राजस्थान में शनिवार को विधानसभा चुनाव के लिए वोट डाले जाएंगे। कहने को तो सभी सियासी दलों ने अपनी पूरी ताकत झोंक दी है। लेकिन राजस्थान के दो इलाकों की 27 ऐसी सीटें हैं, जो यहां की सियासत में सरकार बनाने का दमखम रखती हैं। तमाम सियासी गुणा-भाग के बाद भी सभी राजनीतिक दल इन 27 सीटों पर अपनी जोर आजमाइश में लगे हुए हैं। इन्हीं तमाम सियासी उधेड़बुन के बीच राजस्थान में दो ऐसी पार्टियां भी हैं, जो इन 27 सीटों पर अपना सबसे बड़ा दावा ठोंक कर राजस्थान की सियासत का मूड बदलने में लगी हुई हैं। सियासी जानकार भी बताते हैं कि आदिवासी क्षेत्र की ये सीटें राजस्थान की सियासत में हमेशा से ही महत्वपूर्ण मानी जाती रही हैं।
राजस्थान में सरकार बनाने और बिगाड़ने में आदिवासियों की महत्वपूर्ण भूमिका रहती है। यही वजह है कि सभी राजनीतिक दल न सिर्फ आदिवासी बाहुल्य क्षेत्र में अपनी पूरी ताकत लगाकर सियासत को अपने पक्ष में करने की कवायद करते हैं, बल्कि तय संख्या से ज्यादा आदिवासियों को टिकट देकर एक नैरेटिव सेट करने का संदेश देते हैं। ये सियासी एक्सरसाइज राजस्थान के उदयपुर और बांसवाड़ा इलाके की 27 सीटों पर होती है। ताकि यहां की इन सभी 27 सीटों पर जीतने वाली पार्टी जयपुर में सत्तासीन हो सके। राजस्थान बांसवाड़ा इलाके में 13 सीटें और उदयपुर क्षेत्र में 14 सीटें आदिवासी बाहुल्य मानी जाती हैं। राजनीतिक दलों की सियासी कवायद इन्हीं 27 सीटों पर अपने समीकरण सेट कर सीटों के जीतने की होती है।
राजस्थान की 27 सीटों के लिए भारतीय जनता पार्टी और कांग्रेस हमेशा से बड़े दांव लगाती आई हैं। आंकड़ों के मुताबिक राजस्थान में 13 फीसदी आदिवासी वोटर हैं। राजस्थान के वरिष्ठ पत्रकार और राजनीतिक विश्लेषक अरुण शर्मा कहते हैं कि 2013 के विधानसभा चुनाव में भारतीय जनता पार्टी ने उदयपुर और बांसवाड़ा सीटों पर बड़ी बढ़त बनाई थी और राज्य में सत्तासीन हुई थी। जबकि 2018 में कांग्रेस ने इन्हीं बांसवाड़ा और उदयपुर क्षेत्र की 27 सीटों में से 21 सीटों पर अपना परचम लहराया था। अरुण कहते हैं कि आदिवासी क्षेत्र में ज्यादा सीटें मिलने का सीधा मतलब यही होता है कि जयपुर में वही पार्टी सत्ता संभालेगी, जिसे यहां सबसे ज्यादा सीटें मिलेंगी। इसलिए पूरे राजस्थान के सभी सियासी दल इस क्षेत्र में अपनी पूरी ताकत झोंक कर एक नैरेटिव सेट करके जयपुर में अपनी पकड़ मजबूत कर सरकार बनाना चाहते हैं।
बांसवाड़ा और उदयपुर क्षेत्र में भारतीय जनता पार्टी और कांग्रेस शुरुआती समय से आदिवासियों की पैरोकार होने का दावा करती हैं। इसी दरमियान 2018 में आदिवासियों के हक में आवाज बुलंद करने का दावा करने वाली भारतीय ट्राइबल पार्टी ने मजबूती से इस इलाके में अपनी पैठ जमाई। नतीजतन 2018 के विधानसभा चुनाव में बीटीपी को दो सीटें भी मिलीं। अरुण शर्मा कहते हैं इस विधानसभा के चुनाव में बीटीपी एक बार फिर से मजबूती के साथ इस क्षेत्र में चुनाव लड़ रही है। जबकि इस इलाके में आदिवासियों की एक और पार्टी भारत आदिवासी पार्टी भी सियासी ताल ठोक रही है। इन दोनों पार्टियों की मजबूती से चुनाव लड़ने के चलते इस इलाके में कई सीटों पर लड़ाई न सिर्फ त्रिकोणात्मक हो गई है, बल्कि कई सीटों पर यह दोनों दल भारतीय जनता पार्टी और कांग्रेस का सियासी खेल बिगाड़ने की स्थिति में भी पहुंच गई है।
राजनीतिक जानकारों का मानना है कि बीटीपी और बीएपी की मजबूत लड़ाई में सभी सियासी दल अब नए तरीके से अपनी राजनीतिक फील्डिंग को लगाकर सीट बटोरने की जुगत में लगे हैं। बांसवाड़ा के ऑल इंडिया ट्राइबल नेटिव संगठन से जुड़े गोवर्धन कोसी कहते हैं कि सियासी तौर पर भारतीय जनता पार्टी और कांग्रेस लंबे समय से उनके समुदाय के लिए राजनीति करते आए हैं। लेकिन बीते कुछ समय से जिस तरीके से उनके समुदाय से सीधे ताल्लुक रखने वाले लोगों की पार्टियों ने राजनीतिक दखल शुरू किया है, तो निश्चित तौर पर दोनों बड़ी पार्टियों के लिए कुछ चुनौतियां तो बढ़ ही गई हैं। गोवर्धन का कहना है कि इस इलाके में अभी भी उनके समुदाय के लोग राजस्थान के अन्य इलाकों की तुलना में न सिर्फ पिछड़े हैं, बल्कि उन्हें आगे बढ़ाने की बहुत दरकार है। उनका मानना है कि उनके हक की जो भी बात करेगा, आदिवासियों का वोट उसके साथ ही जाएगा। इसमें चाहे भाजपा-कांग्रेस हो या भारतीय ट्राइबल पार्टी और भारतीय आदिवासी पार्टी।
राजस्थान की सियासत में आदिवासियों का कितना महत्व है, इसका अंदाजा भारतीय जनता पार्टी और कांग्रेस की ओर से दिए गए टिकट बंटवारे से पता चलता है। सियासी जानकार गोविंद साहू कहते हैं कि भारतीय जनता पार्टी ने इस बार जहां 30 आदिवासी उम्मीदवार सियासी मैदान में उतारे हैं। वहीं कांग्रेस ने 32 आदिवासी उम्मीदवारों को चुनाव लड़ने के लिए मैदान में भेजा है। इन्हीं इलाकों में भारतीय ट्राइबल पार्टी ने 12 प्रत्याशी चुनावी मैदान में उतारे हैं। भारत आदिवासी पार्टी ने 21 प्रत्याशी इस आदिवासी बहुल क्षेत्र में किस्मत आजमाने के लिए जनता के बीच भेजे हैं। राजनीतिक विश्लेषक गोविंदा का मानना है कि 2013 और 2018 समेत इससे पहले के चुनावी आंकड़े इस बात की तस्दीक करते हैं कि जिसने आदिवासियों के क्षेत्र में अपना परचम बुलंद किया राजस्थान में सरकार उसी की बनी है। यही वजह है कि इस चुनाव में सभी राजनीतिक दल बांसवाड़ा और उदयपुर क्षेत्र की 27 सीटों पर अपनी पूरी ताकत लगाकर सियासी मैदान में डटे हैं।





