प्रोफेसर राजकुमार जैन का यह लेख बाबा साहब डॉ. भीमराव अम्बेडकर तथा डॉ राममनोहर लोहिया के आपसी संबंधों और एक दूसरे के प्रति उनकी राय को उजागर करने वाला है ।साथ ही साथ एक समय उत्तर भारत के दलितों के सबसे बड़े नेता बुद्ध प्रिय मौर्य के बारे में भी नई पीढ़ी के लोगों को जानकारी प्रदान करने वाला है। पढ़िए राजकुमार जैन की कलम से।
भारत के दो महान विचारक, बाबा साहब डाक्टर भीमराव अम्बेडकर तथा डाक्टर राममनोहर लोहिया। दोनों की एक दूसरे के बारे में क्या राय थी? बाबा साहब डाक्टर भीमराव अम्बेडकर की शेड्यूल्ड कास्टफेडरेशन जो बाद में नाम बदलकर बनी रिपब्लिकन पार्टी आफ इन्डिया, का सोशलिस्ट पार्टी से कैसा संबंध था? इस पर प्रकाश डाला है,बाबा साहब के अनुयायी तथा उत्तर भारत में एक समय दलितों के लोकप्रिय नेता रहे बुद्ध प्रिय मौर्य ने। उन्होंने एक लेख में लिखा है – ”पहले आम चुनाव होने को थे। अनुसूचित जाति फैडरेशन की ‘एक्जीक्यूटिव’ की बैठक नवंबर सन् 1951 में थी। डाक्टर अम्बेडकर ने पूछा कि तुम डाक्टर राममनोहर लोहिया को जानते हो? मैंने डाक्टर राममनोहर लोहिया का नाम तो सुना था लेकिन जानने का मतलब है नजदीक से जानना, इसलिए मैं चुप रहा। बाबा साहब ने कहा कि तुम क्या खाक पोलिटिक्स करोगे, जब तुम डाक्टर राममनोहर लोहिया को नहीं जानते। हिंदुओं के एक ही तो नेता हैं जो ईमानदारी से जात-पांत तोड़कर जातिहीन समाज की स्थापना करना चाहते हैं। बाबा साहब कभी किसी की प्रशंसा नहीं करते थे, इस मामले में वे बड़े कंजूस थे। जब उन्होंने डाक्टर लोहिया की प्रशंसा की, तो मैंने सोचा कि उनसे मिलना चाहिए। पता लगाने पर मालूम हुआ कि जब कभी डाक्टर लोहिया दिल्ली आते हैं तो ओखला इंस्पैक्शन हाउस में ही ठहरते हैं। मैं वहाँ के इंचार्ज से मिला, उसे अपना पता देकर कहा, डाक्टर साहब आयें तो मुझे तार द्वारा सूचित कर देना। सन् 1951-52 के आम चुनाव तो हड़बड़ी में निकल गये। इसके बाद 1953-54 की बात है। मुझे अचानक तार मिला कि डाक्टर साहब ओखला आने वाले हैं। मैं ओखला आया, डाक्टर लोहिया बहुत ही सादे कपड़ों में बैठे हुए थे। मैंने डाक्टर साहब को अपना परिचय दिया। पहली मुलाकात में मुझे ऐसा लगा ही नहीं कि मैं इतने बड़े नेता से बात कर रहा हूँ। उन्होंने ऐसी कोई भावना मेरे मन में पैदा ही नहीं होने दी। एक और बात ने मुझे उस समय प्रभावित किया। बिहार का एक आदमी आया था जो ज़मीन पर दूर बैठा हुआ था। उसके कपड़े भी फटे हुए थे। उन्होंने उसे बुलाकर कुर्सी पर बिठाया और अपने तथा मेरे लिए मंगाया गया खाना उसे खिला दिया। इस बात की मेरे मन पर बहुत बड़ी छाप पड़ी। फिर तो उनसे बहुत नजदीक का संपर्क हो गया। पं॰ जवाहरलाल नेहरू के जमाने की बात है, तलाक वाले बिल पर बहस चल रही थी। डाक्टर लोहिया खड़े हुए और बोले कि यहाँ बहुत से ऐसे लोग हैं, जिन्होंने महिलाओं को सिर पर बिठा रखा है और बहुत से ऐसे हैं जिन्होंने पैरों तले दबा रखा है। भाई मैं तो समाजवादी हूँ। मैं तो महिलाओं को बगल में रखता हूँ और उन्हें बराबरी का दर्जा देता हूँ। इस पर कांग्रेस की तारकेश्वरी सिन्हा ने मज़ाक में कहा, डाक्टर साहब आपने तो शादी ही नहीं की। फिर आप महिलाओं के बारे में कैसे दावे से कह सकते हैं कि आपने उनके दिल की धड़कन सुनी है। डाक्टर लोहिया ने झट से जवाब दिया, जी ! आपने मुझे मौका ही नहीं दिया। इस प्रकार सारा हाल हँसी से गूँज उठा।उन दिनों एक नारा चला था ”सोशलिस्टों ने बांधी गांठ – पिछड़े पाँवें सौ में साठ’ यह डाक्टर साहब का नारा था। जिस तरह ईमानदारी से राजनीतिक क्षेत्र में अनुसूचित जाति व जनजाति के बीच जागृति का श्रेय बाबा साहब डाक्टर अम्बेडकर को जाता है, ठीक उसी तरह से पिछड़ों में राजनीति के लिए जागृति जगाने का श्रेय डाक्टर लोहिया को जाता है। एक बार मैंने खुद उनसे पूछा कि पिछड़ों में कौन-कौन हैं? तो वे बोले ”पिछड़ों में मैं नारी को सबसे पिछड़ा मानता हूँ। मेहतारानी से लेकर पंडितानी तक सब पिछड़ों में हैं। जब तक वर्ग जाति में बंधा रहेगा, तब तक शक्तिशाली नहीं होगा। इसलिए वे हमेशा जाति तोड़ने पर बल देते थे।”
बुद्ध प्रिय मौर्य कौन थे?
बाबा साहब द्वारा स्थापित ”रिपब्लिकन पार्टी ऑफ इण्डिया के सदस्य के रूप में 1962 में अलीगढ़ (उत्तर प्रदेश) लोकसभा क्षेत्र से चुनाव जीतकर संसद में पहुँचने वाले उत्तर भारत के संभवत: पहले संसद सदस्य थे। मौर्य जी, अलीगढ़ विश्वविद्यालय में कानून के प्रोफ़ेसर भी रहे थे। वे डाक्टर अम्बेडकर के बहुत विश्वसनीय अनुयायी तथा रिपब्लिकन पार्टी के बड़े नेता थे।50-60 के दशक में डाक्टर अम्बेडकर का नाम और उनके मिशन को उत्तर-भारत विशेषकर, दिल्ली, उत्तरप्रदेश, हरियाणा के गांवों, देहातों, शहरी दलित बस्तियों के घर-घर में पहुँचाने वाले उस जमाने के लड़ाकू और अपनी जान को जोखिम में डालकर अलख जगाने वाले वे एक मात्र नेता थे। आज भी दिल्ली, पश्चिमी उत्तर-प्रदेश, हरियाणा के हजारों, दलित, बुजुर्ग जो बुद्ध प्रिय मौर्य को ‘वी.पी. मोर्या’ के नाम से जानते हैं, उनका गुणगान करते मिल जाएँगे। उस समय गांवों की दलित बस्तियों में इनके नाम पर बने गीत गाये जाते थे। उनके भाषण जातिवाद के विरुद्ध आग उगलते थे, उनकी जन सभाओं में कई बार उच्च जाति के लोग हमला भी करते थे। मौर्य जी, हालाँकि बाबा साहब के अनुयायी तथा रिपब्लिकन पार्टी के प्रचारक थे परंतु वो डाक्टर लोहिया एवं सोशलिस्ट पार्टी के भी जबरदस्त समर्थक थे। 1963 में जब डाक्टर राममनोहर लोहिया, जवाहरलाल नेहरू की सरकार के विरुद्ध रखे गए अविश्वास प्रस्ताव पर बोल रहे थे, तो समय कम पड़ रहा था। लोकसभा अध्यक्ष ने जब डाक्टर लोहिया को भाषण समाप्त करने के लिए कहा तो बुद्ध प्रिय मौर्य ने अपनी सीट से उठकर अध्यक्ष को कहा कि अध्यक्ष महोदय डाक्टर लोहिया का भाषण बहुत महत्वपूर्ण है, वो चलना चाहिए, मुझे बोलने के लिए जो समय दिया गया है, मैं अब नहीं बोलूंगा। मेरे समय को डाक्टर साहब को दे दीजिए।डाक्टर लोहिया भी मौर्या से बहुत स्नेह, लगाव रखते थे। सोशलिस्ट पार्टी के नेता एवं लोकसभा के सदस्य मनीराम बागड़ी जी और मौर्या जी में गहरी मित्रता थी। सोशलिस्ट पार्टी के कार्यक्रमों में मौर्य जी शिरकत करते रहते थे। मौर्या जी के डाक्टर लोहिया और सोशलिस्ट पार्टी के लगाव के कारण सोशलिस्ट नेता और कार्यकर्ता भी मौर्य जी का बहुत सम्मान करते थे। मौर्या जी सोशलिस्ट नौजवानों को बहुत पसंद करते थे।60 के दशक में उनकी बड़ी विशाल जनसभाएं होती थी। रात्रि के दो-तीन बजे तक श्रोता बेताबी से उनका इंतज़ार करते थे। मौर्या जी को दिल्ली में जनपथ पर सरकारी निवास स्थान मिला हुआ था। मैं और मेरे साथी सत्यपाल मल्लिक जो भूतपूर्व केंद्रीय मंत्री तथा अब मेघालय के राज्यपाल हैं, से मौर्य जी बहुत स्नेह करते थे। वे हमें कई बार अपने साथ रात्रि को होने वाले जुलूसों में साथ ले जाते थे। हम दोनों उनके जनपथ वाले मकान पर पहुँच जाते थे। वहाँ पर जल-पान करके मौर्य जी के साथ ‘जलसे’ में जाते थे। मौर्य जी के जलसों का अद्भुत नज़ारा होता था, जलसों में कई स्थानों पर विरोधी मिट्टी, राख, गोबर इत्यादि अपने छज्जों से मौर्य जी और साथ चल रहे लोगों पर भी फेंकते थे। मगर ‘बाबा साहब अमर रहे, वी. पी. मौर्या जिंदाबाद’ का नारा भी गगन भेदी आवाज़ में गूंजता रहता था। सभा स्थल पर मौर्या जी के पहुँचते ही फूलों और उसकी पंखुड़ियों की चारों ओर से वर्षा होने लगती थी। स्टेज पर फूलों और उसकी पंखुड़ियों की वर्षा होती रहती थी। मैं बी.ए. का छात्र था। इन जलसों से मुझे एक परेशानी भी होती थी क्योंकि स्टेज पर बैठने से गेंदे के फूलों की पंखुड़ियों के कारण मेरा कुर्ता और विशेषत: पायजामे पर पीले निशान पड़ जाते थे। जिन्हें घर जाकर मुझे धोना पड़ता था। मौर्य जी भाषण आरंभ करने से पूर्व, मेरा और साथी सत्यपाल मल्लिक का परिचय और स्वागत भी करवाते थे।1967 के लोकसभा, विधानसभा चुनाव में संयुक्त सोशलिस्ट पार्टी एवं रिपब्लिकन पार्टी एक साथ मिलकर लड़े थे। गाजियाबाद लोकसभा सीट से मौर्या जी खुद उम्मीदवार थे। मौर्या जी की एक खूबी थी कि वे दलित होते हुए भी कभी रिजर्व सीट से चुनाव नहीं लड़े। मौर्य जी के साथ के कारण दिल्ली से सटे, गाजियाबाद विधानसभा सीट से, सोशलिस्ट प्यारेलाल शर्मा, मोदी नगर से सरयूप्रसाद त्यागी, मेरठ कैन्ट से वीरेश्वर त्यागी तथा किठोर सीट से मंज़ूर अहमद तथा मेरठ लोकसभा क्षेत्र से महाराज सिंह भारती चुनाव जीते।उत्तर प्रदेश में बसपा की ताकत को अप्रत्यक्ष रूप से बनाने में उनका बड़ा योगदान था। डाक्टर अम्बेडकर के सिद्धांत संघर्ष और नाम रूपी बीज को मौर्या जी ने कठिन परिस्थितियों में रोपा था। बाद में मान्यवर कांशी राम जी ने उसमें खाद्य-पानी सींचकर फसल लहराई।दलित के घर जन्म लेने के कारण डाक्टर अम्बेडकर ने जो अन्याय अपमान, अत्याचार सहे उससे हर हिंदुस्तानी वाकिफ है। डाक्टर अम्बेडकर, इंग्लैंड, अमेरिका से पी.एच.डी. व कानून की डिग्री लेकर भारत लौटे थे। अगर वे चाहते तो ऐश्वर्य का जीवन भोग सकते थे, परंतु उनका मिशन तो सदियों से वंचित सोए हुए समाज को जगाकर संघर्ष के लिए तैयार करना था। इसलिए वे संघर्ष के मार्ग पर अग्रसर हो गए। लोहिया ने दलित माँ के पेट से तो जन्म नहीं लिया था, परंतु जातिवाद के इस कोढ़ पर उन्होंने किसी भी अन्य भारतीय राजनेता से कम हमला नहीं किया था। जर्मनी के होम्बोल्ट विश्वविद्यालय से पीएच-डी. की उपाधि लेने के बाद समाजवादी सिद्धांतो से जुड़े डाक्टर लोहिया भारत आकर हिंदुस्तान की आज़ादी के लिए लड़े जा रहे स्वतंत्रता संग्राम में कूद पड़े। आज़ादी की जंग में वह बरतानिया हुकूमत से निरंतर संघर्ष किए और कारावास भोगे। आज़ादी के साथ-साथ गरीबों, मज़दूरों, किसानों तथा सामाजिक बुराइयों से जूझने में उन्होंने अपना जीवन दांव पर लगा दिया था। आज़ादी मिलने पर सत्ता में आई कांग्रेस के साथ चलने से उन्होंने इसलिए इंकार कर दिया कि लोकतंत्र में सत्ता के साथ-साथ शक्तिशाली विपक्ष का होना भी उतना ज़रूरी है। इसके लिए वे तथा दूसरे सोशलिस्ट, सोशलिस्ट पार्टी बनाकर संघर्ष के पथ पर निकल पड़े थे। डाक्टर अम्बेडकर आज़ादी के बाद सोशलिस्ट पार्टी के साथ चुनाव में तालमेल के पक्ष में थे। 1952 में भारत के प्रथम लोकसभा चुनाव में कांग्रेस के विरुद्ध, संयुक्त रूप से लड़ने के लिए, महाराष्ट्र के किसान ‘मज़दूर दल और शेडयूल्ड कास्ट्स फेडरेशन इन दो दलों के नेताओं ने महाराष्ट्र में एक संयुक्त मोर्चा बनाने के बारे में कुछ महीनों से विचार-विनिमय शुरू किया था। सोशलिस्ट नेता जयप्रकाश नारायण, अशोक मेहता तथा आचार्य मो.वा.दोदे में आपस में विचार विमर्श जारी था। डाक्टर अम्बेडकर को दिल्ली में इसकी सूचना दी गई। 1951 के प्रथम सप्ताह में नयी दिल्ली में शेड्यूल्ड कास्ट्स फैडरेशन की कार्यकारिणी समिति की बैठक में चुनाव के संबंध में विचार-विमर्श हुआ। शेल्यूस्डकास्ट फैडरेशन ने निर्णय लिया कि वे कांग्रेस, हिंदू सभा या कम्यूनिस्टों के साथ बिल्कुल सहयोग नहीं करेंगे, परंतु सोशलिस्ट पार्टी के साथ तालमेल होगा।1952 के प्रथम लोकसभा चुनाव में बम्बई नौर्थ सेंट्रल संसदीय क्षेत्र से शैड्यूल्ड कास्ट फेडरेशन की ओर से डाक्टर अम्बेडकर तथा सोशलिस्ट पार्टी के अशोक मेहता संयुक्त उम्मीदवार बने। 1952 के चुनाव में संविधानिक रूप से व्यवस्था थी कि एक लोकसभा चुनाव क्षेत्र से दो प्रतिनिधियों का चुनाव होता था जिसमें एक पद (सुरक्षित), तथा दूसरा पद (अनारक्षित) था।18 नवंबर को डाक्टर अम्बेडकर बम्बई रहने के लिए आ गए। बोरी बंदर (बम्बई) के स्टेशन पर शेडयूल्ड कास्ट फेडरेशन और सोशलिस्ट पार्टी ने उनका भव्य स्वागत किया। दूसरे दिन सर कावस जी जहाँगीर सभागृह में शेड्यूल्डकास्ट फेडरेशन और सोशलिस्ट पार्टी की ओर से एक संयुक्त सभा हुई जिसमें डॉ॰ अम्बेडकर ने कांग्रेस के मंत्रिमण्डल में शामिल होने के बारे में स्पष्टीकरण दिया।25 नवंबर को शिवाजी पार्क में दो लाख लोगों की उपस्थिति में बोलते हुए डाक्टर अम्बेडकर ने कहा कि देश का लोकतंत्र शैशवावस्था में होने से उसे मज़बूत करने के लिए और सत्ताधारियों पर नियंत्रण रखने के लिए देश को विरोधी दल की अत्यंत आवश्यकता है।प्रधानमंत्री श्री जवाहरलाल नेहरू ने बम्बई में कांग्रेस उम्मीदवार के पक्ष में बोलते हुए सोशलिस्ट पार्टी और शेड्यूल्ड कास्ट फेडरेशन की एकता को अपवित्र मानकर उसकी निंदा की।1952 के लोकसभा चुनाव में डाक्टर अम्बेडकर और अशोक मेहता की हार हुई। डाक्टर अम्बेडकर को 1,23,576 तथा अशोक मेहता को 1,39,741 वोट मिलें। लगभग 25,000 वोट से डाक्टर अम्बेडकर चुनाव हार गए। इस चुनाव में डाक्टर अम्बेडकर की हार का मुख्य कारण आज़ादी के बाद कांग्रेस की आंधी थी। कम्यूनिस्ट पार्टी के उम्मीदवार एस.ए. डांगे ने इस चुनाव में डाक्टर अम्बेडकर की घोर आलोचना की। इस चुनाव में एस.ए. डागे बुरी तरह पराजित हुए।चुनाव में हार जाने पर डाक्टर अम्बेडकर दिल्ली चले गए। 5 जनवरी को दिल्ली में उन्होंने कहा कि बम्बई की जनता द्वारा दिया गया इतना बड़ा समर्थन कैसे व्यर्थ गया, इस संबंध में सचमुच चुनाव आयुक्त (कमीश्नर) को जाँच पड़ताल करनी चाहिए, सोशलिस्ट नेता जयप्रकाश नारायण ने कलकत्ता में कहा कि बम्बई के समाजवादियों का अनेक प्रकार से समर्थन प्राप्त होने पर भी वे असफल कैसे हुए, इस संबंध में डाक्टर अम्बेडकर की तरह मेरे मन में भी संभ्रम पैदा हुआ है। दिल्ली में डाक्टर अम्बेडकर ने कहा कि पराजय के धक्के का मुझपर विशेष असर नहीं पड़ा। उन्हें ऐसा लगा कि कम्यूनिस्ट नेता डांगे के षड्यंत्र से उनकी पराजय हुई। उन्होंने अपनी पार्टी के एक नेता रा.घो. भंडारी को चुनाव के परिणाम के बारे में लिखते हुए कहा ”चुनाव एक तरह का जुआ है ….. फिर भी हम सफलता तक पहुँचे थे। हमें धीरज नहीं छोड़ना चाहिए। हमें लोगों की उम्मीद पस्त नहीं होने देना चाहिए, समाजवादियों पर उंगली उठाने के लिए कोई जगह नहीं है।”कुछ दिनों बाद डाक्टर अम्बेडकर और अशोक मेहता ने बम्बई में हुए लोकसभा के चुनाव रद्द किए जाने को लेकर एक याचिका चुनाव न्याय समिति के सम्मुख पेश की जिसमें उन्होंने कहा कि दोहरे मतदाता संघ में एक ही इच्छुक उम्मीदवार को दो वोट देने के बारे में प्रचार होने से उस चुनाव में भ्रष्टाचार हुआ, इसलिए वे चुनाव रद्द किए जाएँ। उस याचिका के विरुद्ध, कम्यूनिस्ट प्रत्याशी एस.ए. डांगे तथा जीते हुए कांग्रेसी उम्मीदवार नारायण राव काजरोलकर प्रतिवादी थे। डाक्टर अम्बेडकर और अशोक मेहता की याचिका खारिज कर दी गई।1954 में भंडारा (महाराष्ट्र) लोकसभा संसदीय क्षेत्र में उप-चुनाव था, चुनाव में सुरक्षित सीट के लिए शेड्यूल्ड कास्ट फेडरेशन की ओर से डाक्टर अम्बेडकर तथा जनरल सीट पर सोशलिस्ट अशोक मेहता पुन: संयुक्त उम्मीदवार बनकर चुनाव लड़े। चुनाव में डॉ॰ अम्बेडकर को 1,32,483 वोट मिले। वह 8381 वोटों से कांग्रेसी प्रतिद्वंद्वी भाऊराव बोरकर से चुनाव में हार गए, परंतु सोशलिस्ट अशोक मेहता चुनाव जीत गए।
जारी ………….
भारत के दो महान विचारक ….बाबा साहब डॉ. भीमराव अम्बेडकर तथा डॉ राममनोहर लोहिया





