पिछले कुछ समय से हजारों इलाकों में बाढ़ की समस्या काफ़ी बढ़ गई है जिसके वजह से जान-माल की क्षति के साथ तेजी से मिट्टी की कटाव की समस्या भी बढ़ती जा रही है। आँकड़े और एक्सपर्ट रिपोर्ट बताती है कि मौसम का मिजाज लगातार बदलता जा रहा है जहाँ एक तरफ देश के कुछ हिस्से में सूखे और अकाल की स्थिति बनती जा रही है तो वहीं दूसरी तरफ कुछ हिस्सों में अत्यधिक बारिश से बाढ़ की स्थिति पैदा हो रही है। सिविक अथॉरिटी अक्सर इसी एक्सट्रीम वेदर की समस्या से अपना पल्ला झाड़ने के लिए एक बहाना बना लेती है।
खराब जल निकाय प्रबंधन और अतिक्रमण
लेकिन दिल्ली, गुरुग्राम और मुंबई जैसे बड़े शहरों में बाढ़ और जल-जमाव के दूसरे कारण कहीं ज्यादा बड़े है। जैसे खराब कचड़ा प्रबंधन और जल-निकायों (वाटर-बॉडिज़) के स्रोतों का ख़त्म होना। विशेषज्ञों की माने तो, शहरों और नगरों में नदियों व जलधाराओं के किनारे लोगों की बसावट के कारण बढ़ता हुआ अतिक्रमण भी बहुत बड़ी समस्या है, जिसकी वजह से प्राकृतिक जल निकासी में संकुचन हुआ है और बाढ़ की समस्या बढ़ी है। निर्माण कार्य के फलस्वरूप उत्पन्न होने वाला कचड़ा और ठोस अपशिष्ट जल निकासी की नालियों में जमा हो जाता है, जिसके कारण उनकी जल-ग्रहण क्षमता में प्रभावी कमी आ जाती है। इसके अलावा कई स्थानों में यह भी देखा गया है कि प्राकृतिक तालाबों के आस-पास खराब कचड़ा प्रबंधन, अवैध निर्माण कर लोग रहने लगे हैं, जिसके वजह से कुछ तालाब पूरी तरह से ख़त्म हो गए और कुछ तालाबों ने अपनी दिशा बदल दी। इस वजह से आस-पास के क्षेत्रों में जल जमाव होने लगता है और ऐसे में लोगों के घरों में सीलन की भी समस्या उत्पन्न हो जाती है।

अति आधुनिक मेलिनियमसिटी में क्यों है पानी का जमाव
ऐसे हालात सिर्फ सिर्फ इन बड़े शहरों में ही नहीं, बल्कि दिल्ली से सटे गुरुग्राम(जिसे मेलिनियमसिटी भी कहा जाता है) की भी है। यहाँ अक्सर बरसात के मौसम में कुछ घंटों की बारिश में बाढ़ जैसे हालात बन जाते हैं। लेकिन अब प्रायः यह स्थिति भारत के छोटे-बड़े शहरों की हो चुकी है। जरा सी बारिश के साथ समंदर बनते शहर और पहियों वाली वाहन के बजाय नावों की आवश्यकता। जब इस विषय में मैंने दिल्ली विश्वविद्यालय के भूगोल विभाग में असिस्टेंट प्रोफ़ेसर डॉक्टर जूही प्रियंका होरो से बात की, तो उन्होंने तथाकथित “मिलेनियम सिटी” गुरुग्राम का उदाहरण देते हुए बताया, “यह शहर दिल्ली-जयपुर लिंक (राष्ट्रीय राजमार्ग-8) की जीवन रेखा के साथ जुड़ा दिल्ली राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र (एन.सी.आर) के दक्षिण-पश्चिम में स्थित है। शहरीकरण की संभावनाओं को मजबूत करते हुए परिवहन नेटवर्क में वृद्धि हुई जो गुरुग्राम को दो हिस्सों में काटती है। पहले की धीमी गति वाला शहर, गुरुग्राम, भारत में तीसरी प्रति व्यक्ति आय और हरियाणा के सबसे बड़े शहर का उत्पादन करने वाले एक गतिशील केंद्र में बदल गया है। 1970 के दशक से अग्रणी भारतीय ऑटोमोबाइल निर्माता की स्थापना तथा वाणिज्यिक रियल एस्टेट डेवलपर्स द्वारा एक उल्लेखनीय बदलाव के साथ हुई जब गुरुग्राम के गैर-डीडीए (दिल्ली विकास प्राधिकरण) की कई एकड़ भूमि पर अपनी नींव दी। नई आर्थिक नीति के साथ 1991 के दशक ने भारत के आर्थिक विकास का विस्तार करने और पर्याप्त विदेशी भंडार बनाने के लिए बाजार उन्मुखीकरण पर एक नया जोर दिया। धीरे-धीरे कई अन्य मल्टी-नेशनल कंपनियों ने गुरुग्राम में साइबर-हब के उद्भव के साथ अपने पंखों का विस्तार किया और वर्तमान में इस शहर को एक ‘बेतरतीब शहर’ के रूप में जाना जा सकता है। शहरी परिवर्तन और कनेक्टिविटी को मजबूत करने की प्रक्रिया के दौरान गुरुग्राम के कई प्राकृतिक संसाधन भौतिक अवसंरचना के निर्माण के तहत खपत किए गए थे और वर्तमान में गुरुग्राम अनेक शहरी समस्याओं से भरा हुआ है जो अपरिहार्य हो गए हैं और उसकी पुनरावृत्ति शहर की वर्तमान योजना रणनीतियों से परे है।”
विकसित नगरों में क्यों हो रहा बाढ़ जैसे हालात
एक विकसित नगर बनने की होड़ में प्राकृतिक संरचनाओं और नियम-कानूनों को ताक में रखते हुए प्रकृति के साथ खिलवाड़ किया गया जिसका परिणाम हमें बारिश के मौसम में हमेशा देखने को मिलता है। कुछ विशेषज्ञ एक्सट्रीम वेदर इवेंट जैसे-बाढ़ को ग्लोबल वार्मिंग को एक कारण बताते हैं, लेकिन इससे जूझने की जो हमारी तैयारी है और ऐसे वाटर-बॉडीज जिनकी बहुत अहम भूमिका होती है जो कि अत्यधिक पानी को अब्सॉर्ब करने या पानी के बहाव को एक सामान बनाये रखने के लिए चाहिए, वो नहीं हो पा रहा है। जो प्राकृतिक स्रोत थे वो भी खत्म हो गए और जो पुराने ड्रेनेज सिस्टम थे उस पर कॉलोनियां बन गई है।
सरकार द्वारा उठाये गए कदम नाकाफी क्यों
भले ही रिकॉर्ड तोड़ बारिश के मत्थे भीषण बाढ़ का ठीकरा फोड़ा जा सकता है लेकिन कमजोर योजना और प्रबंधन को भी कम जिम्मेवार नहीं माना जा सकता। सरकार बाढ़ से बचाव के लिए जितना खर्च करती है उससे कहीं ज्यादा वह बाढ़ के बाद मुआवजा देने में खर्च कर देती है।सरकारी एजेंसियों को मौसम के अतिवादी रवैया को भांपने के लिए पूर्वानुमान के तकनीकों को अपनाना चाहिए। शहरी क्षेत्रों के लिए जल विकास योजनाओं को शेष क्षेत्रों से अलग किया जाना चाहिए। शहरी नियोजन में, गीले और सूखे शहरों के लिए अलग-अलग दिशानिर्देश होने चाहिए। नियोजित शहरी विकास तथा उन स्थानों में हरित कवर को बढ़ावा देकर साथ ही भारी बारिश के पानी के निकासी व्यवस्था को सुधार जैसे उपाय को नियमित करना होगा।
जल भराव को तुरंत काम किया जा सके ऐसे सिस्टम विकसित करने होंगे
जल भराव के वक्त कम वोल्टेज और बिजली की समय पर उपलब्धता की कमी एक प्रमुख मुद्दा है जो पंपिंग को प्रभावित करता है। अतः इसका समाधान कर और खुली नहरों के बजाय मौजूदा पाइपलाइनों का रख-रखाव इनका उपयोग करना। इसके साथ ही लोगों को भी अतीत की घटनाओं से सीख कर जागरूक होना पड़ेगा और उसके आधार पर सुरक्षा के समुचित कदम उठाना होगा। साथ ही सरकारी और ग़ैर सरकारी संस्थाओं को भी साथ मिलकर लोगों की मानसिकता में सकारात्मक बदलाव लाने का प्रयास कर शहरी लोगों के रहन-सहन की आदतें व उनकी जीवन शैली में सुधार संबंधी मानकों को अपनाने पर जोर देने को प्रेरित करना चाहिए। तभी हम इस समस्या से निपट सकेंगे।





