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सरकार की मुहिम एक साल में हर प्रदेश दंगा में बदल गई है

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माधव मंत्री

हर घर तिरंगा के नाम से शुरू हुई सरकार की मुहिम एक साल में हर प्रदेश दंगा में बदल गई है।

पहले धर्म संसद के नाम पर नफरत बोई गई, श्मशान और कब्रिस्तान के नाम पर प्रधानमंत्री द्वारा नफरत फैलाई गई, लेकिन अदालतें मौन बैठीं रही।

मीडिया चैनल इस नफरत कज आग में घी का काम करते रहे और हम रात को अपने घरों में बैठे यह तमाशा देखते रहे।

आज कर्फ़्यू के बीच लगातार तीन दिन से लोगों के घर तोड़े जा रहें हैं, न अदालतें कुछ बोल रही हैं, न किसी और को कुछ बोलते सुना जा सका है?

क्या इस देश में अल्पसंख्यक होना एक गुनाह हो गया है?

क्या अल्पसंख्यक के जीवन की कोई कीमत नहीं है?

क्या बहुसंख्यक समाज और इसकी राजनीति ने विपक्ष को भी इस मुद्दे पर मौन रहने के लिए मजबूर कर दिया है? यदि ऐसा है तो फिर भाजपा और विपक्षी पार्टियों में अंतर ही क्या रह गया?

क्या मोहब्बत की दुकान भी धर्म देखकर ही खोली और बन्द की जा रही है?

आज शायद बापू ज़िंदा होते तो वे उसी बेबाकी से एक मुस्लिम के साथ भी खड़े होते, जैसे किसी हिन्दू के साथ खड़े थे, और उन्होंने ऐसा बंगाल में आज़ादी के बाद करके एक जननेता होने का उदाहरण पेश किया था।

मन इसलिए उदास है कि गांधी और गांधीवादी होने का ढोल पीटने वाले लोग भी बस इन मुद्दों पर राजनीति ही कर रहे हैं, शांति के कदम उठाते हुए कोई नहीं दिख रहा!

यदि आज गांधी ज़िंदा होते तो क्या तीन महीने तक इसी तरह देश का एक राज्य जलने देते? क्या हिंसा पर धर्म और जाति का सोचकर अपने विचार रखते? क्या महिलाओं के खिलाफ होते अन्याय पर सिर्फ ट्वीट करके अपने कर्तव्य की इतिश्री कर लेते?

मैं गांधी नहीं हूँ, लेकिन मेरे खून में अभी भी गांधीवाद है। इसलिए मैं इस विषय पर लिख पा रहा हूँ, जो नहीं बोल पा रहे, वे मन ही मन या तो किसी पार्टी के गुलाम जो गए हैं या अपनी मानवता को किसी श्मशान-कब्रिस्तान में जला बैठे हैं या दफना चुकें हैं।

Ramswaroop Mantri

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