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‘दलित प्रोफ़ेसर ज़्यादा निशाने पर ’

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निश्चय ही अब लिखना, बोलना, आंदोलन करना, सब कुछ लोकतंत्र में अपराध होता जा रहा है। किसी भी संवेदनशील व्यक्ति के लिए यह चिंता की घड़ी है। एक और उदाहरण अरुंधति रॉय का उभारा जाने वाला मामला, देश के बौद्धिकों का दमन है। देश के बौद्धिकों को जेल भेजकर, कोई भी सत्ता, शोहरत हासिल नहीं कर सकती। समय और इतिहास सबका हिसाब रखेगा।”

सुशील मानव

इलाहाबाद केंद्रीय विश्वविद्यालय के आधुनिक एवं मध्यकालीन इतिहास विषय के असिस्टेंट प्रोफ़ेसर डॉ. विक्रम हरिजन के ख़िलाफ़ 22 अक्टूबर को प्रयागराज जिले के कर्नलगंज थाने में एक मुकदमा दर्ज कराया गया है। इसे लेकर अनेक सामाजिक कार्यकर्ताओं और बुद्धिजीवियों ने विरोध व्यक्त किया है।

प्रो. विक्रम ने खिलाफ हिंदू धर्म के मिथकों राम और कृष्ण को मौजूदा समय के लोकतांत्रिक व्यवस्था के संदर्भ में जोड़ते हुए अपने सोशल मीडिया एकाउंट पर एक पोस्ट साझा किया था, जिसके खिलाफ विश्व हिंदू परिषद, हिंदू जागरण मंच और बजरंग दल की संयुक्त शिक़ायत पर मुक़दमा दर्ज़ किया गया है। एक सप्ताह से अधिक अवधि बीत जाने के बाद भी कोई न्यायिक कार्रवाई नहीं हो पाई है। वहीं दूसरी ओर पोस्ट पर उन्हें जान से मारने की धमकियां मिल रही हैं। यूनिवर्सिटी के कुलपति और प्रयागराज पुलिस कमिश्नर को पत्र लिखकर उन्होंने अपनी सुरक्षा की गुहार लगाई है। 

प्रोफ़ेसर विक्रम पर प्रशासनिक कार्रवाई की तमाम विश्वविद्यालयों के अकादमिक विद्वानों ने निंदा की है। चौधरी महादेव प्रसाद महाविद्यालय के इतिहास विभाग के प्रोफ़ेसर डॉक्टर दीना नाथ कहते हैं कि यदि अध्यापक अपने विद्यार्थियों को तार्किकता नहीं सिखाएगा तो फिर उसका औचित्य ही क्या है। अगर भावनाएं आहत होने से इस तरह एफआईआर होते रहे तो फिर कबीर, रैदास, डॉ. आंबेडकर, पेरियार और फुले का पूरा साहित्य, तथा जो आजीवक व श्रमण परंपरा है, उसका पूरा का पूरा साहित्य फिर तो खारिज़ करना पड़ेगा। 

दलित प्रोफ़ेसर ही टारगेट पर क्यों हैं, इस सवाल के जवाब में प्रोफ़ेसर दीनानाथ कहते हैं कि “दलित प्रोफ़ेसर ही तार्किक ज़्यादा हैं, इसलिए वही ज़्यादा निशाने पर हैं। दलित परंपरा आजीवक परंपरा से निकली है। यह परंपरा संतो में कबीर और रैदास में आई है। उन्ही की बात फुले, पेरियार आंबेडकर, स्वामी अछूतानंद और मान्यवर कांशीराम करते हैं। इस तरह आज का दलित साहित्यकार उसी परंपरा में आता है। तो अगर वो चुप रहेगा तो उसकी पूरी की पूरी परंपरा खारिज़ हो जाएगी।” 

प्रोफ़ेसर दीनानाथ आगे ज़ोर देकर कहते हैं कि “अपनी परंपरा के लिए संघर्ष करना पड़ेगा। लेकिन यह समय दूसरा है। यहां तुरंत ही एफआईआर दर्ज कर दिया जा रहा है। तो दिक्कत सिर्फ़ इतनी नहीं है फिर आप कबीर और रैदास को कैसे पढ़ाएंगे। रामचरितमानस में भी साफ-साफ लिखा है– “दशरथ सुत तिहुं लोक बखाना, राम नाम का मरम है आना।” यानि दशरथ के कुलवंशी राम को संत लोग खारिज़ कर रहे हैं। राम भी निर्गुण और सगुण हुए। इसे कैसे पढ़ाएंगे? वर्ष 1990 के बाद से भावनाएं आहत होने लगी हैं। फिर संविधान का क्या मतलब है? लेकिन भारत में एक विशेष वर्ग की ही भावनाएं आहत हो रही हैं। कुछ संगठन के लोगों की भावनाएं आहत हो रही हैं। कागज पर हिंदू तो सभी हैं, लेकिन और सबकी भावनाएं तो नहीं आहत हो रही हैं। और फिर नास्तिकों की भावनाओं का क्या? मद्रास हाईकोर्ट का भी आदेश है कि नास्तिकों को ईश्वर को न मानने को भी अधिकार है।” 

प्रो. विक्रम हरिजन, प्रो. रविकांत और प्रो. रतन लाल

गौरतलब है कि 6 सितंबर, 2019 को मद्रास हाईकोर्ट ने अपने एक आदेश में त्रिची में समाज सुधारक पेरियार की मूर्ति के पास लगे उस शिलालेख को हटाने से इंकार कर दिया था, जिस पर लिखा है– “कोई भगवान नहीं है। जो भी भगवान में विश्वास करते हैं वो मूर्ख और बर्बर हैं।” याचिका को खारिज़ करते हुए हाईकोर्ट ने कहा था कि यदि याची को धर्म औऱ ईश्वर के अस्तित्व पर अपने विचार व्यक्त करने के लिए संविधान के अनुच्छेद 19 के तहत संवैधानिक अधिकार है तो दूसरों (नास्तिकों) को भी उससे असहमत होने का अधिकार है।

पिछले साल 13 अक्टूबर, 2022 को सुप्रीम कोर्ट ने यह फैसला दिया है कि किसी के भी ख़िलाफ़ 66ए के तहत केस न दर्ज़ किया जाए। गौरतलब है कि साल 2015 में श्रेया सिंहल मामले में सुप्रीम कोर्ट ने आईटी एक्ट को असंवैधानिक घोषित करते हुए टिप्पणी किया था कि आईटी एक्ट (66ए) संविधान के अनुच्छेद 19(1)(ए) के तहत बोलने और अभिव्यक्ति के मौलिक अधिकार का हनन करता है। बावजूद इस क़ानून का इस्तेमाल किया जा रहा है। 

बनारस हिंदू विश्वविद्यालय के इतिहास विभाग के सीनियर प्रोफ़ेसर एम.पी. अहीरवार दलित प्रोफ़ेसर और विद्वानों को सचेत करते हुए कहते हैं कि– “हमें वैसे भी इस बात का ध्यान रखना चाहिए कि जो दलित समुदाय के लोग हैं, उनकी नियुक्ति यूनिवर्सिटी के सिस्टम को हजम नहीं होती। उनका होना, चर्चा परिचर्चा में भाग लेना, तथ्यों के साथ तर्क करना परंपरावादियों को हजम नहीं होता। अतः जब भी कोई ऐसी तार्किक बात करता है तो उनको लगता है कि हमारे शास्त्रों की अवहलेना और धर्म पर प्रहार किया जा रहा है। इस तरह की स्वाभाविक प्रतिक्रिया उनकी होती है, क्योंकि ये लोग उस व्यवस्था को बनाए रखना चाहते हैं। प्रोफ़ेसर अहीरवार आगे कहते हैं कि ये प्रोफ़ेसर लोग जो बोल रहे हैं, वह किसी से छुपी हुई बात नहीं है, जगजाहिर बातें हैं। लेकिन बिना बात और बिना वजह के हमें सोशल मीडिया पर बोलने की अपेक्षा जो अकादमिक मंच हैं, वहां पर बोलना चाहिए और इसे प्रोपेंगैंडा करने के बजाय हमें अपने समाज सुधार की दिशा में ज़्यादा कोशिश करनी चाहिए। 

प्रो. अहीरवार आगे कहते हैं कि यदि हिंदू धर्म और व्यवस्था में जो भी कमियां हैं, हिंदू धर्मग्रंथों में कही गईं बातें हितकर नहीं लगती हैं, यदि हिंदू धर्म के चंगुल से आपको अपने समाज को बाहर लाना है तो जैसा कि बाबा साहेब ने किया था, उनमें जागृति पैदा कीजिए। 

वे यह भी कहते हैं कि हाल के दिनों में लोगों के बयान और जो भी ऐसे प्रकरण सामने आए हैं, उनसे ऐसा लगता है कि जैसे हम किसी को बिना वजह, बिना समय और काल परिस्थिति को ध्यान में रखकर किसी को कुरेदने में लगे हुए हैं। यह उनके लिए मौका उपलब्ध करवा देता है जो आपके ख़िलाफ़ होते हैं। इस समय जो भी हिंदूवादी तत्व हैं, उनको पूरी तरह से सरकार का संरक्षण मिला हुआ है। और ऐसी बातें कहने या करने का कोई बहुत मतलब भी नहीं है। वह संजीदगी और ज़मीनी तरीके से बातों को रखने पर बल देते हुए कहते हैं कि कितने लोगों ने बाबा साहेब, कांशीराम, पेरियार की बातों पर चलकर हिंदू धर्म को त्य़ाग दिया। तो ज़रूत इस तरह से काम करने की है। यदि आप उन बातों का प्रोपेगैंडा करते हैं तो जो व्यवस्था है, वह आपका फेवर नहीं करेगी बल्कि वह आपकी तार्किक बातों पर भी एफआईआर करेगी। और इससे कम-से-कम दलित समाज का भला नहीं होने वाला है।  

वहीं बनारस हिंदू विश्वविद्यालय के हिंदी विभाग के पूर्व विभागाध्यक्ष चौथीराम यादव कहते हैं कि “आज छोटी-छोटी बातों में एफआईआर और भावनाएं आहत होने लगी हैं। वह बताते हैं कि लखनऊ में एक पी.टी. चौधरी हैं। कबीर पर कुछ कार्यक्रम करना चाहती थीं और मुझे भी बोलने के लिए बुला रही थीं। उन्होंने कहा कि आपको कबीर पर बोलना है, लेकिन थोड़ा संभलकर। तो मैंने उनसे दो-टूक कहा कि मैं कबीर पर संभलकर नहीं बोल सकता। कबीर पर जब बोलूंगा तो उस तरह से चीजें आती हैं तो लोगों को दिकक्त होती है। तो मैं या तो बोलूंगा या नहीं बोलूंगा। संभलकर क्या होता है, मुझे नहीं पता। तो आज आप कुछ भी बोलिए वो अपने हिसाब से अपनी भावनाएं आहत करने वाली चीजें निकाल लेते हैं। उनकी सरकार है। आप सफाई देते रहिए। उससे थोड़े ही कुछ होता है।”

गोरखपुर यूनिवर्सिटी में इतिहास विभाग के विभागाध्यक्ष प्रोफ़ेसर चंद्रभूषण गुप्त अंकुर कहते हैं कि इस प्रवृत्ति को पिछले 10 साल से बढ़ावा मिला है। जबसे केंद्र में भाजपा और उत्तर प्रदेश में योगी सरकार आई है, तब से इस प्रवृत्ति को एक तरह से हवा दिया जा रहा है। अगर हम संविधान के पक्ष में बोलते हैं तो हमारा प्रोटेक्शन होना चाहिए। देश को संविधान से चलना चाहिए। लेकिन मुश्किल यह है कि हमने संविधान को बेशक अंगीकृत किया है, लेकिन कुछ लोगों के हित में वह नहीं है और वही लोग सत्ता में हैं। तो वे चाहते हैं कि संविधान दिखावटी तौर पर तो रहे, लेकिन चीजें चले पुराने विधान के अनुसार। तो बुनियादी तौर पर तो संविधान ही निशाने पर है, और वो सारी शक्तियां जो संविधान की बात कर रही हैं, वे भी निशाने पर हैं।

लखनऊ यूनिवर्सिटी में हिंदी विषय के अध्यापक, साहित्यकार प्रोफ़ेसर रविकांत चंदन कहते हैं कि “भाजपा की सरकार में हिंदुत्ववादी शक्तियां बेलगाम हो गई हैं। इन्हें संविधान और लोकतंत्र की किसी परंपरा या मर्यादा से कोई मतलब नहीं है। सत्ता के जरिए ये शक्तियां हर प्रतिरोधी आवाज़ को दबाने पर आमादा हैं। इस समय केवल आंबेडकरवादी इनका डटकर मुक़ाबला कर रहे हैं। इसलिए उनकी आवाज़ को दबाकर ये फिर से वर्णवादी व्यवस्था को लादना चाहते हैं। लेकिन ऐसा होगा नहीं। आने वाले समय में प्रतिरोध और मजबूत होगा और ब्राह्मणवादी ताबूत में आखिरी कील ठोकी जाएगी।”

सीमांत समुदायों के इतिहासकार व लेखक सुभाष चंद्र कुशवाहा घटना की निंदा करते हुए प्रतिक्रिया में कहते हैं कि “विगत तीन हफ्ते में दमन, खौफ़ और अभिव्यक्ति पर गहराते खतरे, सघन हुए हैं। खासकर ग़रीबों, दलितों, आदिवासी या वंचितों की आवाज़ बनने वालों के विरुद्ध। जब उर्मिलेश सहित तमाम वरिष्ठ पत्रकारों के घरों पर छापे, फिर जेल और संगीन धाराओं में मुक़दमें दर्ज़ हुए तभी सर्वोच्च न्यायालय की बहसों में अभिव्यक्ति की आज़ादी की रक्षा या देशद्रोह जैसी जनविरोधी धाराओं को हटाने की बात बेमानी नजर आई। बाद में गोरखपुर कमिश्नरी में भूमिहीनों को जमीन देने की मांग के दौरान ऑल इंडिया पीपुल्स फ्रंट के अध्यक्ष एस.आर. दारापुरी, जनपक्षधर पत्रकार और बहुजन विमर्शकार डॉ सिद्धार्थ रामू और आंबेडकर जनमोर्चा के संयोजक श्रवण निराला सहित तमाम बौद्धिकों, सामाजिक कार्यकर्ताओं को जेल भेजना, लोकतंत्र का भयावह पक्ष रहा। मुकदमे में अलग से धारा 307 भी जोड़ी गई। भूमिहीन को कम से कम एक एकड़ जमीन की मांग आंदोलन को संबोधित करने मात्र से यह दमन चला। कोई हिंसा नहीं, केवल वाजिब सवाल उठाने मात्र से। फिर लोकतंत्र में अभिव्यक्ति का मतलब क्या रहा? सिर्फ़ जयकारा लगाना?”

वे आगे कहते हैं कि “मिथकों को प्रश्नांकित करना, हाल के वर्षो का सबसे बड़ा अपराध मान लिया गया है। गौरी लंकेश की हत्या, महिषासुर को आदिवासी शासक स्थापित करने के कारण भी हुई। इलाहाबाद यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर डॉ. विक्रम हरिजन ने भी मिथकों पर लिखा और उनके खिलाफ मुकदमा दर्ज किया गया। उनका मामला कोर्ट नहीं भेजे जाने से उनकी जमानत लंबित है। पिछले साल नवरात्रि पर स्त्रियों को व्रत के बजाय संविधान पढ़ने की सलाह देने वाले अतिथि शिक्षक मिथिलेश गौतम को काशी विद्यापीठ से नौकरी से निकाल दिया गया। प्रोफेसर रतन लाल की गिरफ्तारी भी मात्र एक टिप्पणी पर हुई थी। कुल मिलाकर वंचितों की आवाज बनने वाले निशाने पर हैं। कोरेगांव मामले से इसकी शुरुआत हुई थी। हाथरस में दलित लड़की के बलात्कार को उठाने की कोशिश करने वाले केरल के पत्रकार सहित दूसरे लोग भी निशाने पर लिए गए थे। इसी तरह सितंबर, 2019 में मिर्जापुर के चर्चित नमक-रोटी कांड को उजागर करने वाले पत्रकार पवन जायसवाल पर एफआईआर की कार्रवाई हुई। बनारस के पत्रकार अमित मौर्या ‘निर्भीक’ ने भी मिथकों पर लिखा तो उन्हें जेल भेज दिया गया। स्थिति साफ है कि निशाने पर ग़रीबों, वंचितों, दलितों की आवाज उठाने वाले हैं। निश्चय ही अब लिखना, बोलना, आंदोलन करना, सब कुछ लोकतंत्र में अपराध होता जा रहा है। किसी भी संवेदनशील व्यक्ति के लिए यह चिंता की घड़ी है। एक और उदाहरण अरुंधति रॉय का उभारा जाने वाला मामला, देश के बौद्धिकों का दमन है। देश के बौद्धिकों को जेल भेजकर, कोई भी सत्ता, शोहरत हासिल नहीं कर सकती। समय और इतिहास सबका हिसाब रखेगा।”

Ramswaroop Mantri

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