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शरजील इमाम, उमर खालिद, मीरान हैदर के बाद अब आफरीन फातिमा निशाने पर क्यों ?

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आफरीन फातिमा अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय महिला कॉलेज छात्र संघ की अध्यक्ष भी रह चुकी हैं। आफरीन की सोच और काम की वजह से अलीगढ़ के अंदर के दकियानूस पुरुषों और कॉलेज प्रशासन को भी मुश्किलों का सामना करना पड़ा। अगर सही तरीके से देखा जाए तो मुस्लिम महिलाओं का दुश्मन सांप्रदायिक और पितृसत्ता में विश्वास रखने वाला समाज दोनों होता है। बता रहे हैं अभय कुमार

बीते दिनों आफरीन फातिमा का घर उत्तर प्रदेश की योगी आदित्यनाथ की हुकूमत ने बुलडोजर चलाकर ध्वस्त कर दिया। देखा यह जा रहा है कि शरजील इमाम, उमर खालिद, मीरान हैदर के बाद अब आफरीन फातिमा हुकूमत के निशाने पर हैं। हालांकि यह पहला मौका नहीं है जब इस तरह से आवाज दबाने की कोशिश की गई है। इससे पहले भी जब कभी शोषित वर्गों की ओर से कोई शक्तिशाली आवाज उठती है, तो हुकूमत की कोशिश रहती है कि उसे किसी न किसी बहाने उसे जनता की नजरों में देशद्रोही साबित कर दिया जाए और किसी न किसी मामले में फंसाकर जेल भेज दिया जाय। इस तरह यह संदेश देने की कोशिश की जाती है कि अगर दबे कुचले समाज में से कोई भी अपने अधिकारों के लिए लड़ने के लिए आएगा तो उसको मिटा दिया जाएगा, जैसे आफरीन फतिमा की मां के घर को ध्वस्त कर दिया गया।

जेएनयू के पूर्व छात्र और सामाजिक और राजनीतिक कार्यकर्ता आफरीन फातिमा अपने जनपक्षीय विचारों के लिए जानी जाती रही हैं। इसे लेकर सोशल मीडिया कुछ लोग सरकार की यह कहकर आलोचना कर रहे हैं कि प्रयागराज में बीते रविवार को जो हुआ, वह भारतीय लोकतंत्र के लिए काला दिन था। उस दिन सत्ता का पूरी तरह से दुरुपयोग किया गया था। यह कानून और संविधान का गला घोंटने के समान था। लोगों के धर्म, समुदय और जाति को देखकर यूपी सरकार निर्णय ले रही है। ऐसा लगता है कि यह सरकार संवैधानिक मूल्य धर्मनिरपेक्षता की जगह हिंदू राष्ट्र की विचारधारा के अनुसार काम कर रही है। इस तरह की अनेकानेक टिप्पणियां विभिन्न सोशल मीडिया मंचों पर अनायास ही देखा जा सकता है। 

हाल का यह पूरा घटनाक्रम भाजपा की नेत्री नुपूर शर्मा द्वारा पैगंबर के खिलाफ टिप्पणी के साथ शुरू हुआ। इस मामले में अरब देशों सहित इस्लामिक देशों के समूह ने आपत्ति व्यक्त की। इस क्रम में उत्तर प्रदेश के प्रयागराज में भी विरोध प्रदर्शन किया गया। इस दौरान पुलिसकर्मियों और आंदेलनरत लोगों के बीच तीखी नोंक-झोंक हुई। इसके लिए आफरीन फातिमा और उनके पति जावेद को जिम्मेदार माना गया। होना तो यह चाहिए था कि नुपूर शर्मा जैसे लोगों को सरकार जेल में रखती। लेकिन ऐसा न कर, हुकूमत उनलोगों के खिलाफ कार्रवाईयां कर रही है, जो विरोध प्रदर्शन में शामिल थे। हालांकि यूपी पुलिस का आरोप है कि विरोध प्रदर्शन के दौरान हिंसा की गई, इसलिए कार्रवाईयां की जा रही हैं।  

पूरे घटनाक्रम को देखें तो ऐसा लगता है जैसे जो लोग मुस्लिम समुदाय से अपने अधिकारों के लिए लड़ने के लिए आगे आ रहे हैं, उन्हें जानबूझकर निशाना बनाया जा रहा है। उनकी पूरी जिंदगी बर्बाद करने की कोशिश की जा रही है। उसे एक “कट्टरपंथी” और “राष्ट्र-विरोधी” अपराधी के रूप में चित्रित किया जा रहा है। न्यायालय और मानवाधिकार संगठनों ने भी इस मामले में चुप्पी साधी हुई है।  

आफरीन फातिमा का कहना है कि उनके पिता जावेद मोहम्मद पर हिंसा भड़काने का आरोप लगाया गया और उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया। मगर बीते शुक्रवार को जुमे की नमाज के बाद विरोध प्रदर्शन किया जा रहा था तब जावेद अपने घर पर ही थे। कहा यह भी जा रहा है कि उत्तर प्रदेश पुलिस ने कुछ ही घंटों में जिस घर को गिरा दिया, वह आरोपी और आफ़रीन के पिता जावेद मोहम्मद के नाम पर नहीं है, बल्कि वउनकी मां के नाम पर है। भला आरोपी की पत्नी के घर को गिराने की इजाज़त देश का कौन सा क़ानून देता है? दूसरी बात यह है कि जब आफ़रीन के घर से सारे टैक्स सालों से वसूले जा रहे थे और उसपर प्रशासन को कोई आपत्ति नहीं थी, तो अचानक से ऐसा क्या हुआ कि घर को अवैध निर्माण करार दे दिया गया। इसके अलावा अगर कोई ऐसी बात होती भी है तो घर तोड़ने से पहले नोटिस लगाई जाती है। 

आफरीन फातिमा जेएनयू के दिनों से परिचित हैं। पढ़ाई के साथ-साथ वह सामाजिक और राजनीतिक आंदोलनों में भी सक्रिय रही हैं। कुछ ही दिनों में आफरीन की लोकप्रियता जेएनयू में काफ़ी बढ़ गई। इससे पहले, उन्होंने अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय से भाषा विज्ञान में स्नातक किया था। वह अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय महिला कॉलेज छात्र संघ की अध्यक्ष भी रह चुकी हैं। अफरीन की सोच और काम की वजह से अलीगढ़ के अंदर के दकियानूस पुरुषों और कॉलेज प्रशासन को भी मुश्किलों का सामना करना पड़ा। होता यह था कि अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय की छात्राओं को हॉस्टल से बाहर निकलने पर बहुत सारी पाबंदीयां सालों से लगी हुई थीं। अगर उन्हें अस्पताल जाना होता तो पहले प्रशासन से अनुमति लेनी पड़ती थी। इन सब पाबंदियों से अलीगढ़ के छात्रा काफी नाराज थे। अफरीन ने अपने चुनाव प्रचार के दौरान इन सवालों को उठाया और छात्राओं के लिए समान अधिकार की मांग की। 

हालांकि आफरीन तब अपने मिशन में कामयाब नहीं हुई, लेकिन उनकी वजह से और बदले हुए माहौल को देखते हुए अलीगढ़ विश्वविद्यालय प्रशासन ने छात्राओं को कुछ रियायतें दीं। इस दौरान उन्होंने अलीगढ़ में महिला नेतृत्व के विषय पर एक बड़ा शिखर वार्ता भी आयोजित किया, जिसे कुछ पुरुषों ने बाधित करने की कोशिश की। अगर सही तरीके से देखा जाए तो मुस्लिम महिलाओं की दुश्मन सांप्रदायिक और पुरुषों के वर्चस्व में विश्वास रखने वाला समाज दोनों होता है। संप्रदायवादी उन्हें “उत्पीड़ित”, “अनपढ़”, “असहाय”, “बीमार”, “कमजोर” और “कट्टरपंथी” के रूप में पेश करना चाहते हैं। जबकि समाज के पुरुष उन्हें घर में क़ैदकर रखना चाहते हैं। यानी उन पर हमला दोतरफा है।

जेएनयू में भी आफरीन को संप्रदायवादियों के विरोध के साथ-साथ रूढ़िवादियों की भी आलोचना झेलनी पड़ी। लेकिन वे जवाब देने के बजाय काम करने में ज़्यादा विश्वास रखती थीं। जल्द ही कैंपस में उनकी पहचान बन गई और उसने अपनी बातों और कामों से छात्रों का दिल जीत लिया। जेएनयू को जो लोग भी अच्छी तरह से जानते हैं, उन्हें यह बात बखूबी मालूम है कि यहां के छात्र चुनाव में सफल होने के लिए आपको वामपंथ और दक्षिणपंथ में से किसी एक के समर्थन की जरूरत होती ही है। किसी भी छात्र के लिए उनकी मदद के बिना चुनाव जीतना आसान बात नहीं है। चुनाव के दौरान भाषण देकर ताली बटोरना एक बात होती है और चुनाव जीतना दूसरी बात। इसलिए आफरीन फातिमा की इस सफलता को असाधारण प्रदर्शन कहा जा सकता है। जेएनयू में अफरीन का छात्र संगठन ‘फ्रटर्नटी’ से संबद्ध था और उसके समर्थकों में मुसलमानों के अलावा बड़ी संख्या में दलित छात्र भी शामिल थे। देश के कमजोर तबके के हितों से जुड़े इन मुद्दों पर आफरीन जेएनयू कैंपस के बाहर भी उठाती थीं। मेरी स्मृति में नागरिकता संशोधन कानून (सीएए) के विरोध में आफरीन अन्य मुस्लिम महिलाओं की तरह, देश और देश को बचाने के लिए सड़कों पर उतरीं। सवाल उठता है कि क्या आज इन्हीं खूबियों की वजह से उन्हें और उनके पूरे परिवार को निशाना बनाया जा रहा है?

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