अग्नि आलोक
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*बाजारवाद पर बहस अनिवार्य ?*

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शशिकांत गुप्ते

पचास और साठ के दशक में कुछ
परचूनी दुकानदार छोटे बच्चों को ईनाम में गोली देते थे।यह ईनाम गोली अवयस्क बुद्धि पर एक तरह का प्रलोभन ही था। साथ ही नन्हे बच्चों के मानस में स्वार्थ पैदा करने का एक मनोवैज्ञानिक
तरीका भी था।
बाजारवाद में ईनाम की घोषणा भी एक प्रकार की रेवड़ी ही तो है।
दुर्भाग्य से बाजारवाद का बढ़ता प्रभाव ग्राहकों की मानसिकता पर हावी हो रहा है।
बाजारवाद,मुफ्त की योजनाओं
के विज्ञापनों के माध्यम से ग्राहकों को आकर्षित करता है।
एक पर एक फ्री,दो पर तीन फ्री ऐसे विज्ञापन देख,पढ़ और सुन कर स्पष्ट हों जाता है कि, यह विज्ञापन बाजारवाद की रेवड़ियां ही तो हैं। इस कहावत को नहीं भूलना चाहिए। तेल तिल्ली में से ही निकलता है।
बाजारवाद का प्रभाव अब तो सामान्यज्ञान पर हावी हो गया है?
समन्यज्ञान के प्रश्नों के जवाब की कीमत करोड़ों रूपयें हो गई है?
सामान्यज्ञान के प्रश्न जो कंप्यूटर में बंद होते हैं,और कंप्यूटर में उन प्रश्नों के जवाब भी मौजूद होते हैं।
इस खेल में प्रश्न पूछने वाले व्यक्ति को अपने स्वयं के सामान्यज्ञान से कोई लेना देना नहीं होता है या नहीं, यह एक अनुत्तरित प्रश्न है?
छः सात दशक पूर्व सामान्यज्ञान में वृद्धि के लिए, समूह के साथ मिल बैठ कर एक दूसरे से पहेलियां बूझते थे। पहेलियां बूझते हुए समूह के साथ समय का सदुपयोग भी होता था,और सामन्यज्ञान में वृद्धि भी होती थी।
बाजारवाद का सैद्धांतिक मक़सद होता है। उत्पादों की गुणवत्ता में प्रतिस्पर्धा हो और ग्राहकों को उत्पाद वाजिब दामों में मिले।
दुर्भाग्य से आज बाजारवाद में उत्पादों की गुणवत्ता में प्रतिस्पर्धा और उत्पादों की कीमत वाजिब होने के बजाए,बाजारवाद में ग्राहकों को कैसे बेवकूफ बनाया जाए,इस मुद्दे पर प्रतिस्पर्धा हो रही है?
बाजारवाद,राजनीति में भी हावी हो गया है।
लोकतंत्र में मतदाताओं के मत की कीमत अमूल्य है,लेकिन अमूल्य मत को चंद प्रलोभनयुक्त वादों को लुभावने दावों के साथ विज्ञापित किया जाता है।
प्रलोभन में आने वाले मतदाता की स्थिति चुनाव बाद संत कबीर साहब रचित निम्न दोहे की एक प्रचलित पंक्ति के भावार्थ जैसी हो जाती है।
अब पछताए होत क्या, चिड़िया चुग गयी खेत
राजनीति में ईनाम की पराकाष्ठा दिखाई दे रही है,विपक्ष को मतदान से वंचित रखने के लिए ईनाम की घोषणा हो रही है?
बाजारवाद, शिक्षा के क्षेत्र पर भी हावी हो गया है। सरकारी प्रोजेक्ट भले ही अधर में लटके हो या खग जाने खग की भाषा में आपसी लेन देन के कारण अटके हो? लेकिन जिन बच्चों के दूध के दांत भी गिरे नहीं उन बच्चों को स्कूल में प्रोजेक्ट जरूर दिए जातें हैं?
आश्चर्य दूध पर भी जीएसटी हावी हो गई है।
बालक के पालक महंगी शिक्षा का शुल्क देने में असमर्थ होने पर बालक स्वयं विद्यार्थी जीवन में ऋण का बोझ उठाने के लिए मजबूर हो रहा है।
उपर्युक्त मुद्दों पर गंभीरता से विचार विमर्श जरूरी है
बाजारवाद पर गंभीर व्यापक बहस अनिवार्य है।

शशिकांत गुप्ते इंदौर

Ramswaroop Mantri

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