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देश या राष्ट्र की अवधारणा ही अपने आप में एक छलावा

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वाचस्पति शर्मा 

थोड़ा भी गहराई से सोचने लग जाओ तो लगता है की ये देश या राष्ट्र की अवधारणा ही अपने आप में एक छलावा है। 

सबको कुछ दायरों में बाँध कर हाथों में झंडे पकड़ा दिए गए हैं। और इस गोरखधंधे के पीछे क्या चल रहा है इसे कोई विचार करने को तैयार नहीं। या फिर माहौल ऐसा बना दिया गया है की देश , राष्ट्र को ही सब कुछ मानों और गर्व करो। 

ज्यादा पीछे ना जाकर सिर्फ सौ साल पहले ही चले जाएँ तो तत्कालीन यूरोप और वर्तमान यूरोप का पूरा नक्शा ही विकृती का नमूना है। भारतीय उपमहाद्वीप का भी यही हाल है। बहरहाल – मानव जाती ने अपना 95% से ज्यादा वक़्त बिना किसी देश या राष्ट्र के बिताया है। पूरे मानव सभ्यता के विकास में सबसे बड़ी गड़बड़ राष्ट्र या देश की अवधारणा की उत्पत्ति को लेकर हुई लगती है। 

समाजवाद तो दूर की बात है , मुझे लगता है की खुद पूंजीवाद ही इस “राष्ट्र” नाम के विचार को खारिज़ कर देगा। 

जब अंतिम उद्देश्य ही संसाधनों पर कब्ज़ा , माल बेचना और ज्यादा से ज्यादा मुनाफ़ा कमाना हो तो “देश” का विचार इसके आगे नहीं ठहरता। अंततः अधिसंख्य जनता एक सस्ते श्रम का माध्यम बन जाती है।  जिससे माल बनवाकर उसी में बेचकर मुनाफा कमाया जाता है। पूंजीवाद की उच्चतम अवस्था में पूरी धरती एक देश की माफ़िक हो सकती हैं , जहाँ की जनसँख्या को पूरी तरह कंट्रोल करके अपने हिसाब से हांका जाएगा। पासपोर्ट , रेस, या किसी भी ऐथीनिसिटी के आधार पर “देशों”का कॉन्सेप्ट ख़तम हो सकता है !और बचेंगे सिर्फ काम करने वाले मज़दूर और उत्पादन के साधनों के मालिक और उत्पादन पर कंट्रोल करने वाले मालिक। 

वर्तमान में भी अगर इंग्लैण्ड और अमेरिका राष्ट्रवाद के फेर में विदेशी मज़दूरों को निकालना शुरू कर दें तो  दोनों मुल्क ही आधे से ज्यादा ही खाली हो जाए। 

जर्मनी जापान फ्रांस जैसे खांटी भाषाई दायरों में बंधे देश तक अब ज्यादा मार्केट हड़पने के चक्कर में मल्टीकल्चरल के नाम पर सस्ते कामगार अपने देशों में भर्ती कर रहें हैं। 

यही ट्रेंड आगे चलकर ऐसी संस्कृति पैदा करेगा की आप मूलनिवासी या किसी देश के वासी होने की वैल्यू खो देंगे। 

वैल्यू के नाम पर सिर्फ ये देखा जाएगा की आप अपना “लेबर” कितने सस्ते दाम पर बेच सकते हो। (स्पष्ट है की ये सब काम तथाकथित कानून बना कर ही किये जाएंगे )

इसके बावजूद भी अगर अगले सौ -दो सौ सालों तक सीमाबन्दी में बंधे “राष्ट्र” का विचार टिका रहता है , तो भी उसके गर्भ में कहीं ना कहीं अपना बाजार, अपने संसाधन और अपने मुनाफ़े को बचाये रखने का विचार ही होगा। 

मानव इतिहास में “सौ-दो-सौ साल एक चुटकी या पलक झपकाने के बराबर होतें हैं। 

मानव सभ्यता का इतिहास यही बताता है की देश या राष्ट्र की अवधारणा संसाधनों पर कब्ज़े को लेकर ही हुई थी। (भले ही इन सबको धर्म , संस्कृति और राष्ट्रवाद की भावनाओं के आवरण में लपेट के परोसा गया हो )

संस्कृती ,भाषा और डेमोग्राफी सब संसाधनों के मालिकों के बनाये नियमों के हिसाब से बदलते रहें हैं। 

और आगे भी बदलते रहेंगे। 

तो आने वाले वक़्त में धरती सिर्फ एक देश होगी और इसमें रहने वाले 99% लोग कामगार होंगे। 

जर्मन ,जापान ,पकिस्तान ,अमेरिका ,हिन्दुस्तान ,फ़्रांस … ये सब छोटे छोटे मोहल्ले के माफ़िक हो जाएंगे। 

आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस , रोबोटिक्स और ऑटोमेशन अधिकाँश काम सम्हालेंगे। और इनके प्रभाव से जो नए जॉब पैदा होंगे उनके लिए वर्क फ्रॉम होम सबसे सस्ता विकल्प होगा। मूनलाइटिंग ( कई कंपनियों के लिए एकसाथ जॉब करना ) को शायद कानूनी मान्यता मिल जायेगी . 

बचे खुचे जॉब जिनके लिए ऑफिस, या फैक्ट्री प्लांट में जाना जरुरी है उनके लिए पांच सात हज़ार किलोमीटर प्रतिघंटे के हिसाब से चलने वाली ट्रेन और अन्य यातायात के साधनो में कामगार लोग रोज धरती के एक कोने से दूसरे कोने में अप-डाउन करेंगे। ये नया कल्चर शायद  देश या राष्ट्र के कॉन्सेप्ट को ख़तम कर देगा। 

और यदि आप बारीकी से देखें तो इस नयी संस्कृति के लक्षण स्पष्ट रूप से दिखाई भी देने लगे हैं ,

आप क्या सोचते हैं इस बारे में ?

Ramswaroop Mantri

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