेकिन सामान्य नियम के रूप में ग़लत होतीं, और बस अंधाधुंध उन्हीं को लागू करने में लग जाता है.
बुरा आदमी यहीं नहीं रुकता. अपनी सारी प्रकट-अप्रकट बुराइयों को मजहब से महिमामंडित कर कई गुना बढ़ा लेता है. सत्ता और वर्चस्व की इस तरह बढ़ी हुई भूख के चलते दूसरों का जीवन निर्धारित-नियंत्रित करने निकल पड़ता है. अपना उद्धार भूलकर दुनिया के उद्धार का ज़िम्मा अपने कंधों पर ले लेता है. फिर तो वह क्या-क्या नहीं करता ?
अपने अलावा बाक़ी लोगों को गुमराह क़रारकर उन्हें सही रास्ते पर लाने के लिए उनका सर भी उड़ा सकता है, ज़िंदा भी जला सकता है. महान धर्म के महान मक़सद को पूरा करने के लिए कुछ भी कर सकता है!
लेकिन मजहब की महिमा यहीं ख़त्म नहीं होती. यह जो अच्छा आदमी है न, वह उसी के मजहब से लैस बुरे आदमी का नंगा नाच देखकर उसे उस आदमी की बुराई का नतीज़ा कह कर टाल देता है,जब कि अपनी अच्छाई को आदमी की अच्छाई मानने के बजाए अपने मज़हब की अच्छाई माने रहता है.
तो क्या मज़हब के बिना अच्छा आदमी भी बुरा बनकर वैसा ही नंगा नाच करता, जैसा बुरा आदमी करता दिखाई पड़ता है ? मुझे तो संदेह है. लेकिन कोशिश करके देख लीजिए, मज़हब से अनुप्राणित अच्छा आदमी मानेगा नहीं, नाराज़ अलग से हो जाएगा.
एक सवाल :
जब ऐसी स्थिति उत्पन्न हो कि किसी मज़हब विशेष का होना ही संकट का कारण बन जाए, तो अस्तित्व की अनिश्चितताओं और कठिनाइयों को मजहब से स्वतंत्र होकर समझना और उनका समाधान निकालना अनिवार्य नहीं हो जाता?
अनास्थावादी हमेशा इसी काम में लगा रहता है और जो कुछ भी होता है, उसकी ज़िम्मेदारी अपने ऊपर लेता है।





