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*बेहद भयावह है लोकतंत्र में घटती आस्था*

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        ~ पुष्पा गुप्ता

     लोकतंत्र को अब तक की सबसे अच्छी शासन प्रणाली माना गया है। ज़्यादातर देश इसे पाने या बनाये रखने की रात-दिन कोशिशें कर रहे हैं लेकिन विश्वप्रसिद्ध ओपन सोसायटी फ़ाऊंडेशन (ओएसएफ़) की हालिया वह सर्वे रिपोर्ट चिंताजनक है जिसमें दुनिया के 42 प्रतिशत युवा अपने देशों में लोकतांत्रिक व्यवस्था नहीं बल्कि सैन्य शासन चाहते हैं।

      यह बदलती पसंद सारी दुनिया के लिये एक खतरनाक वैचारिक ट्रेंड हो सकता है। इस लिहाज से सर्वे रिपोर्ट यह संदेश भी देती है कि जिन लोगों पर लोकतांत्रिक व्यवस्था को चलाने की जिम्मेदारी हैं, उन्हें ईमानदारी और समर्पण भाव से अपने उत्तरदायित्वों का निर्वाह करने की आवश्यकता है- फिर वे चाहें सरकारें हों, संवैधानिक संस्थाएं हों, विपक्षी दल अथवा नागरिक हों।

     लोकतंत्र अगर लोगों की पहली वरीयता नहीं रह जाता तो निसंकोच यह माना जा सकता है कि दुनिया एक खतरनाक मोड़ पर जा खड़ी हुई है।

यह फ़ाऊंडेशन प्रसिद्ध अमेरिकी सांसद जॉर्ज सोरोस द्वारा स्थापित किया गया है जिसके लिये उन्होंने अपना 320 करोड़ अमेरिकी डॉलर देकर इसका काम दुनिया भर में फैलाया है। यह संस्था गैर बराबरी समाप्त करने की दिशा में काम करती है।

     सोरोस पिछले दिनों भारत में उस समय चर्चा में आये थे जब उन्होंने प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के मित्र कारोबारी गौतम अदानी की कारगुजारियों पर सवाल उठाते हुए एक तरह से संकेत दिये थे कि भारत में निवेश सुरक्षित नहीं है।

      बहरहाल, जिस ओएसएफ़ सर्वे की यहां बात है वह 30 देशों में किया गया जिसके अनुसार 18 से 35 वर्ष के युवा अपने देशों में लोकतंत्र नहीं बल्कि सैन्य शासन चाहते हैं। साथ ही, 35 साल से अधिक उम्र के लोग सोचते हैं कि गरीबी, असमानता, जलवायु परिवर्तन आदि विषयों से निपटने में लोकतांत्रिक सरकारें सक्षम नहीं हैं।

 सबसे गम्भीर तथ्य जो उभरकर आया है वह यह कि केवल 30 फ़ीसदी लोगों का ही अपनी सरकारों में भरोसा है। सरकारों में अविश्वास उन्हें लोकतांत्रिक पद्धति में भी अनास्था की ओर धकेल रहा होगा।

    ओएसएफ के अध्यक्ष मार्क मैलक ब्राउन की यह चिंता वाजिब है जिसमें वे कहते हैं कि ‘हालात चिंताजनक हैं। पीढ़ी-दर-पीढ़ी लोगों की आस्था लोकतंत्र में घटती जा रही है।

     युवाओं को लगता है कि लोकतंत्र उनके जीवन में सकारात्मक बदलाव लाने में सक्षम नहीं है।’ यह सोचना होगा कि इन देशों के नागरिकों, खासकर युवाओं के दृष्टिकोण में ऐसा परिवर्तन किसलिये आया है। बमुश्किल कुछ ही दशकों पहले से लोकतंत्र सारी दुनिया की सबसे पसंदीदा शासन प्रणाली बनी है।

      जहां इस व्यवस्था को पहले-पहल लागू किया गया, उन्होंने मानवीय विकास की सुनहरी इबारतें लिखीं। इन्हें परिपक्व लोकतांत्रिक देशों के रूप में देखा जाता है। इनमें अमेरिका, कनाडा, न्यूज़ीलैंड, तमाम यूरोपीय देश हैं।

कुछ एशियाई, लातिन अमेरिकी, यहां तक कि अफ़्रीकन देश भी हैं जिनमें यह प्रणाली बहुत मजबूत तो नहीं है लेकिन उन्होंने इसे बनाये रखा है तथा उसे बनाये रखना वहां के नागरिक अपने हित में समझते हैं।

     उनकी लोकतंत्र में आस्था बनी हुई है।इनमें बहुत से ऐसे मुल्क भी हैं जहां निर्वाचित सरकार को सैन्य तानाशाह पलटकर सत्ता पर काबिज हो लेते हैं। उन देशों में लोकतांत्रिक सरकारें कभी आती हैं तो कभी सैनिक शासन द्वारा बर्खास्त कर दी जाती हैं।

     भारत के कई पड़ोसी मुल्कों में ऐसा हुआ है। बांग्लादेश में ऐसा हुआ, पाकिस्तान ने भी इसका अनुभव किया और अभी म्यांमार में चुनी हुई सरकार को कूड़ेदान में डालकर सैनिक जुंटा सत्ता पर काबिज है।

     ऐसे भी देश हैं जहां एक दलीय शासन प्रणाली है- रूस, चीन, उत्तरी कोरिया आदि। सम्भवतः इस तरह के देशों के नागरिक लोकतांत्रिक व्यवस्था की कीमत अधिक जानते होंगे।

जैसा कि भारत के संविधान निर्माता बीआर अंबेडकर ने प्रारूप सौंपते हुए संविधान सभा में अपने भाषण में कहा था कि उन्होंने तो संविधान बना दिया है लेकिन यह लागू करने वालों पर निर्भर करेगा कि वे इसे किस तरह से लागू करते हैं।

     लगभग यही बात लोकतांत्रिक प्रणाली पर भी लागू होती है। ज्यादातर समाज वैज्ञानिक व राजनीतिशास्त्र के जानकार स्वीकार करते हैं कि अब तक विश्व ने इससे बेहतर कोई शासन प्रणाली ईज़ाद नहीं की है। यह सच भी है। व्यक्तिगत और सामूहिक विकास की जो गुंजाइशें इस राजनीतिक व्यवस्था में उपलब्ध हैं, वे अन्य अन्य किसी भी प्रणाली में नहीं हैं।

    ‘लोगों की लोगों के द्वारा लोगों के लिये’ कही जाने वाली यह बेहतरीन पद्धति दुनिया की तरक्की, सामाजिक सौहार्द्र, नागरिक आजादी, बन्धुत्व और विश्व शांति व एकजुटता के लिये सर्वाधिक अनुकूल है। शेष अन्य शासन पद्धतियां अपवाद स्वरूप कहीं-कहीं और वह भी थोड़े काल के लिये अच्छी साबित हुई होंगी परन्तु व्यापक व समग्र रूप से देखें तो अन्य तरह की प्रणालियों ने लोगों का शोषण और उत्पीड़न ही किया है।

      शासन चलाने के ये तरीके कुछ ही लोगों के लिये फायदेमंद होते हैं। सामूहिक विकास इनसे बिलकुल सम्भव नहीं है। यही कारण है कि पूरी दुनिया ने अन्य पद्धतियों को छोड़कर इसका अंगीकार किया है।

यह सर्वे भारत के सन्दर्भों में भी प्रासंगिक है जहां एक खास मकसद से लोकतंत्र के ख़िलाफ़ स्वर उठवाए जाने लगे हैं। लोगों में एक नयी अभिरुचि परिलक्षित हो रही है जिसमें लोकतंत्र को खारिज कर तानाशाही की बात की जाती है। बताया जाता है कि लोकतंत्र कुछ लोगों के तुष्टिकरण के लिये देश में लागू किया गया है।

      साथ ही लोकतंत्र को एक सामूहिक परिसम्पत्ति न मानकर उस पर बहुसंख्यक वर्ग व सम्प्रदाय का एकाधिकार जायज़ कहा जाने लगा है। यह बेहद ख़तरनाक प्रवृत्ति है जिसके ख़िलाफ़ काम किये जाने की आवश्यकता है। लोकतंत्र को जीवित रखना सार्वजनिक हित में है।

Ramswaroop Mantri

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