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सार्वजनिक स्वास्थ्य व्यवस्था की एक गंभीर और चिंताजनक तस्वीर:पाँच साल में स्वास्थ्य बजट के 1.32 लाख करोड़ रुपये खर्च ही नहीं हुए

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केंद्रीय बजट 2026 में स्वास्थ्य क्षेत्र के लिए बढ़े हुए आवंटन के दावों के बीच नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (CAG) की ताज़ा ऑडिट रिपोर्ट ने सार्वजनिक स्वास्थ्य व्यवस्था की एक गंभीर और चिंताजनक तस्वीर सामने रखी है। CAG ऑडिट के अनुसार, बीते पाँच वर्षों में केंद्र सरकार का स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय अपने ही स्वीकृत बजट का पूरा उपयोग करने में विफल रहा है। वित्त वर्ष 2019-20 से 2023-24 के बीच कुल 1,32,749 करोड़ रुपये स्वास्थ्य बजट से सरेंडर कर दिए गए, यानी यह राशि खर्च ही नहीं की गई।

जन स्वास्थ्य अभियान इंडिया (JSAI) द्वारा जारी प्रेस नोट में कहा गया है कि यह लगातार कम खर्च करने का चलन सार्वजनिक स्वास्थ्य प्रणाली को भीतर से कमजोर कर रहा है। जबकि सरकार स्वास्थ्य को प्राथमिकता बताती रही है, वास्तविकता यह है कि सकल घरेलू उत्पाद (GDP) के अनुपात में स्वास्थ्य पर सार्वजनिक खर्च पिछले कई वर्षों से 0.29 से 0.31 प्रतिशत के बीच ही अटका हुआ है, जो सार्वजनिक स्वास्थ्य पर GDP के कम से कम 5 प्रतिशत खर्च की घोषित प्रतिबद्धता से बहुत दूर है।

पिछले वर्षों के बजट आँकड़ों पर नज़र डालें तो स्वास्थ्य मंत्रालय का अनुमानित बजट 2019-20 में 64,559 करोड़ रुपये था, जो 2026-27 में बढ़कर 1,04,599 करोड़ रुपये हो गया। लेकिन संशोधित बजट और वास्तविक खर्च के आँकड़े यह दिखाते हैं कि आवंटन बढ़ने के बावजूद खर्च लगातार कम रहा। उदाहरण के तौर पर 2022-23 में जहाँ स्वास्थ्य मंत्रालय के लिए 86,201 करोड़ रुपये का अनुमानित बजट रखा गया, वहीं वास्तविक खर्च घटकर 75,731 करोड़ रुपये रह गया। इसी तरह 2023-24 में 89,155 करोड़ रुपये के अनुमानित बजट के मुकाबले वास्तविक खर्च 83,149 करोड़ रुपये तक सीमित रहा।

CAG ऑडिट में “लैप्स बजट” के रूप में दर्ज यह बचत कोई अपवाद नहीं, बल्कि एक स्थायी प्रवृत्ति बन चुकी है। ऑडिट रिपोर्ट बताती है कि 2019-20 में 23,715 करोड़ रुपये, 2020-21 में 45,614 करोड़ रुपये और 2021-22 में 39,826 करोड़ रुपये स्वास्थ्य बजट से खर्च नहीं हो पाए। यह स्थिति उस समय और गंभीर हो जाती है, जब देश की सार्वजनिक स्वास्थ्य प्रणाली बुनियादी ढांचे, मानव संसाधन और आवश्यक सेवाओं की भारी कमी से जूझ रही है।

जन स्वास्थ्य अभियान इंडिया के अमूल्य निधि और गोरांगों मोहपात्रा ने कहा कि CAG की ऑडिट टिप्पणियों का अध्ययन करने से यह साफ़ होता है कि स्वास्थ्य और परिवार कल्याण विभाग तथा स्वास्थ्य अनुसंधान विभाग—दोनों ही अपने स्वीकृत प्रावधानों का पूरा उपयोग किसी भी वित्तीय वर्ष में नहीं कर पाए। उनका कहना है कि जब आवंटन पहले से ही कम हो, और उसमें भी लगातार कम खर्च किया जाए, तो इसका सीधा असर आम नागरिकों को मिलने वाली स्वास्थ्य सेवाओं पर पड़ता है।

ऑडिट में यह भी सामने आया है कि 2022-23 और 2023-24 जैसे हालिया वर्षों में भी स्वास्थ्य बजट में बड़ी बचत दर्ज की गई। वित्त वर्ष 2023-24 में स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण विभाग के लिए 1,04,683 करोड़ रुपये स्वीकृत किए गए थे, लेकिन वास्तविक खर्च 95,561 करोड़ रुपये ही हुआ, जिससे 9,122 करोड़ रुपये बच गए। इसी अवधि में स्वास्थ्य अनुसंधान विभाग में भी 121 करोड़ रुपये खर्च नहीं हो सके। इससे एक साल पहले 2022-23 में यह बचत और अधिक थी, जब स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण विभाग में 14,472 करोड़ रुपये और स्वास्थ्य अनुसंधान विभाग में 768 करोड़ रुपये खर्च नहीं किए गए।

CAG की नवीनतम ऑडिट रिपोर्ट (रिपोर्ट संख्या 4, 2025) स्वास्थ्य उपकर को लेकर भी गंभीर सवाल खड़े करती है। रिपोर्ट के अनुसार, स्वास्थ्य और शिक्षा उपकर संग्रह 2018-19 में 41,310 करोड़ रुपये से बढ़कर 2022-23 में 61,814 करोड़ रुपये हो गया। इसी दौरान कुल उपकर और अधिभार संग्रह 4.81 लाख करोड़ रुपये तक पहुँच गया। लेकिन ऑडिट यह स्पष्ट करता है कि स्वास्थ्य उपकर को सार्वजनिक स्वास्थ्य खर्च के लिए अलग से सुरक्षित नहीं रखा गया है। यह राशि भारत की संचित निधि में चली जाती है और इसे स्वास्थ्य सेवाओं पर ही खर्च किया जाए, इसका कोई पारदर्शी और जवाबदेह तंत्र मौजूद नहीं है।

जन स्वास्थ्य अभियान इंडिया का कहना है कि यही कारण है कि बजटीय घोषणाएँ और उपकर संग्रह, सार्वजनिक स्वास्थ्य सेवाओं में वास्तविक और निरंतर निवेश का विकल्प नहीं बन पा रहे हैं। संगठन ने यह भी चिंता जताई कि केंद्र सरकार द्वारा स्वास्थ्य से जुड़े राजस्व संग्रह और उसके उपयोग को लेकर पारदर्शिता तथा परिणाम-आधारित रिपोर्टिंग की गंभीर कमी है।

इस स्थिति को देखते हुए जन स्वास्थ्य अभियान इंडिया ने मांग की है कि CAG को बजट सत्र के दौरान ही 2024-25 से जुड़े प्रमुख वित्तीय खातों पर अपनी ऑडिट टिप्पणियाँ सार्वजनिक करनी चाहिए, ताकि संसद और देश को वास्तविक स्थिति का पता चल सके। संगठन ने यह भी कहा है कि स्वास्थ्य उपकर को विशेष रूप से सार्वजनिक स्वास्थ्य सेवाओं के लिए सुरक्षित किया जाना चाहिए और राज्यों की वित्तीय क्षमता को मजबूत किए बिना सार्वभौमिक स्वास्थ्य सेवाओं का लक्ष्य हासिल नहीं किया जा सकता।

Ramswaroop Mantri

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