█ महात्मा गांधी और भगत सिंह का एक ऐसा अनसुलझा अध्याय जिसे आज झूठ की फैक्ट्री चलाने वाले भजपैया अपने राजनैतिक स्वार्थ के लिए ढाल बनाते हैं।
★ इतिहास के पन्ने जब पलटते हैं, तो धूल अक्सर उन चेहरों पर जमती है जिन्होंने आज़ादी की लड़ाई में कभी नाखून तक नहीं कटवाया, पर आज वे ही ‘अहिंसा के पुजारी’ और ‘इंकलाब के शेर’ के बीच दरार पैदा करने का कुत्सित और घृणित प्रयास कर रहे हैं।
★ यह बहस केवल दो महानायकों की नहीं है, बल्कि उस कालखंड की है जब एक तरफ सत्य-अहिंसा की लाठी थी और दूसरी तरफ फंदे को चूमने वाला वो जज्बा जिससे गोरी हुकूमत की चूलें हिल गई थीं।
★ आज के दौर के कुछ स्वघोषित ‘महामानव’ और उनके अंधभक्त, जो खुद को राष्ट्रवाद का एकमात्र ठेकेदार समझते हैं, अक्सर यह जहरीला सवाल हवा में उछालते हैं कि क्या गांधी जी ने भगत सिंह को जानबूझकर नहीं बचाया।
★ मार्च 1931 का वह समय भारतीय इतिहास का सबसे भावुक और मनोवैज्ञानिक तनाव से भरा क्षण था, जहाँ एक तरफ गांधी-इरविन समझौता हो रहा था, जिसे कुछ लोग ‘दो महात्माओं का मिलन’ कह रहे थे, वहीं दूसरी तरफ लाहौर जेल की कालकोठरी में मौत का सन्नाटा नहीं, बल्कि इंकलाब का गगनभेदी शोर था।
★ “सरफ़रोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है, देखना है ज़ोर कितना बाज़ू-ए-क़ातिल में है” ये पंक्तियाँ उस समय कागज़ पर नहीं, बल्कि हिंदुस्तान के हर नौजवान के सीने में धड़क रही थीं और इसी धड़कन से ब्रिटिश हुकूमत के पसीने छूट रहे थे।
★ साक्ष्यों की जुगाली करने वाले भजपैया यह भूल जाते हैं कि 11 फरवरी से लेकर 23 मार्च तक गांधी जी ने वायसराय लॉर्ड इरविन पर हर तरह का कूटनीतिक और नैतिक दबाव बनाने में कोई कसर बाकी नहीं छोड़ी थी।
★ लॉर्ड इरविन की निजी डायरी और तत्कालीन ब्रिटिश खुफिया दस्तावेज आज भी चीख-चीख कर गवाह देते हैं कि गांधी जी ने सजा को Suspension यानी मुल्तवी करने के लिए हर संभव कानूनी और मानवीय तर्क दिया था।
★ फिरंगियों के मन में खौफ इतना गहरा बैठ चुका था कि उन्होंने तय वक्त से 11 घंटे पहले ही, सूरज ढलने के बाद जेल मैन्युअल की धज्जियाँ उड़ाते हुए उन वीरों को फांसी दे दी, क्योंकि उन्हें डर था कि बाहर खड़ी जनता का सैलाब जेल की दीवारें ढहा देगा।
★ गांधी जी का मार्ग सत्याग्रह था, जहाँ साधन की पवित्रता यानी सर्वोपरि थी, जबकि भगत सिंह का मार्ग Radical Revolution का था, जिसमें दुश्मन को उसकी भाषा में जवाब देना शामिल था।
★ इन दोनों महापुरुषों के बीच Ideological Conflict तो था, लेकिन यानी व्यक्तिगत द्वेष का नामोनिशान नहीं था, क्योंकि दोनों का लक्ष्य एक ही था भारत माँ की बेड़ियाँ काटना।
★ भगत सिंह ने स्वयं जेल से लिखे अपने क्रांतिकारी पत्रों में गांधी जी के जन-आंदोलन की अपार शक्ति को स्वीकार किया था, और गांधी जी ने भी यंग इंडिया में भगत सिंह के अदम्य साहस को Unmatched Bravery का नाम दिया था।
★ शहीद-ए-आजम ने अपने पिता की उस दया याचिका को सिरे से ठुकरा दिया था, क्योंकि वे जानते थे कि एक जीवित भगत सिंह से कहीं ज्यादा शक्तिशाली और खतरनाक शहीद भगत सिंह होगा जो आने वाली सदियों तक फिरंगियों की नींद हराम रखेगा।
★ “दिल से निकलेगी ना मर कर भी वतन की उल्फ़त “मेरी मिटी से भी ख़ुशबू -ए- वफ़ा आएगी” इस फकीराना जज्बे और शहादत की प्यास को क्या दुनिया का कोई भी समझौता या कोई भी नेता रोक सकता था।
★ आज जो लोग गांधी जी पर उंगली उठाते हैं, उनके वैचारिक पूर्वज उस दौर में अंग्रेजों की मुखबिरी करने और माफीनामे लिखने में व्यस्त थे, जो आज राष्ट्रवाद का चोला ओढ़कर असली क्रांतिकारियों के वारिस बन रहे हैं।
★ यह कितनी बड़ी विडंबना है कि इस ‘नॉन बायोलॉजिकल’ अवतार के युग में उन लोगों को देशभक्ति का पाठ पढ़ाया जा रहा है जिनके पुरखों ने लाठियाँ खाईं और जेल की कालकोठरियों में अपनी जवानी गला दी।
★ इन ‘झूठ के सौदागरों’ और ‘भ्रष्ट जनता पार्टी’ के नुमाइंदों को न तो भगत सिंह से प्रेम है और न ही गांधी से, उन्हें तो बस गांधी के महान कद को छोटा दिखाकर अपनी नफरती और विभाजनकारी राजनीति की दुकान चलानी है।
★ गांधी जी ने अपनी मर्यादाओं और सीमाओं में रहकर पूरी ताकत झोंकी थी, लेकिन वे ब्रिटिश राज के सुप्रीम कोर्ट नहीं थे, और न ही उनके पास वो ‘दिव्य शक्तियां’ थीं जिनका दावा आज के कुछ स्वयंभू नेता करते फिरते हैं।
★ भगत सिंह ने अपनी शहादत खुद चुनी थी, क्योंकि उन्हें पता था कि उनके रक्त की हर एक बूंद इस सोई हुई कौम के रगों में लावा बनकर बहेगी और ब्रिटिश साम्राज्य का अंत सुनिश्चित करेगी।
★ आज समय की मांग है कि हम इन दोनों महान सपूतों को आपस में लड़ाने वाली ताकतों की पहचान करें और उनके Divide and Rule वाले जहरीले एजेंडे को पूरी तरह से बेनकाब कर दें।
★ गांधी जी ने आज़ादी का रास्ता दिखाया और भगत सिंह ने उस रास्ते पर चलने का जुनून पैदा किया, दोनों ही इस मिट्टी के अनमोल रत्न हैं जिन्हें अलग करना नामुमकिन है।
★ जो लोग आज इतिहास को तोड़-मरोड़कर पेश कर रहे हैं, उन्हें यह समझना चाहिए कि सूरज पर धूल फेंकने से उसकी चमक कम नहीं होती, बल्कि धूल फेंकने वाले की आंखें ही खराब होती हैं।
★ अंततः यह संघर्ष केवल गोरे अंग्रेजों के खिलाफ नहीं था, बल्कि उन भीतरघातियों के खिलाफ भी था जो आज भी हमारे बीच मौजूद हैं और नकली राष्ट्रवाद का ढोल पीट रहे हैं।
★ इंकलाब का नारा आज भी उतना ही प्रासंगिक है जितना 1931 में था, क्योंकि आज हमें अपनों के बीच छिपे उन ‘भजपिल्लों’ से लड़ना है जो देश की एकता और भाईचारे को दीमक की तरह चाट रहे हैं।
सत्य परेशान हो सकता है, पराजित नहीं। इंकलाब जिंदाबाद! 🚩
महत्वपूर्ण सूचना: उपरोक्त लेख ऐतिहासिक साक्ष्यों, संस्मरणों और विभिन्न शोध पत्रों के गहन अध्ययन पर आधारित है। पाठक अपनी बौद्धिक संतुष्टि के लिए ऐतिहासिक अभिलेखागारों और निष्पक्ष इतिहासकारों की पुस्तकों का अध्ययन कर तथ्यों की स्वयं जाँच करें ताकि किसी भी प्रकार के भ्रम या दुष्प्रचार से बचा जा सके।






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