शशिकांत गुप्ते
देश में जब भी चुनाव की घोषणा होती है। चाहे चुनाव पंचायत, स्वायत्त सस्थाओं के हो, विधानसभा के हो,या लोकसभा के चुनाव हो।
देश के हर शहर,नगर,गांव और गलियां, विभिन्न नारो, स्लोगन लिखें पोस्टर,बैनर,और रंगबिरंगी झंडों से सज जाती हैं।
सिर्फ चुनाव के समय देश का मतदाता आदरणीय हो जाता है।
चुनाव के समय मतदाताओं की पहचान भारतीय नहीं रहती है।
चुनाव से समय मतदाताओं की पहचान ना तो भारतीय रहती है और नाही समाजिक ही रहती है? जाति,उपजाति,अगड़े,पिछड़े,और भी विभिन्न पहचानों में बट जाती है।
राजनैतिक दल चुनाव के समय आमजन के मूलभूत समस्याओं को हल करने का सिर्फ आश्वासन देतें हैं,और गैरजरूरी मुद्दों पर ऊलजलूल बहस करतें हैं।
हम भारतवासियों में विशेष गुण है। हम सिर्फ विदेश में ही भारतीय हो जातें हैं। कारण यह हमारी मजबूरी है,विदेश में हमें अपनी पहचान भारतीय ही बतानी पड़ती है।
जब हम पडौसी देश नेपाल में भी तफरी करने जातें हैं,तब स्वयं ही फॉरेन रिटर्न होने के प्रमाण भी स्वयं ही अंगीकृत कर लेतें हैं।
भारत में मध्यमवर्गीय और निम्न मध्यमवर्गीय का आम दिनों में राजनीति से कोई लेना देना नहीं होता है। ये लोग प्रायः यही कहतें हैं कि, अपने को राजनीति से क्या करना? लेकिन जैसे चुनाव के दौरान, मतदान का दिन आता है, तब यही लोग कहतें हैं, हम तो शुरुआत से अमुक राजनैतिक दल को वोट देतें आएं हैं?
पिछले कुछ वर्षों से एक फैशन चल पड़ी है,साहित्य के नाम पर फूहड़पन, सिर्फ हँसी-ठिठौली करनेवाले,द्विअर्थी चुटुकुले सुनाने वालें, स्वयं को हास्यकवि कहलाने वाले लोग मंचो पर बाकयदा पारिश्रमिक लेकर राजनीति को कोसतें हैं। अपनी स्वयं को महिमामण्डित करतें हुए मंचो पर खड़े होकर,बहुत ही शान से कहतें हैं, दो कौड़ी की राजनीति के लिए मेरी करोड़ो की कविता क्यों खराब करू?
फूहड़ता,द्विअर्थी संवाद मसखरेपन की कीमत करोड़ो की होजाती है। और जो राजनीतिशास्त्र विश्वविद्यालय में पढ़ाया जाता है। जो राजनीति देश की नीति और निर्धारण का एक सशक्त मोर्चा है। वह मूल्यहीन हो जाती है।
ये लोग भी उसी साज़िश के शिकार हैं, जो यथास्थितिवादियों की साज़िश है। ये साज़िश रचने वालें नहीं चाहतें हैं,अच्छे लोग राजनीति में सक्रिय हो।
उक्त बिंदुओं पर गहराई से सोचने विचार करने पर सन 1958 में प्रदर्शित फ़िल्म तलाक़ के गीत की कुछ पंक्तियां प्रांसगिक लगती है। इस गीत को लिखा है प्रख्यात कवि एवं गीतकार स्व प्रदीप जी ने
इस गीत की पंक्तियां प्रासंगिक होते हुए जागरूक नागरिकों को आव्हान भी करती है
कहनी हैं इक बात हमें इस
देश के पहरेदारों से
संभाल के रहना अपने घर में
छिपे हुये गद्दारों से
झाँक रहे हैं अपने दुश्मन
अपनी ही दीवारों से
लुटे रहे हैं देश की दौलत
लोभी रिश्वतखोर यहाँ
नहीं चलेगा काम दोस्तों
केवल जय जय कारो से
सुनो समय की बोली को
फैलती जो फूट यहाँ पर
दूर करो उस टोली को
कभी ना जलाने देना फिर से
भेद भाव की होली को
जो गाँधी को चिर गयी थी
याद करो उस गोली को
आती हैं आवाज यही
मंदिर मसजिद गुरुद्वारों से
संभल के रहना अपने घर में
छिपे हुए गद्दारों से
लेखक का स्पष्टीकरण है उक्त गीत की पंक्तियांस्व. गीतकार प्रदीपजी ने लिखी है।
शशिकांत गुप्ते इंदौर





