पुराने नेता का यू कांग्रेस में जाने से आहत खांटी भाजपाई, उदास हुए कई चेहरे_
_पुरानी पीढ़ी के नेता का अपने दल से अलविदा कहने की ये क्या आखरी घटना होगी? भाजपा चिंतित_
_कांग्रेस का दावा- आगे आगे देखते जाईये, अभी और नेता आएंगे हमारे साथ_
_सत्तन गुरु को भी आया कांग्रेस से ऑफर, कमलनाथ का दूत पहुँचा, “अयोध्या” का ऑफर लेकर_
_*..एक और नींव का पत्थर अपनी जगह से सरक गया। जब पार्टी का कोई “धणी धोरी” नही था, तब ये नींव के पत्थर ही पार्टी की आन बान और कार्यकर्ताओं की शान हुआ करते थे। विपक्ष में रहते हुए भी इन नेताओं के कारण पार्टी नेताओं और कार्यकर्ताओं का वो दबदबा शासन, प्रशासन में रहता था, जितना आज पार्टी के सत्ता में रहते भी नसीब नही। इन्ही नेताओ के दम पर तब की सरकारें पहले जनसंघ, फिर भाजपा से भयभीत रहती थी। पलभर में ये नेता बांह ओटते मैदान में आ जाते। विपक्ष में रहते हुए भी इनके तेवर देखने लायक होते थे। ऐसे ही तेंवर वाला एक नींव का नेता आस्तीन को ओटते हुए नींव से एक तरफ हो गया। कंगूरों को क्या पता, नींव के इन पत्थरों का दर्द? लेकिन ये सर्वविदित भी है कि- नींव कमजोर होते ही, भवन भरभराकर जमीदोज हो जाता हैं। फिर चाहे वो कितना ही मजबूत क्यो न हो।*_
*नितिनमोहन शर्मा*
*किसने सोचा था कि भाजपा में ऐसा भी होगा? ऐसा दिन भी आएगा कि पार्टी के उन नेताओं को पार्टी छोड़ना होगी, जिन्होंने पार्टी बनाई, खड़ी की। जिन्होंने नेता बनाये। नीति बनाई। सत्ता पक्ष से दो दो हाथ किये। ऐसे नींव के पत्थर पार्टी से अलग हो जाएंगे…किसी ने कल्पना भी नही की थी। लेकिन ऐसा हो रहा हैं। वह भी केवल अपने मध्यप्रदेश में। यहाँ आखिर ऐसा क्या किया सत्ता और संगठन ने मिलकर की पार्टी के पुराने नेता एक के बाद एक पार्टी छोड़ते जा रहें हैं। दीपक जोशी से शुरू हुआ सिलसिला भंवरसिंह शेखावत तक आ पहुँचा हैं। शेखावत कल कांग्रेस के हो गए। सिलसिला थमा नही। कांग्रेस से ताजा ऑफर राष्ट्र कवि, भाजपा के पितृ पुरुष पण्डित सत्यनारायण सत्तन के पास आया हैं। कमलनाथ का दूत सत्तन गुरु के पास विधानसभा 4 यानी भाजपा की अयोध्या कही जाने वाली सीट से टिकट देने का ऑफर लेकर पहुँचा। सत्तन गुरु ने फिलहाल ये ऑफर ये कहकर ठुकरा दिया हैं कि उनका चुनाव लड़ने की कोई अभीप्सा नही हैं।*
*भाजपा के ऋषिमना नेता, पूर्व मुख्यमंत्री कैलाश जोशी के सुपुत्र दीपक जोशी के बाद अब भाजपा के “मर्द” भँवर दादा कांग्रेस का हिस्सा हो गए। आस्तीन को चढ़ाकर, सत्ता पक्ष पर चढ़ जाने वाले बेबाक भँवरसिंह शेखावत भाजपा में “मर्द राजनीति ” के लिए जाने जाते थे। उनका ताजा निर्णय भी “मर्दानगी” दिखा रहा है। अन्यथा ऐसे समय जब सब तरफ भाजपा का बोलबाला है, तब कोई कैसे पार्टी से किनारा कर सकता हैं? शेखावत ने सदैव तेवर की राजनीति की। वे इन्दोर के ही नही, मालवा अंचल के उन पुराने नेताओ में थे जिनके जरिये पहले पार्टी ने जनसंघ का सफर तय किया और उसके बाद भाजपा का। विधानसभा 5 से शेखावत विधायक रहे। बाद में उन्होंने बगल के बदनावर को अपनी राजनीति की कर्मभूमि बनाया।* *वे वहां से भी विधायक रहे और इस बार भी बदनावर से ही उन्हें टिकट की दरकार थी। भाजपा ने इस मामले में कोई स्पष्ट बात नही की। नतीज़े में शेखावत ने कांग्रेस का दामन थाम लिया। इस भरोसे के साथ कि उन्हें बदनावर से कांग्रेस लड़ाएगी।*
*शेखावत की कार्यशैली दमदार थी। कैलाश विजवर्गीय जैसे नेता भी उन्ही की देन हैं। शेखवत की राजनीति का एक बड़ा हिस्सा विपक्ष में रहते बीता। लेकिन वे ऐसे तेवर वाले नेता रहे कि पार्टी ने विपक्ष में रहकर भी सत्तारूढ़ कांग्रेस पर हमेसा धमक ओर दबदबा बनाये रखा। शेखावत की प्रशासनिक क्षमता भी जोरदार थी। किसी अफ़सर को उन्होंने शहर में हावी नही होने दिया। आज की जो भाजपा अफसरों के सामने नतमस्तक है, शेखावत का दौर इससे ठीक उलट था। अफसरशाही के खिलाफ आज जो तेवर कैलाश विजवर्गीय के रहते है, वे शेखावत की याद दिलाते हैं। शेखावत जैसे नेता के जाने से पार्टी में उनके समकालीन नेता-कार्यकर्ता आहत और उदास हैं। वे कहते भी है कि सोचा न था ये दिन भी देखना होंगे।*
*भाजपा को भारी पड़ेंगे भँवर?*
क्या भाजपा को भंवरसिंह शेखावत का जाना भारी पड़ेगा? ये सवाल कल से सत्ता के गलियारों में रह रहकर गूंज रहा हैं। पहले से ही “करणी सेना-कांग्रेस” जुगलबंदी से जूझ रही शिवराज सरकार के लिए ठेठ राजपूत भंवरसिंह का रूठकर चले जाना, चुनावी मैदान में क्या गुल खिलायेगा? ये वक्त बताएगा। लेकिन सूत्रों की माने तो शेखावत सिर्फ बदनावर के टिकट तक ही सीमित नही रहेंगे। कांग्रेस ने उनके लिए राजपूत लॉबी के बीच काम करने का प्लान तैयार किया हुआ हैं। ब्राह्मण वोटर्स की नाराज़गी के बाद ठाकुर लॉबी में इस तरह से लगती सेंध ने फिलहाल तो भाजपा के नीति निर्धारकों को किंकर्तव्यविमूढ़ कर रखा हैं।
*सत्तनजी को ” अयोध्या ” से चुनाव लड़ने का आया ऑफर*
शेखावत के झटके से अभी पूरी तरह से भाजपा उबरी भी नही थी कि पार्टी के ही एक अन्य वरिष्ठ नेता सत्यनारायण सत्तन के पास भी कांग्रेस का ऑफर पहुँचा हैं। ऑफर कमलनाथ की तरफ से था। ऑफर लेकर पहुँचे व्यक्ति ने सत्तन को विधानसभा 4 यानी भाजपा की अयोध्या से चुनाव लड़ने का ऑफर दिया। सत्तन गुरु ने इसे स्वीकारा की उनके पास ऑफर आया। सत्तनजी ने बताया कि रोकड़े नाम का एक आदमी ये ऑफर लेकर आया था। मेने ठुकरा दिया लेकिन उनके दुस्साहस की तारीफ करूँगा कि वे मुझ तक आ पहुँचे। सत्तन ने कहा कि मेरी कोई अभीप्सा नही। न कोई स्वार्थ। आवागमन की राजनीति स्वार्थवश होती हैं। मेरा कोई स्वार्थ नही।





