अग्नि आलोक
script async src="https://pagead2.googlesyndication.com/pagead/js/adsbygoogle.js?client=ca-pub-1446391598414083" crossorigin="anonymous">

पंजाब केसरी के स्वामित्व का रहस्योद्घाटन करती रॉबिन जेफ़री की किताब

Share

हिंद समाचार ग्रुप का मालिकाना हक़ चोपड़ा परिवार के पास है. इसके लोकप्रिय अख़बार पंजाब केसरी के कारण इसे पंजाब केसरी समूह के नाम से भी जाना जाता है. 

भारत के अन्य लिगेसी मीडिया यानि विरासत में मिले समाचार प्रकाशनों की तरह इस समूह के आगाज़ की कहानी भी स्वतंत्रता आंदोलन से जुड़ी है. जब महात्मा गांधी ने 1920 के असहयोग आंदोलन में शामिल होने के लिए युवाओं का आह्वान किया, तब समूह के संस्थापक जगत नारायण सिर्फ 21 वर्ष के थे और विधि (लॉ) के छात्र थे. पढ़ाई छोड़कर वह लाहौर कांग्रेस में शामिल हो गए और जल्द ही पार्टी में ऊंचे पदों पर पहुंच गए. 

हालांकि, उन्हें भी यह देशप्रेम विरासत में ही मिला था. 

परिवार की सदस्य सीमा आनंद चोपड़ा अपने ब्लॉग timelesstrails.in में नारायण के पिता लाला लक्ष्मी दास चोपड़ा के बारे में बताती हैं, “वह लायलपुर (अब पाकिस्तान में) के कलेक्टर थे. उनका सामना एक ब्रिटिश इंस्पेक्टर से हुआ, जिसने उन्हें घोड़े से उतरकर उसे सम्मान देने का आदेश दिया. उन्होंने ब्रिटिश अधिकारी का यह अपमानजनक आदेश मानने से इनकार कर दिया और उसी क्षण नौकरी छोड़ने का फैसला कर लिया. उन्होंने कसम खाई कि उनकी आने वाली पीढ़ियां कभी भी साम्राज्यवादी ब्रिटिश सरकार की नौकरी नहीं करेंगी और उन्होंने लायलपुर के एक नामी वकील के यहां मुंशी की नौकरी कर ली.”

वह बताती हैं, “आखिरकार, वह वज़ीराबाद (अब पाकिस्तान में) के दीवानों के वंशज थे और उनके पूर्वज महाराजा रणजीत सिंह के दरबार का हिस्सा थे.”

लाहौर जेल में नारायण की मुलाकात लाला लाजपत राय से हुई; दोनों असहयोग आंदोलन के दौरान जेल में थे. इस दौरान नारायण ने पहले उनके निजी सचिव के रूप में काम किया और फिर उनकी सलाह पर भाई परमानंद के हिंदी साप्ताहिक आकाशवाणी के संपादक भी बने. इस तरह उन्होंने समाचारपत्रों की दुनिया में कदम रखा. सीमा के ब्लॉग के अनुसार, वे (1930 के दशक के) सत्याग्रह और भारत छोड़ो आंदोलन (1942) समेत अलग-अलग अवसरों पर कुल मिलाकर नौ साल जेल में रहे. 

सेवंती निनन ने अपनी पुस्तक हेडलाइंस फ्रॉम द हार्टलैंड में लिखा है कि कन्या महाविद्यालय की हिंदी प्रकाशन पांचाल पंडिता का उस समय पंजाब में काफी प्रभाव था. इसकी स्थापना 1901 में जालंधर में हुई थी और इसने महिलाओं की स्थिति में सुधार लाने के लिए अभियान चलाया था.

“1929 में लाला लाजपत राय द्वारा स्थापित लोक सेवक मंडल ने पंजाब केसरी नामक साप्ताहिक का प्रकाशन शुरू किया. पुरुषोत्तम दास टंडन इसके प्रकाशक और भीम सेन विद्यालंकार संपादक थे. लाला लाजपत राय की आत्मकथा सबसे पहले यहीं छपी थी और पंडित नेहरू ने इसमें हिंदी में लेख लिखे थे. लाहौर कांग्रेस अधिवेशन के दौरान यह दैनिक रूप से प्रकाशित होने लगा. अखबार में कांग्रेस के अंदर की खबरें छपा करती थीं. बाद में यह बंद हो गया. 1960 के दशक में एक प्रकाशन समूह ने इसी नाम से फिर एक अखबार शुरू किया (वैदिक 2002).”           

लेकिन इस नई शुरुआत से बहुत पहले देश का विभाजन हो गया, जिसके बाद जगत नारायण भारत आ गए. ब्लॉग में बताया गया है कि उन्होंने अपने बेटों रोमेश चंद्र चोपड़ा और विजय चोपड़ा के साथ 1949 में एक उर्दू दैनिक हिंद समाचार का प्रकाशन शुरू किया. प्रेस इन इंडिया: एनुअल रिपोर्ट ऑफ रजिस्ट्रार ऑफ न्यूजपेपर्स फॉर इंडिया (1958) किताब के अनुसार, इसका पंजीकरण 1948 में किया गया. “रोमेश चंदर” इसके मुद्रक और प्रकाशक थे, और नौहरिया राम दर्द संपादक.

उस समय, सभी राज्यों में सबसे अधिक (144) उर्दू प्रकाशन पंजाब में निकलते थे. पंजाबी के अखबार 102 थे जबकि हिंदी के केवल 62. उर्दू की लोकप्रियता का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि लाला लाजपत राय की स्मृति में पंजाब केसरी नाम का हिंदी अखबार 17 साल बाद छपना शुरू हुआ. जैसा कि निनान ने अपनी किताब में लिखा है, “जब समझा जाने लगा कि पंजाब में हिंदी पढ़ने वालों की तादाद इतनी है कि यह प्रयास सार्थक हो सके”. 

1967 की प्रेस इन इंडिया पुस्तक के अनुसार, “1966 में सबसे अधिक बिकने वाला अखबार जालंधर शहर से छपनेवाला (उर्दू दैनिक) हिंद समाचार था. गौरतलब है कि राज्य में सबसे अधिक बिकने वाले सारे अखबार जालंधर से छपते थे.”

1978 में समूह ने एक पंजाबी समाचार पत्र, जगबाणी भी प्रकाशित करना शुरू किया.

प्रेस इन इंडिया के अनुसार, 1986 तक पंजाब केसरी का प्रकाशन जालंधर के अलावा अंबाला और दिल्ली से भी होने लगा था. इसकी हर दिन 4,60,000 प्रतियां बिकती थीं और यह भारत में सबसे अधिक बिकनेवाला हिंदी अखबार था. 1990 के दशक के अंत तक यह उत्तर भारत में सबसे अधिक बिकने वाला हिंदी दैनिक बना रहा. हालांकि, किताब के अनुसार, 2005 आते-आते यह दैनिक जागरण, दैनिक भास्कर, हिंदुस्तान और अमर उजाला से पिछड़ रहा था, जो कहीं अधिक आक्रामक रूप से आगे बढ़ रहे थे.

रॉबिन जेफ़री ने अपनी किताब इंडियाज़ न्यूज़पेपर रिवोल्यूशन: कैपिटलिज़्म, पॉलिटिक्स एंड द इंडियन-लैंग्वेज प्रेस, 1977-99 में लिखा है कि पुराने अभिजात वर्ग के लोग अपने अखबारों में “साहित्यिक भाषा और शास्त्रीय शैली में लिखते थे. जिसे वे ‘उत्कृष्ट गद्य’ मानते थे”. लेकिन पंजाब केसरी जैसे अखबारों ने अपने लेखन में बोलचाल की भाषा का प्रयोग करके उनके भाषाई आधिपत्य का अंत कर दिया, जो उनकी “असुविधा और निराशा” का कारण बना. 

जेफरी की किताब में उस समय के मीडिया के कामकाज की भी झलक मिलती है. मसलन, तब मीडिया की आय, पहुंच और अस्तित्व पर किन चीजों का प्रभाव था, और कौन से तरीके और उपकरण प्रयोग किए जाते थे.

Ramswaroop Mantri

Recent posts

script async src="https://pagead2.googlesyndication.com/pagead/js/adsbygoogle.js?client=ca-pub-1446391598414083" crossorigin="anonymous">

प्रमुख खबरें

चर्चित खबरें