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पूंजीवादी व्यवस्था वसुधैवकुटुंबकम के रास्ते में है सबसे बड़ी बाधा

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मुनेश त्यागी

     आजकल वसुधैवकुटुंबकम के नारे को लेकर जोर शोर की चर्चा जारी है। अभी भारत में आयोजित जी20 सम्मेलन के मौके पर इस नारे को एक बार फिर से जोर-शोर से उठाया गया, मगर इस मौके पर वसुधैव कुटुंबकम के मुद्दे और उसकी नीतियां क्या होगी इस विषय पर कोई चर्चा नहीं की गई। वसुधैवकुटुंबकम का मतलब है कि सारी दुनिया एक परिवार के समान है। एक परिवार यानी जिसमें भाईचारा, आपसी मान सम्मान, एक दूसरे के दुख दर्द की परवाह और सारे परिवार का सर्वांगीण विकास यानी सारे परिवार के सदस्यों का बिना किसी भेदभाव के समुचित विकास होगा।

     जब वसुधैवकुटुंबकम की बात पूरी दुनिया के पैमाने पर की जाती है तो इसमें पूरे समाज, पूरे देश और पूरी दुनिया के कल्याण की बात होती है। मगर वसुधैवकुटुंबकम की बात को लेकर जब समाज के पैमाने पर नजर डालते हैं तो हमारे समाज में पारिवारिक भावनाएं नहीं हैं, हमारे समाज में अमीरी गरीबी है, भुखमरी है, शोषण है, जुल्म है, अन्याय है, अत्याचार हैं, भेदभाव हैं, ऊंच नीच की भावना है, छोटे-बड़े की मानसिकता काम कर रही है, समाज से परिवार की भावना और भाईचारे की भावना लगभग गायब है। यहां परिवार जैसा कुछ भी नहीं लगता और वाकई में यहां परिवार जैसा कुछ भी मौजूद नहीं है।

      यहां पर हम देख रहे हैं जिनके पास सत्ता है, सरकार है और आजीविका के संसाधन है, वे मौज मस्ती में है, उनके लिए ही सब कुछ किया जा रहा है। मगर हमारे समाज का बड़ा हिस्सा जिसमें किसान और मजदूर शामिल हैं, वहां पर परिवार का मुद्दा बिल्कुल गायब है। उनके साथ शोषण, जुल्म, अन्याय और भेदभाव हो रहा है, वहां किसानों को फसलों का वाजिद दाम नहीं मिलता, मजदूरों को न्यूनतम वेतन नहीं मिल रहा है, यहां आपसी भाईचारे की भावना लगभग नदारद है और यहां पर मंहगाई, भ्रष्टाचार, अमीरी गरीबी, शोषण, जुल्मो सितम और अन्याय का साम्राज्य कायम हो गया है।

       वसुधैवकुटुंबकम की बात को जब देश के पैमाने पर लागू की जाती है तो यहां पर भी वसुधैवकुटुंबकम की भावना और विचार एकदम गायब है। हमारे देश में हजारों साल से दो वर्ग कायम हैं एक सामंती और पूंजीपति शोषक वर्ग और दूसरा किसान और मजदूर वर्ग यानि मेहनतकश वर्ग। हमारे देश में शोषक और पूंजीपति वर्ग के पास सब कुछ है, धन दौलत है, उनकी सरकार है, सरकार उनके हित के लिए, उनकी धन दौलत को बढ़ाने के लिए काम कर रही है और उनके एक छोटे से हिस्से का जिसमें बड़े-बड़े सरमाएदार, पूंजीपति और धन्ना सेठ शामिल हैं, केवल उनका ही विकास हो रहा है। पहले बिरला टाटा और अब अडानी अंबानी इसके सबूत हैं।

       मगर दूसरी तरफ एक अरब बीस करोड़ से ज्यादा मेहनतकशों, किसानों, मजदूरों, छात्रों और नौजवानों की संख्या है जिनके पास रोजी-रोटी का, स्थाई आमदनी का, शिक्षा का, रोजगार का, स्वास्थ्य का कोई समुचित साधन और जरिया नहीं है। इनमें से अधिकांश लोग अभाव के शिकार हैं, विकास से कोसों दूर हैं, इनके पास एक संतुलित जीवन यापन का कोई जरिया नहीं है। इनमें से अधिकांश लोग परेशान हैं। अतः ऐसे में वसुधैकुटुंबकम की बात केवल एक औपचारिकता भर रह जाती है, एक खोखला नारा, दिखावा और एक जुमला बनकर ही रह गया है।

       यही हाल वसुधैवकुटुंबकम की बात को लेकर दुनिया के पैमाने पर है। दुनिया आज मुख्यतः दो विचारधाराओं में बंटी हुई है, एक तरफ पूंजीवादी विचारधारा को मानने वाले देश हैं और दूसरी तरफ समाजवादी विचारधारा को मानने वाले देश हैं। इन दोनों विचारों के देशों में विकास के पैमाने को लेकर बहुत बड़ा अंतर है। पूंजीवादी देशों में जहां चंद बड़े बड़े पूंजीपतियों के हितों को बढ़ाने के लिए काम हो रहा है। वहां पर भी जनता का एक बहुत बड़ा हिस्सा समुचित विकास से वंचित है। वहां वसुधैवकुटुंबकम की भावना और विचारधारा एकदम गायब है।

     दूसरी ओर दुनिया के दूसरे देश हैं जिनमें समाजवादी मुल्क शामिल हैं। इन समाजवादी मुल्कों में पूर्व सोवियत संघ, चीन, उत्तरी कोरिया, वियतनाम, क्यूबा, वेनेजुएला, बोलिविया आदि देश शामिल हैं। वहां पर वसुधैवकुटुंबकम के सही दर्शन होते हैं। इन अधिकांश समाजवादी देशों में सारी जनता को विकास में शामिल किया गया है। यहां अमीरी गरीबी, शोषण जुल्म, अन्याय और भेदभाव का खात्मा कर दिया गया है और सभी लोगों को रोटी, कपड़ा, मकान, शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार और आधुनिक विकास के संसाधन मोहिया कराये गए हैं। यहां पर शोषण और अन्याय खत्म कर दिए गए हैं। इन समाजवादी मुल्कों में जनता में सही रूप से एक पारिवारिक भावना पैदा की गई है, जैसे सारा देश एक परिवार हो और यहां पर सारे लोग मिलजुल कर रहते हैं, सब लोग काम करते हैं, यहां पर अमीरी और गरीबी जैसे खत्म कर दी गई हैं। इन देशों में ही असली इंसानियत और वसुधैवकुटुंबकम और विश्वबंधुत्व की विचारधारा के असली दर्शन होते हैं।

     मगर यहीं पर दुनिया के पूंजीवादी देश जिन में अमेरिका, ब्रिटेन, जर्मनी, फ्रांस, इटली, जापान, ऑस्ट्रेलिया, कनाडा आदि शामिल हैं। वे वसुधैवकुटुंबकम की भावना के शत प्रतिशत खिलाफ काम कर रहे हैं। इन वैश्विक लुटेरे पूंजीपति देशों ने समाजवादी मुल्कों में वहां की सरकारों का, जनहित में काम करना बेहद मुश्किल कर दिया है। ये पूंजीवादी देश, इन समाजवादी मुल्कों को काम नहीं करने दे रहे हैं, उनके रास्ते में रोड़े अटका रहे हैं, उनकी घेराबंदी कर रहे हैं। ये सारे वैश्विक लुटेरे वहां पर समाजवादी सरकार और व्यवस्था को खत्म कर देना चाहते हैं।

       इस प्रकार हम देख रहे हैं की देश और पूरी दुनिया के पैमाने पर पूंजीवादी और सरमायेदार मुल्क वसुधैवकुटुंबकम की भावना के रास्ते में सबसे ज्यादा टांगें अडा रहे हैं, रुकावटें और बाधा खड़ी कर रहे हैं क्योंकि ये देश, सिर्फ और सिर्फ चंद पूंजिपतियों के मुनाफों के लिए काम करते हैं और ये चंद पूंजिपति पूरी दुनिया को मुनाफाखोरी के लिए इस्तेमाल करना चाहते हैं, उसे गुलाम बनाना चाहते हैं, पूरी दुनिया पर अपना लुटेरा प्रभुत्व कायम करना चाहते हैं, वहां पर जनतंत्र, गणतंत्र, समता और समानता की भावना के खिलाफ काम करते हैं।

      ये वैश्विक लुटेरे पूरी दुनिया में धार्मिक, नस्ली, जातिवादी, सांप्रदायिक और फासीवादी ताकतों को बढ़ावा दे रहे हैं और इस प्रकार जनता की एकता को तोड़ रहे हैं। उनको जाति, धर्म, नस्ल और साम्प्रदायिक समुदायों के आधार पर बांट रहे हैं और इस प्रकार वसुधैवकुटुंबकम की भावना के खिलाफ काम कर रहे हैं।

      हमारे देश की सरकार भी इन्हीं पूंजीपतियों की सरकार है। वह भी हमारे देश में जाति, वर्ण, नस्ल, धर्म और संप्रदाय के आधार पर देश और समाज को बांट रही है, आपसी भाईचारे की भावना को खंडित कर रही है, संविधान के नियम, शासन और सिद्धांतों को खत्म करने पर आमादा है और इस प्रकार वसुधैवकुटुंबकम की भावना के खिलाफ काम कर रही है। हां इस नारे को मीडिया, प्रेस और टीवी में उछाला जा रहा है। हमारे देश की बडे पूंजीपतियों की सरकार, केवल और केवल चंद पूंजीपतियों के और धन्नासेठों के विकास के लिए काम कर रही है, देश की सारी सम्पत्तियां उनके हवाले कर रही है, देश की अधिकांश जनता किसानों, मजदूरों, मेहनतकशों, छात्रों, नौजवानों और महिलाओं के विकास की और कल्याण की नीतियां उसके एजेंडे में नहीं हैं। सरकार की ये समस्त नीतियां भाईचारे और वसुधैवकुटुंबकम की भावना के पूरी तरह खिलाफ हैं। हां इस नारे को केवल जुमलेबाजी के रूप में ही उछाला जा रहा है।

      उपरोक्त तथ्यों के आधार पर हम देख रहे हैं कि वसुधैवकुटुंबकम के रास्ते में देश और दुनिया के लुटेरे पूंजीपति और सरमायेदार ही सबसे ज्यादा रुकावटें और बाधाएं खड़ी कर रहे हैं। इस लुटेरे पूंजीपति वर्ग का वसुधैवकुटुंबकम की भावना और विचारधारा से कोई लेना-देना नहीं है और ये तमाम लुटेरे पूंजीपति सिर्फ और सिर्फ अपने मुनाफे बढ़ाने का काम कर रहे हैं, और ये तमाम जनविरोधी ताकतें ही देश और दुनिया के पैमाने पर वसुधैवकुटुंबकम की भावना को सबसे बड़ी हानि पहुंचा रही है। वसुधैवकुटुंबकम नीतियों से बनेगा, केवल बड़बोलेपन और जुमलेबाजी और जनता को गुमराह करने से नही।

Ramswaroop Mantri

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