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इसलिए हुई पवार की एंट्री,शिंदे के 40 MLA की सदस्यता खतरे में, फडणवीस हो सकते हैं महाराष्ट्र के अगले CM

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मुंबई

महाराष्ट्र के सियासी समीकरण 2 जुलाई को एक बार फिर पलट गए। NCP नेता अजित पवार ने चाचा शरद पवार का दूसरी बार साथ छोड़ा और 8 सीनियर विधायकों के साथ BJP-शिवसेना (शिंदे गुट) सरकार में शामिल हो गए। सब कुछ सिर्फ एक घंटे में हुआ। NDA ने जितनी तेजी अजित पवार और उनके विधायकों को मंत्री बनाने में दिखाई, उतनी ही रफ्तार से अजित पवार को NCP से अलग किया गया।

अजित पवार 8 विधायकों के साथ दोपहर करीब 2 बजे राजभवन पहुंचे। 3 बजते-बजते CM शिंदे और डिप्टी CM देवेंद्र फडणवीस की मौजूदगी में सभी को मंत्री पद की शपथ दिला दी गई।

अजित पवार 8 विधायकों के साथ दोपहर करीब 2 बजे राजभवन पहुंचे। 3 बजते-बजते CM शिंदे और डिप्टी CM देवेंद्र फडणवीस की मौजूदगी में सभी को मंत्री पद की शपथ दिला दी गई।

भास्कर को BJP के एक करीबी सूत्र से पता चला है कि अजित पवार को सरकार में शामिल करने का फैसला सिर्फ दो दिन पहले लिया गया था। इसकी शुरुआत 28 जून से हुई। दिल्ली में NCP की कार्यकारिणी की बैठक थी। मंच पर लगे पोस्टर में शरद पवार थे, साथ में कार्यकारी अध्यक्ष सुप्रिया सुले और प्रफुल्ल पटेल। अजित पवार को पोस्टर में जगह नहीं मिली।

सुप्रिया सुले और प्रफुल्ल पटेल को कार्यकारी अध्यक्ष बनाए जाने के बाद ये NCP की पहली कार्यकारिणी बैठक थी। अजित पवार के पास पार्टी में कोई बड़ी जिम्मेदारी नहीं थी।

सुप्रिया सुले और प्रफुल्ल पटेल को कार्यकारी अध्यक्ष बनाए जाने के बाद ये NCP की पहली कार्यकारिणी बैठक थी। अजित पवार के पास पार्टी में कोई बड़ी जिम्मेदारी नहीं थी।

सूत्रों के मुताबिक, इस बात से अजित पवार काफी नाराज हुए। इसी नाराजगी को BJP ने भुनाया और 30 जून को एक आर्टिकल में एकनाथ शिंदे को सबसे असफल CM बताने वाले अजित पवार को सरकार में शामिल होने का ऑफर दे दिया। अजित पवार ने आसानी से ऑफर मान भी लिया।

अजित पवार को सरकार में शामिल करने में देवेंद्र फडणवीस का बड़ा रोल था। ऐसी चर्चा है कि कार्यकारिणी बैठक में शामिल होने पहुंचे अजित पवार दिल्ली में BJP के एक बड़े नेता से गुपचुप ढंग से मिले थे।

2 मई को शरद पवार ने अध्यक्ष पद से इस्तीफा दिया, यहीं से पार्टी में टूट के संकेत मिले
2 मई, 2023 को शरद पवार ने पहली बार पार्टी अध्यक्ष पद से इस्तीफा दे दिया था। नेता और कार्यकर्ता चाहते थे कि वे पद पर बने रहें। कार्यकर्ता मनाते रहे, उन्हें खून से खत लिखे, पर पवार नहीं माने।

इस्तीफा वापस लेने की गुजारिश करते हुए एक समर्थक ने शरद पवार को खून से पत्र लिखा था। इसे उन्होंने खुद अपने समर्थकों को दिखाया था।

तब सिर्फ अजित पवार थे. जिन्होंने कहा कि, ‘शरद पवार की उम्र को देखते हुए ये फैसला लिया गया है। वो सभी कार्यक्रमों में मौजूद रहेंगे। अध्यक्ष नहीं हैं, इसका मतलब ये नहीं है कि वो पार्टी में नहीं हैं। आप भावुक ना हों। जो भी नया अध्यक्ष होगा, हम उसके साथ खड़े रहेंगे।’

पार्टी के एक करीबी सूत्र बताते हैं कि इससे ये मैसेज गया कि अजित पवार शरद पवार के इस्तीफे से खुश हैं। शरद पवार ने 10 जून को पार्टी के 25वें स्थापना दिवस पर सुप्रिया सुले और प्रफुल्ल पटेल को कार्यकारी अध्यक्ष बना दिया।

इससे जाहिर हो गया कि सुप्रिया सुले NCP चीफ की अगली उत्तराधिकारी हैं। अजित पवार की नाराजगी की एक वजह ये भी थी। अजित पवार का खेमा भी सुप्रिया सुले को कार्यकारी अध्यक्ष बनाए जाने से नाराज था। उन्होंने भी अजित पवार पर पार्टी से अलग होने का दबाव बनाया।

शिंदे को CM बनाने के बाद लगातार हार रही BJP, इसलिए ये नया एक्सपेरिमेंट
BJP लीडर देवेंद्र फडणवीस के OSD रहे सीनियर जर्नलिस्ट रविकिरण देशमुख कहते हैं कि ‘सत्ता में फिर से वापसी और एकनाथ शिंदे को साथ लेने के बावजूद BJP उपचुनावों में अच्छा परफॉर्म नहीं कर पा रही है।’

‘अंधेरी के उपचुनाव में पार्टी ने उम्मीदवार तक नहीं उतारा। शिवसेना (उद्धव गुट) की उम्मीदवार ऋतुजा लटके ये चुनाव जीत गईं। नागपुर और अमरावती में हुए MLC चुनाव में भी दोनों दलों के उम्मीदवार हार गए और कांग्रेस के प्रत्याशी जीत गए।’

‘पुणे का कस्बापेठ BJP के लिए सबसे पावरफुल सीट थी। इसके बावजूद वहां कांग्रेस का उम्मीदवार चुनकर आया। इससे क्लियर हो गया कि लोग सरकार से खुश नहीं हैं। यही वजह है कि लोकसभा और विधानसभा चुनाव से एक साल पहले BJP की सेंट्रल लीडरशिप ने ये बड़ा एक्सपेरिमेंट किया है।

अजित पवार को तोड़कर BJP ने NCP के वोटर्स को कन्फ्यूज किया
BJP ने अजित पवार को अपने साथ मिलाकर NCP के कोर वोटर्स को कन्फ्यूज कर दिया है। सूत्र बताते हैं कि सुप्रिया सुले को कार्यकारी अध्यक्ष बनाए जाने से अजित पवार नाराज थे ही, उनके फैसलों को पार्टी में लगातार अनदेखा किया जा रहा था। इसलिए उन्होंने पार्टी तोड़कर NDA के साथ जाने का फैसला लिया।

अजित पवार को जोड़ने से BJP का फायदा, सरकार गिरने से बचेगी
सीनियर जर्नलिस्ट गोविंद वाकडे बताते हैं, ‘शिंदे गुट ने शिवसेना से अलग होकर अलग पार्टी बनाई है। उनके 16 विधायकों को अयोग्य करार देने पर फैसला होना बाकी है। माना जा रहा है कि ये फैसला शिंदे गुट के खिलाफ आएगा।’

‘इसके बाद शिंदे गुट के बचे हुए यानी 40 विधायकों की सदस्यता भी रद्द हो सकती है। इससे मौजूदा सरकार अल्पमत में आ जाएगी और महाराष्ट्र में फिर से बड़ा बदलाव हो सकता है। इससे बचने के लिए BJP ने अजित पवार को सरकार में शामिल होने का ऑफर दिया। अजित पवार कई बार दावा कर चुके हैं कि उनके साथ 40 विधायक हैं।’

देवेंद्र फडणवीस जल्द बन सकते हैं महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री
गोविंद ने एक और दावा किया कि ‘अगले 8 से 10 दिन में महाराष्ट्र में फिर से एक शपथ ग्रहण होगा। इससे पहले एकनाथ शिंदे CM पद से इस्तीफा दे देंगे और देवेंद्र फडणवीस महाराष्ट्र के नए मुख्यमंत्री बन सकते हैं। शिंदे गुट का राजनीतिक अस्तित्व जल्द ही खत्म हो जाएगा।’

गोविंद के मुताबिक, ‘मौजूदा सरकार चाहती है कि देश की सबसे अमीर महानगरपालिका यानी BMC पर उसका कब्जा रहे। यहां उद्धव गुट के पास बहुमत है। अजित पवार या कहें कि NCP के आने से दोनों गुट और मजबूत हो जाएंगे और BMC पर NDA का कब्जा हो सकेगा।’

जो हो रहा है, उसमें शिंदे की सहमति…
गोविंद कहते हैं कि ‘महाराष्ट्र में जो भी हो रहा है, इसमें शिंदे गुट की सहमति है। बिना उनके BJP इतना बड़ा रिस्क नहीं ले सकती है। दोनों अच्छा काम कर रहे हैं। शिंदे सरकार मंत्रिमंडल विस्तार भी करने वाली थी। ऐसे में अजित पवार का आना साबित करता है कि BJP को अंदेशा हो गया है कि वे विधायकों की अयोग्यता पर आए फैसले को चैलेंज नहीं कर पाएंगे।’

शरद पवार की वजह से CM बनते-बनते रह गए थे अजित
गोविंद कहते हैं कि ‘शरद पवार की वजह से अजित पवार CM बनते-बनते रह गए थे। दूसरी बार महाविकास अघाड़ी सरकार बनी, तो अजित पवार का नाम सबसे आगे चल रहा था। उनके नाम पर तीनों दलों में कोई विवाद भी नहीं था।’

‘हालांकि शरद पवार ने उन्हें बायपास कर उद्धव ठाकरे को CM बनवाया। शरद पवार के अध्यक्ष पद से इस्तीफा देने के बाद अजित पवार को लगा था कि उन्हें ही पार्टी की कमान मिलेगी, लेकिन ऐसा नहीं हुआ। पवार ने अजित की जगह सुप्रिया सुले और प्रफुल्ल पटेल को पार्टी का कार्यकारी अध्यक्ष बनाया। इसने भी बात को और बिगाड़ दिया।’

गोविंद ने अंदेशा जताया कि प्रफुल्ल पटेल, दिलीप वालसे पाटिल और छगन भुजबल जैसे नेताओं को शरद पवार का सबसे करीब माना जाता है। हो सकता है कि जो हुआ, उसकी शरद पवार को जानकारी हो।’

शरद पवार के रुख से दो साल से नाराज थे अजित पवार
NCP की पॉलिटिक्स को समझने वाले सीनियर जर्नलिस्ट सुकृत करिंदीकर ने बताया कि अजित पवार सिर्फ सुप्रिया के कार्यकारी अध्यक्ष बनाने से नाराज नहीं थे। वे दो साल से शरद पवार के रुख से नाराज चल रहे थे।’

‘तीन दिन पहले शरद पवार ने माना था कि अजित पवार ने उनके कहने पर ही 2019 में देवेंद्र फडणवीस के साथ मिलकर सरकार बनाई थी। हालांकि इसके बाद से अजित पवार को पार्टी में शक की निगाह से देखा जा रहा था।’

कई मौकों पर शरद पवार ने अजित का साथ नहीं दिया…
2021 में सेंट्रल एजेंसियों ने अजित पवार और उनके परिवार के सदस्यों के घर पर रेड की थी। कहा जाता है कि शरद पवार ने अजित की मदद नहीं की और खुद को मामले से अलग कर लिया था। यहां तक कि अजित के बेटे पार्थ पवार को मावल सीट से लोकसभा चुनाव लड़वाने का भी शरद पवार ने विरोध किया था।

इस बात से भी अजित पवार नाराज थे। उनके रुख को देखते हुए मजबूरी में पार्थ को टिकट देना पड़ा था। पार्टी के करीबी सूत्रों के मुताबिक, अजित पवार इस बात से खफा थे कि पार्थ को शरद पवार के इशारे पर ही ग्राउंड पर सपोर्ट नहीं दिया गया और वे चुनाव हार गए।

चाचा-भतीजे में अनबन 19 साल पुरानी
अजित और शरद पवार के बीच की अनबन 2004 में शुरू हुई थी। इस साल हुए विधानसभा चुनाव में NCP सबसे बड़ी पार्टी बनी। तब पार्टी ने मुख्यमंत्री बनने का मौका गवां दिया था। तब अजित पवार ने कहा था कि 2004 में मुख्यमंत्री का पद छोड़ना सबसे बड़ी गलती थी।

उस चुनाव में NCP को 71 और कांग्रेस को 69 सीटें मिली थीं। इसलिए मुख्यमंत्री का पद NCP को मिलना चाहिए था। शरद पवार ने कांग्रेस के साथ बात की और कांग्रेस को मुख्यमंत्री का पद दे दिया। उसके बदले में दो कैबिनेट पद और एक राज्य मंत्री का अतिरिक्त पद लिया। यहीं से शरद पवार और अजित पवार के बीच अनबन शुरू हुई थी। 2009 के चुनावों में भी टिकट बंटवारे को लेकर शरद पवार और अजित पवार के बीच खटास आई थी।

तारीख- 2 जुलाई, जगह- मुंबई में बैलार्ड एस्टेट में NCP का ऑफिस। अजित पवार के पार्टी छोड़ने से गुस्साए एक वर्कर ने उनका बैनर फाड़ दिया।

तारीख- 2 जुलाई, जगह- मुंबई में बैलार्ड एस्टेट में NCP का ऑफिस। अजित पवार के पार्टी छोड़ने से गुस्साए एक वर्कर ने उनका बैनर फाड़ दिया।

पार्टी में अजित पवार को BJP का करीबी दिखाने की कोशिश
सीनियर जर्नलिस्ट सुकृत करिंदीकर ने आगे बताया कि ‘अजित पवार ने MVA गठबंधन वाली सरकार गिरने के बाद पिछले साल जुलाई में नेता प्रतिपक्ष का पद संभाला था। सुप्रिया सुले को कार्यकारी अध्यक्ष बनाने के बाद अजित ने नेता प्रतिपक्ष का पद छोड़ने का ऐलान कर दिया।’

‘तब सुप्रिया सुले ने कहा था कि नेता प्रतिपक्ष का पद भी मुख्यमंत्री के बराबर होता है। फिर इतने अहम पद से मुक्त क्यों होना चाहते हैं। इस पर अजित पवार ने कहा था कि कुछ लोग कहते हैं कि मैं नेता प्रतिपक्ष के तौर पर सख्त व्यवहार नहीं करता हूं। मुझे नेता प्रतिपक्ष के रूप में काम करने में कभी दिलचस्पी नहीं थी, लेकिन पार्टी विधायकों की मांग पर ये भूमिका स्वीकार की थी।’

‘पवार ने कहा कि उनकी मांग पर फैसला करना NCP लीडरशिप पर निर्भर है। मुझे पार्टी संगठन में कोई भी पद दे दें। मुझे जो जिम्मेदारी सौंपी जाएगी, उसके साथ पूरा न्याय करूंगा। अजित का ये बयान साबित कर रहा था कि पार्टी में उन्हें BJP का करीबी दिखाया जा रहा था। इसे पार्टी पर उनकी पकड़ ढीली करने की कोशिश के तौर पर देखा गया।’

Ramswaroop Mantri

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