~ पुष्पा गुप्ता
नौनिहालों को नींद के लिए मां की गोद या लोरियां काफी हैं, लेकिन बढ़ते बच्चों की कल्पनाशीलता को थोड़ा और बड़ा आकाश चाहिए। कुछ नया,कुछ अजूबा, कुछ रोमांचक। उनकी इसी ज़रुरत को पूरा करने के लिए ही मांओं और घर के बड़े-बूढ़ों ने किस्सों-कहानियों का सहारा लिया होगा।
किस्सों में आरम्भ में उनके व्यक्तिगत और सामाजिक अनुभव शामिल रहे होंगे। समय के साथ उनमें उनकी कल्पनाशीलता भी शामिल होती चली गई। बात गांव के किसानों, साहूकारों और सामंतों से राजा-रानियों तक पहुंची। किस्सों में रोमांच पैदा करने के लिए कालान्तर में इनमें जादूगर, राक्षस, जिन्नात, भूत-प्रेत, देवदूत और परियां जुड़ती चली गईं। कहने की शैली में बदलाव आए। किस्सागोई की इस लगातार विकसित होती कला ने न सिर्फ किस्सा कहने वालों की सोच को विस्तार दिया, बल्कि उन्हें सुनने वाले बच्चों की कल्पना-शक्ति को भी पंख और परवाज़ बख्शे।
बच्चों में अपनी भाषा और साहित्य के प्रति अभिरुचि पैदा करने की यह सबसे पहली कोशिश थी। अंग्रेजी में इन्हें बच्चों की ‘बेडटाइम स्टोरीज’ कहा जाता है। तब से आज तक ये किस्से बच्चों की सोच के अभिन्न अंग और आकर्षण के प्रमुख विषय रहे हैं।
किस्सों के प्रति यह आकर्षण दुनिया भर के बच्चों में कमोबेश एक जैसा ही रहा है। आदिम जनजातियों से लेकर विकसित सभ्यताओं तक। बड़ों में वैज्ञानिक दृष्टि और तर्कशक्ति के विकास तथा बच्चों की बदलती रुचियों के साथ और देश-काल के अनुरूप बेडटाइम स्टोरीज के कथ्य और कहने के तरीकों में थोड़े बदलाव ज़रूर आए हैं, लेकिन इनके प्रमुख पात्र – राजा-रानी, भूत-प्रेत, राक्षस और परियां अब भी अपनी जगह से विस्थापित नहीं हुई हैं।
किसी भी तर्क से परे इनका जादू आज भी बरक़रार है। एक दशक पहले अमेरिका के बच्चों के बीच कराए गए एक व्यापक सर्वेक्षण से पता चला कि बचपन की कहानियों के पात्रों में परियां बच्चों की सबसे पहली पसंद थीं। स्त्रियों की सी शक्ल-सूरत लेकर किसी दूसरे लोक से आने वाली, अपनी जादुई शक्ति के बल पर पंखों से ऊंची-ऊंची उड़ान भरने वाली और बच्चों को परीलोक की सैर पर ले जाने वाली असीम सौन्दर्य वाली परियां बच्चों की कल्पनाशक्ति को सबसे ज्यादा उड़ान देती रही हैं।
बाल कथाओं के भूत-प्रेत, चुड़ैलें, तांत्रिक और जादूगर बच्चों के दूसरे सबसे बड़े आकर्षण साबित हुए। यह शायद इसीलिए कि इन पात्रों में बच्चों के भीतर ही नहीं, बड़ों में भी डर और रोमांच पैदा करने की क्षमता होती है। बच्चों की तीसरी पसंद सामंती व्यवस्था के अवशेष राजा-रानी, राजकुमार-राजकुमारी और उनके महल पाए गए।
हाल के समय में बेडटाइम स्टोरीज में कुछ नए पात्रों का भी प्रवेश हुआ है। दूसरे ग्रहों से आए एलियंस, अंतरिक्ष यात्री, आकाशीय युद्ध, अच्छे-बुरे वैज्ञानिक, अपराधी और जासूस भी उनमें शामिल हो गए हैं।
पिछले कुछ दशकों में बच्चों की ज़िन्दगी में मोबाइल फोन, टीवी, वीडियो गेम आदि के बढ़ते दखल के साथ महानगरों के बच्चों में मौखिक किस्सों के प्रति आकर्षण बहुत कम हुआ है। अब उन्हें नींद को बुलाने या भगाने के लिए श्रव्य नहीं, दृश्य कहानियां चाहिए।
गांवों के बच्चों के बीच भी वाचिक किस्सागोई का जादू टूट रहा है। संकट अब ऐसे किस्से सुनाने वाले लोगों का भी है। पिछली पीढ़ी तक लगभग हर टोले-मुहल्ले में किस्सागोई की कला में माहिर एक-दो लोग हुआ करते थे। शाम ढलते ही ऐसे लोगों के गिर्द आसपास के बच्चे एकत्र हो जाया करते थे।
उत्सुकता और जिज्ञासा का एक अजीब-सा माहौल होता था तब। किस्सा ख़त्म होते ही भारी आंखों में नींद लिए बच्चे मां की गोद में लौट जाते थे। टोलों-मुहल्लों से सामूहिकता की संस्कृति लुप्त हुई तो यह ज़िम्मेदारी घर के किसी न किसी सदस्य ने संभाल ली। दादी और नानी के किस्से ऐसे ही नहीं मुहाबरें बने।
एकल परिवारों के अकेलेपन, जीवन की जटिलताओं और आपाधापी में शहरों के लोगों के पास न बच्चों को देने के लिए पर्याप्त समय है और न उन्हें कहानियां सुनाने का धैर्य। नतीजा यह हुआ है कि बच्चों की मानसिक ज़रूरतें उन्हें टीवी और वीडियो गेम्स की तरफ खींचकर ले गई हैं।
टीवी पर आने वाले बच्चों के कार्यक्रमों की कहानियों, उनके अजीबोगरीब चरित्र और कारनामों ने बच्चों की रोमांचप्रियता को कुछ हद तक खुराक तो जरूर दिया हैं, लेकिन यह माध्यम अपने साथ जो कुछ लेकर आया हैं वह वांछित तो बिल्कुल नहीं है। रहस्य और रोमांच की कथाओं का वाचिक परंपरा से दृश्य परंपरा में यह परिवर्तन बच्चों को निरंतर अकेला कर रहा है।
उनके भीतर के पारिवारिक और सामूहिकता के संस्कारों का निरंतर क्षरण हो रहा है। यह परिवर्तन कस्बों और गांवों में भी तेजी से घट रहा है।
माध्यम चाहे जो भी रहा हो, बच्चो की दिलचस्पी इन काल्पनिक कहानियों में आज तक बनी हुई है। आगे भी बनी रहेगी। समाज में बढ़ती जटिलता, शहरीकरण और संयुक्त परिवारों के टूटने के साथ वाचिक किस्सागोई की आदिम परंपरा को देर-सबेर नष्ट होना ही है।
इस तथ्य को समझ कर दुनिया भर के मनोवैज्ञानिक किस्सों की मौखिक परंपरा का विकल्प खोजने के लिए चिंतित हैं। यह माना जा रहा है कि टीवी के सहारे तेजी से फ़ैल रही कथा सुनाने की दृश्य परंपरा से बच्चे न केवल अपने आसपास की दुनिया में दिलचस्पी खोते जा रहे हैं, बल्कि धीरे-धीरे अवसादग्रस्त भी हो रहे हैं। स्वस्थ विकल्प निश्चित रूप से किताबें ही हैं। यह बच्चों के लिए ज्यादा सुरक्षित माध्यम है।
इन दिनों बच्चों के मानसिक और सामुदायिक विकास तथा उनमें कल्पना-शक्ति की उर्वरता में बाल कहानियों की महत्ता को देखते हुए यूरोपीय देशों में किस्सागोई की वाचिक परंपरा न सही, पाठ्य परंपरा को जीवित रखने के प्रयास हो रहे हैं।
योजनाबद्ध तरीके से बच्चों के लिए किताबें और कॉमिक्स लिखे और कम कीमत पर लोगों को उपलब्ध कराए जा रहे हैं।
बच्चों के मानसिक विकास के लिए काम कर रही इंग्लैंड की एक संस्था ने कुछ सालों पहले इस दिशा में एक अभिनव पहल की थी। पिछले कुछ सालों से यह बच्चों को सोचने और कहानियां लिखने को प्रेरित करने तथा उनमें कल्पनाशीलता के विकास के उद्देश्य से प्राइमरी स्कूल स्तर के बच्चों की एक देशव्यापी प्रतियोगिता आयोजित करती आ रही है।
इस प्रतियोगिता ने बच्चों के एक बड़े वर्ग को किस्सागोई के प्रति आकर्षित किया है। प्रतियोगिता के विजेता बच्चों की कहानियों की किताबें वहां का एक प्रमुख प्रकाशन संस्थान लिटिल टाइगर प्रकाशित करता है। इस संस्थान के प्रयासों से कई बच्चे लेखक के रूप में चर्चित और स्थापित भी हो चुके हैं।
कई दूसरे यूरोपीय देशों में भी बच्चों की मानसिक ज़रूरतों को पूरा करने के लिए बालकथा लेखकों की एक बड़ी जमात सक्रिय है। वहां की सरकारों और स्वयंसेवी संस्थाओं द्वारा ऐसे लेखकों को प्रोत्साहन दिया जाता है।
एशिया में बाल साहित्य पर सर्वाधिक ध्यान देने वाले देशों में जापान और चीन शामिल हैं। भारत में मौखिक कथा वाचन की सुदीर्घ परंपरा की वज़ह से बाल-साहित्य के लेखन पर ज्यादा ध्यान नहीं दिया गया। प्राचीन भारत में विष्णु शर्मा ने अपनी ‘पंचतंत्र’ नामक विश्वविख्यात पुस्ताक में पशु-पक्षियों की कहानियों को माध्यम बनाकर बच्चों को सांसारिक जीवन की सच्चाईयों से परिचित कराने का सफल प्रयास किया था।
इस पुस्तक की कथा कहने की शैली इतनी आकर्षक है कि आज इक्कीसवीं सदी में भी बच्चों में ‘पंचतंत्र’ की कथाओं के प्रति दिलचस्पी बनी हुई है। उसके बाद बीसवीं सदी के पूर्वार्द्ध तक तक बच्चों के लिए कोई सार्थक रचना सामने नहीं आई। बच्चों को कथाओं के माध्यम से शिक्षा देने और उनके चरित्र-निर्माण के उद्धेश्य से 1957 में ‘चिल्ड्रेन बुक ट्रस्ट’ की स्थापना इस दिशा में एक दूरदर्शी कदम था।
पिछले छह दशकों में इस ट्रस्ट ने बच्चों के लिए देश की सभी मुख्य भाषाओं में पौराणिक, ऐतिहासिक और वैज्ञानिक कथाओं की सैकड़ों पुस्तकों के अलावा पारिवारिक और सामाजिक मूल्यों पर आधारित उपन्यास, कहानी संग्रह, महान व्यक्तियों की प्रेरक जीवनियां, पशु-पक्षियों और पर्यावरण के विषय में जानकारी देने वाली बहुत सारी किताबें प्रकाशित की हैं।
ट्रस्ट द्वारा 1991 में शंकर आर्ट अकादमी की स्थाापना की गई जिसमें बच्चों से संबंधित पुस्तकों, चित्रों, कलाओं तथा ग्राफिक के कार्यक्रम चलाए जाते हैं। ट्रस्ट के कामों की सीमा यह है कि इसकी गतिविधियां देश के बड़े शहरों तक ही सीमित रही हैं। कस्बों और गांवों के बच्चों को इसका लाभ नहीं मिल सका है।
पत्र-पत्रिकाओं की छिटफुट कथाओं और कविताओं की बात छोड़ दें तो हिंदी में बाल साहित्य के लेखकों की संख्या भी नगण्य ही रही है। बच्चों के लिए जो कुछ अच्छी किताबें लिखी भी गई हैं, कारगर वितरण-व्यवस्था और पुस्तकालयों के अभाव में उनकी पहुंच ज्यादा बच्चों तक नहीं हो सकी है।
भारत में बच्चों की रुचियों और जरूरतों के अनुरूप कथा साहित्य और कविताएं रचने में किताबों से ज्यादा बड़ी भूमिका पत्रिकाओं और कॉमिक्स की रही है। अभी कुछ दशक पहले तक ‘चंदा मामा’ और ‘पराग’ जैसी बेहद लोकप्रिय पत्रिकाओं की पहुंच शहरों और गांवों के बच्चों में समान रूप से रही थी।
देश की कई पीढ़ियों के बचपन को प्रभावित करने वाली इन दो पत्रिकाओं के योगदान को भुलाया नहीं जा सकेगा। ये दोनों पत्रिकाएं बंद हो चुकी हैं। फिलहाल बच्चों के लिए हिंदी में ‘नंदन’, ‘चंपक’ ‘बाल हंस’, ‘बाल भारती’ और ‘नन्हें सम्राट’ जैसी कुछ पत्रिकाएं निकल तो रही हैं, लेकिन टीवी और मोबाइल ने इनसे पाठकों की बहुत बड़ी संख्या छीन ली हैं।
आज के समय में बच्चों के भीतर मौजूद एडवेंचर की इच्छा को उड़ान देने में कॉमिक्स की भूमिका ज्यादा महत्वपूर्ण रही है। देश में पिछले कुछ दशकों से कॉमिक्स की बाढ़-सी आई हुई है। इनमें ज्यादातर कॉमिक्स बाज़ार को ध्यान में रखकर लिखे जाते हैं। न वे स्तरीय नहीं होते हैं और न उनसे बच्चों को कोई सीख या प्रेरणा मिलती है।
हिंदी में सबसे लोकप्रिय और स्तरीय कॉमिक्स में ‘अमर चित्रकथा’ सीरीज के महाकाव्यों के पात्रों पर आधारित किताबें और ‘चाचा चौधरी’ के कारनामे रहे हैं।
मौखिक किस्सागोई की तेजी से टूटती परंपरा की वजह से दुनिया भर के बच्चों की तरह अपने देश में भी बच्चों के आगे एक बड़ा शून्य उपस्थित हुआ है।
इस शून्य को भरने की गंभीर और ईमानदार कोशिशें नहीं हो रही हैं। फलतः बच्चे टीवी, विडियो गेम और मोबाइल जैसे बीमार और अकेला कर देने वाले माध्यमों की ओर तेजी से बढ़े हैं। इन दृश्य माध्यमों के प्रति दीवानगी का एक दूसरा बुरा असर बच्चों की आंखों पर भी पड़ रहा है। इन दिनों छोटे-छोटे बच्चों को मोटे-मोटे शीशे वाले चश्मे पहने देखना एक त्रासद अनुभव है।
इन माध्यमों की अति से बच्चों को बचाने के लिए उन्हें किताबों की तरफ मोड़ने की आवश्यकता है। इसमें सबसे महत्वपूर्ण भूमिका बच्चों के मां-बाप और परिवार के सदस्यों की होगी। उन्हें बच्चों के सामने मोबाइल फोन और टेलीविज़न के इस्तेमाल से भरसक बचना भी होगा और उन्हें रंग-विरंगी किताबों और कॉमिक्स की ओर मोड़ने की जुगत भी करनी होगी।
वे खुद उदाहरण उपस्थित करेंगे तभी बच्चे उनका अनुकरण करेंगे। इस लक्ष्य की प्राप्ति में केंद्र और राज्य सरकारों तथा लेखकों के समन्वित प्रयासों की आवश्यकता है। निजी प्रकाशकों से ऐसी कोई कोई उम्मीद व्यर्थ है। चिल्ड्रेन बुक ट्रस्ट, नेशनल बुक ट्रस्ट और साहित्य अकादमी जैसी संस्थाओं को इस तरह मजबूत किए जाने की ज़रुरत है कि वे देश के स्तरीय लेखकों की टीम बनाकर बच्चों के लिए स्तरीय साहित्य की न सिर्फ रचना कराएं, बल्कि उन किताबों को सस्ते दामों तक गांवों और शहरों के स्कूलों, पुस्तकालयों और बुक स्टालों तक पहुंचा दें।
उत्कृष्ट बाल साहित्य के लिए सरकारों द्वारा केंद्र और प्रदेशों के स्तर पर आकर्षक पुरस्कारों की घोषणा भी एक अच्छा कदम होगा। इससे लेखकों और निजी प्रकाशकों की दिलचस्पी बाल साहित्य के लेखन और प्रकाशन में बढ़ेगी।
बच्चे अगर हमारी भावी सभ्यता और संस्कृति की बुनियाद हैं तो एक स्वस्थ समाज की रचना के लिए बुनियाद को ही मजबूत करने पर ही ध्यान देने की जरुरत है।
(स्रोत : ध्रुव गुप्त, ‘अमृत विचार’ की रविवारीय पत्रिका ‘लोक दर्पण’)





