जब नवनीत राणा, तजिंदर बग्गा, अमन चोपड़ा, यति नरसिंहानंद, कालीचरण जैसे फ़ासिस्ट खेमे के दंगाइयों तक आँच पहुँची तो अचानक नागरिक अधिकार याद आ गए? अब तक जब सामाजिक कार्यकर्ताओं को, अल्पसंख्यकों, दलितों, आदिवासियों को महीनों सालों इन कानूनों के नाम पर बिना बेल जेल में सड़ाया जा रहा था तब मौन थे, फादर स्टेन स्वामी को पैरोल न देकर जेल में मार दिया, वरवर राव को भी लगभग अधमरी अवस्था में छोड़ा। इन्हीं काले कानूनों का संरक्षण करते हुए जो तुम पिछले 8 साल से फ़ासिस्टी दमन का सबसे मजबूत हथियार बने हुए, न्याय और नागरिक अधिकारों का मज़ाक बना कर रख दिये, अब जब तुम्हारे फ़ासिस्ट आकाओं के दंगाई गुर्गे चपाटी खुद लपेटे में आए तो तुम्हें नागरिक अधिकारों की याद आई? तुम्हारी इस अवसरवादी धूर्ततापूर्ण नौटंकी पर तुम्हें संविधानवादी लिब्बुओं से तालियाँ और वाहवाही शायद मिल जाए, पर हम तो तब तक नहीं मानेंगे जब तक ये काले कानून रद्द नहीं होते, इससे कम किसी नौटंकी या शब्दों की बाज़ीगरी का कोई मतलब नहीं।
*और इसे ही नहीं रासुका , UAPA को भी असंवैधानिक घोषित करो





