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बुखार की प्राचीनता 

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जूली सचदेवा

  _बुखार या ज्वर पर सबसे पुराना उल्लेख लगभग 2800 साल पहले का है, जब आर्य पश्चिमोत्तर से गंगा मैदान की ओर बढ़ चले थे, लेकिन अभी भी गण्डक नदी के पार मगध और अंग की ओर न पहुँचे थे._
  (पूरी जानकारी के लिए शतपथ-ब्राह्मण ग्रन्थ का उद्दालक-आरुणि संवाद को पढ़ें)

ग्रंथ में उल्लेख है :
“हे अग्नि! जिस प्रकार आप अपने में समाहित सभी वस्तुओं को जलाकर पीला करते हैं, उनका भक्षण करते हैं, उसी प्रकार आपके प्रभाव से यह ज्वर (बुखार) सरलता से भाग जाएगा।
सभी शक्तियों को धारण करने वाली हे जड़ी-बूटियां, झुर्रियों वाले इस ज्वर को और इसकी पुत्री को नीचे फेंके।
नयी जगह पर आप आश्वस्त नहीं हैं। हालांकि, आप ताकतवर हैं, किंतु हम पर दया करें। ज्वर को अपना सही स्थान मिल जाएगा, वो बहलीक (उत्तरी पाकिस्तान-अफगानिस्तान) के पास चला जाएगा।
इतनी ठंडक फिर भी इतनी जलन, आप हमको खांसी से आक्रांत कर देते हैं, आपका चरित्र काफी भयावह है, हे ज्वर! हमें अपने से मुक्ति प्रदान करें।

आप अपने साथ अपने सम्बन्धियों को ले जाएं, जो हैं:- लम्बी कमजोरी,तेज चलने वाली साँसे, खाँसी आदि।
हे ज्वर! आपका भाई लंबी कमजोरी है , आपकी बहन जो जानलेवा खाँसी है, आपका चचेरा भाई खुजली, सभी को साथ ले जाएं।
ऐसा ज्वर जो बहुत दिनों तक रहता है, जिसमें बाहर से ठंड लगती है, अंदर से शरीर जलता है, ग्रीष्म का ज्वर अथवा वर्षा का ज्वर सभी को दूर भगाएँ।
गांधार और मुंजवत के लोगों के पास अथवा अंग और मगध के लोगों के पास हम ज्वर को भेज रहे हैं। जिस तरह एक संवाद वाहक अच्छी चीजों को वहाँ ले जाता है।
(चेतना विकास मिशन)

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