सीमा आजाद
‘सबसे सुरक्षित जगह सबसे खतरनाक जगह है।’ मुझे लगता है कि यह अरुंधति रॉय की नई किताब ‘मदर मेरी कम्स टू मी’ की ‘पंच लाइन’ है, जिसमें एक बड़ा दर्शन है। अरुंधति रॉय ने अपना अब तक का जीवन इसी दर्शन के साथ जीया है। जब भी उन्हें कोई जगह सुरक्षा देने लगती है, वे उस सुरक्षित जगह को खतरनाक बना लेती हैं और वहां से निकल भागती हैं और अपने जीवन को फिर से बुनती हैं।
वास्तव में अगर वे इन ‘सुरक्षित जगहों’ से नहीं भागतीं तो वे ‘विश्वविख्यात (और कुछ लोगों के लिए कुख्यात) लेखिका ‘अरुंधति रॉय’ नहीं बन पातीं। मुझे लगता है किताब की इस ‘पंच लाइन’ को हर महिला को अपने लिए याद कर लेना चाहिए। न सिर्फ आज़ाद खयाल लेखिका बनने के लिए, बल्कि वो सब कुछ बनने के लिए, जो भी उसने अपने जीवन के लिए सोचा है।
ज्यादातर घर, और विवाह जो औरतों को स्थायित्व देने वाली सबसे सुरक्षित जगहें मानी जाती हैं, वास्तव में वे ही उनके लिए सबसे खतरनाक जगहें हैं। ये जगहें उनके आगे बढ़ने की, बेटी, पत्नी, मां की भूमिका से अलग एक इंसान की तरह सोचने और एक्ट करने की सारी क्षमता सोख लेती हैं। लेकिन मुझे आशंका है कि ऐसे तयशुदा घरों के स्थायित्व, आराम और सुरक्षा को छोड़कर अस्थाई और असुरक्षित तरीके से जीने के लिए भी लेखिका को बुरा-भला कहा जायेगा, क्योंकि ‘ये इण्डिया है मेरी जान’ (किताब की एक और पंच लाइन)। इस कारण से भी नारीवाद में रुचि रखने वालों को यह किताब ज़रूर पढ़नी चाहिए, जो विमर्श के कई दरवाजे खोलती है।
अरुंधति रॉय की नई रचना ‘मदर मेरी कम्स टू मी’ जब से पाठकों के बीच आई है, उनकी हर रचना की तरह इसने भी साहित्य की दुनिया में खलबली मचा दी है। कुछ साहित्यकार तो केवल इसका कवर देख कर ही इसके ‘खतरनाक’ ‘अराजक- बुरी महिला’ और ‘एंटी नेशनल’ होने की घोषणा कर बैठे, क्योंकि कवर पर अरुंधति की बीड़ी पीते हुए तस्वीर छपी है। बैक कवर पर आज की अरुंधति की तस्वीर है। इस रूप में यह कवर इस किताब को सही ढंग से व्याख्यायित भी करता है- ‘तब की अरुंधति से अब की अरुंधति तक का सफर’। लेकिन इस बहस को यहीं छोड़ना बेहतर है।
अरुंधति रॉय की यह रचना उनकी मां मेरी रॉय के हवाले से एक संस्मरण हैं, जो मेरी रॉय के साथ अरुंधति के जीवन संघर्षों के बारे में बहुत कुछ बताती है। उनके लेखन में जो जनपक्षधरता की धार है उसके स्रोत का खुलासा करती है। जिसके कारण उन्हें ‘एक्टिविस्ट लेखिका’ कहा जाता है, जो शब्द खुद उन्हें नहीं पसन्द है। वे कहती हैं यह ‘एक्टिविस्ट’ और ‘लेखक’ दोनों का अपमान है क्योंकि लेखक होने का मतलब ही है, अपने लिखने के लिए तथ्य वह समाज से हासिल करे, लिखना अपने आप में एक एक्टिविज्म है इसे लेखन के साथ अलग से जोड़ने की जरूरत नहीं है। क्रांतिकारी कवि वरवर राव इसे यूं लिखते हैं ‘लेखक अपने स्वभाव से ही जनपक्षधर होता है।’
मेरी रॉय, भारत की नारीवादियों और शिक्षाविदों के बीच जिनका नाम सम्मान से लिया जाता है, अपने जीवन और अपने सपने के प्रति जिद्दी की तरह समर्पित महिला थीं। हमारे समाज में बेटी, बहन, पत्नी और मां होने को जितने पवित्र भाव से लिया जाता है, वे सबकी धज्जियां उड़ाते हुए जीती हैं। वे अपने बच्चों (अरुंधति और उनके बड़े भाई) से इतना बुरा बर्ताव करती हैं कि पढ़कर उन छोटे बच्चों के लिए आंख में आंसू आ जाते हैं।
किताब का एक हिस्सा उनके इस बुरे व्यवहार के बारे में है, और अपने सपने के प्रति उनके समर्पण के बारे में भी। शायद इसी हिस्से को पढ़कर कुछ बुद्धिजीवियों की यह रॉय बनी है, कि वे अपनी मां को ‘बुरी महिला’ के रूप में प्रस्तुत करती हैं। लेकिन मिसेज मेरी के प्रति अरुंधति कोई बुरी रॉय नहीं रखती हैं। उनके आकलन को लेकर वे बेहद तटस्थ हैं। वे उन्हें एक इंसान के रूप में देखती हैं, जो सिर्फ मां बनने के लिए नहीं पैदा हुई हैं। वे लिखती हैं कि ‘मुझे लगता है मिसेज रॉय के तीन बच्चे थे। मेरा भाई मैं और स्कूल, जिसमें सबसे ज़्यादा वे अपने स्कूल को प्यार करती थीं।
ये अरुंधति रॉय की साफ दृष्टि और उनके लेखन का ही कमाल है कि उन्होंने अपनी मां को अपने सपने के प्रति पागल एक इंसान के रूप में बेहद बेबाकी से याद किया है। बल्कि मैं यह कहने से अपने को नहीं रोक पा रही हूं कि उन्होंने सिखाया है कि ‘बुरे पिता’ (जो कि अधिकांश घरों में पाये जाते हैं) और ‘बुरी मां’ या किसी भी रिश्ते को उनकी अपनी पृष्ठभूमि में समझा जाना चाहिए। इसके बाद उनसे उतनी ही दूरी या नज़दीकी से रिश्ता बनाये रखना भी थोड़ा आसान हो जाता है। वे अपनी ‘बुरी मां’ का घर इसलिए हमेशा के लिए छोड़ देती हैं, ताकि वे उन्हें इंसान के तौर पर प्यार करती रह सकें।
जबकि भारतीय घरों में अधिकतर लोग एक ही घर में खुद अपमानित होते हुए, दूसरों को अपमानित करते हुए, लड़ते-झगड़ते हुए बने रहते हैं, क्योंकि भारतीय घरों की यही परम्परा है। अरुंधति ने घर छोड़ने के बाद अपनी मां से, जिन्हें वे ऐसे मौकों पर ‘बैंकर’ लिखती हैं, से अपनी पढ़ाई के पैसे लेना भी बंद कर दिया। 16 साल की उम्र से उन्होंने अपनी मेहनत और दोस्तों के सहयोग से अपनी पढ़ाई पूरी की। उनका यह जीवन संघर्ष आश्चर्यजनक लगा, क्योंकि उन्हें देखकर ऐसा लगता था कि अरुंधति को जीवन में कोई दिक्कत नहीं आई होगी, वे मुंह में चांदी का चम्मच लेकर पैदा हुई होंगी।
अपना जीवन चलाने के लिए उन्होंने, प्रगति मैदान में पेंटर के तौर पर दिहाड़ी की, आर्किटेक्ट ऑफिस में काम किया, फिल्मों में काम किया, स्क्रिप्ट लिखी और थोड़ा पैसा जुटा लेने के बाद अपना मनपसंद लेखन किया। पति का अमीर आरामदायक, सुरक्षित घर भी उन्हें खतरनाक लगने लगा, और उन्होंने अपने लेखन के लिए दूसरी जगह बनाई। वे अपने बड़े नाम वाले पति के साथ रहते हुए भी उनके प्रभाव तले दबी नहीं, खत्म नहीं हुईं, बल्कि अपनी पहचान के प्रति सजग रहीं, कई मौकों पर उनके खिलाफ खड़ी हुई। ऐसा ही एक मौका है फूलन देवी पर फिल्म का, जिसकी उन्होंने तीखी आलोचना न सिर्फ मौखिक तौर पर की, बल्कि लिखकर की। जबकि इससे उनके पति को आर्थिक नुकसान हुआ और इसके लिए उन्होंने अरुंधति को काफी भला-बुरा कहा।
यह पढ़ते हुए मुझे खुद के बैंडिट क्वीन देखने की याद आयी। मुझे यह फिल्म पसन्द नहीं आयी थी और देखने के बाद मैं कई दिन तक नार्मल नहीं रह सकी, जबकि मेरे साथियों को फिल्म पसंद आयी थी। उस वक्त मैं चुप्पी लगा गई, क्योंकि उस वक्त मुझे समझ नहीं आया था कि फिल्म मुझे क्यों नहीं पसंद आयी। अब यह किताब पढ़ने के बाद मैंने फिर से उस समय को याद किया और समझ में आ गया कि क्या बात थी, जो मुझे भी नागवार लगी थी।
यह पूरी किताब दो औरतों के जुझारू संघर्ष की कहानी है। एक जिसने अपने ‘नथिंग मैन’ (नल्ला आदमी) को छोड़कर अपना सपना पूरा करने, अपना स्कूल बनाने के लिए कड़ी मेहनत की, पैतृक सम्पत्ति में बेटियों के अधिकार के लिए कानूनी लड़ाई लड़ी, स्कूल को आधुनिक और सेक्युलर मूल्यों के साथ चलाने के लिए प्रशासन से लड़ाई लड़ी और बेटी ने अपना जीवन अपने तरीके से जीने के लिए लड़कियों के लिए सुरक्षित सभी जगहों में खतरा सूंघा और उसे अपने जीवन से निकाल दिया। खतरनाक जगहों, खतरनाक विषयों, को उन्होंने अपने लेखन के साथ अपने जीवन का भी हिस्सा बना लिया। उनके लेखन के कारण उन पर कई केस दर्ज हैं, जो अभी भी चल रहे हैं और जिनका वो बहादुरी से सामना कर रही हैं। इसे वे कहती हैं ‘वे बहादुर नहीं थी, उनके पास कोई विकल्प नहीं था’।
इस किताब में एक हिस्सा उनकी रचना यात्रा का है, जो काफी रोचक है। स्क्रिप्ट राइटिंग से लेकर ‘गॉड ऑफ स्माल थिंग्स’ का सफर और उसके बाद हर खतरनाक माने जाने वाले मुद्दों, जिन्हें छूने से लेखक अक्सर डरते हैं, उन्होंने गहरे अध्ययन के साथ अपना विषय बनाया। खतरनाक सरकार से लेकर खतरनाक कार्यपालिका, न्यायपालिका- उन्होंने सब पर लिखा। इस लेखक धर्म को निभाने के कारण ही उन्हें ‘एक्टिविस्ट लेखिका’ और साथ ही ‘विवादित लेखिका’ भी माना जाता है। हालांकि वे लिखती हैं वे हार, असहमति और विवादों को भी पसंद करती हैं।
किताब जैसे-जैसे आज की अरुंधति तक पहुंचती है ऐसा लगता है जैसे अरुंधति रॉय के विकास के साथ-साथ मेरी रॉय की सोच का भी विस्तार होता रहा। उनके व्यक्तिगत संघर्षों का विस्तार सामाजिक संघर्षों तक पहुंचता रहा, जो कि उन दोनों की कुछ बातचीत से झलकता है। संभवतः दोनों एक-दूसरे को गढ़ती रहीं।
यह पढ़ना रोमांचक था कि पूरा जीवन जीने के बाद मौत के 8 महीने पहले मेरी रॉय ने अपनी बेटी अरुंधति रॉय को पहली बार कहा कि ‘मैं दुनिया में सबसे अधिक तुमसे प्यार करती हूं।’ जैसे किसी उपन्यास की ‘हैप्पी एंडिंग’। लेकिन संस्मरण आगे बढ़ता है और मेरी रॉय की मौत के बाद खत्म होता है।
अरुंधति रॉय की बाकी रचनाओं की तरह यह भी ज़रूर पढ़ी जाने वाली किताब है, जो औरत की भारतीय छवि में तोड़-फोड़ करते हुए उसे एक इंसान के रूप में पाठकों के सामने रखती है, जाहिर है इसके कारण हमेशा की तरह लेखिका को आलोचना भी सहना ही होगा। क्योंकि ‘ये इण्डिया है मेरी जान’।

