इजराइल के मुख्यधारा का अखबार ‘Haaretz’ 7 अक्टूबर के हमले के अगले ही दिन 8 अक्टूबर अंक के अपनी संपादकीय में लिखता है कि ‘जो कुछ हुआ, उसकी मुख्य जिम्मेदारी ‘बेंजामिन नेतन्याहू’ की है क्योंकि उन्होंने फिलिस्तीनियों के अस्तित्व और उनके हकों को नजरंदाज किया.’ क्या ऐसी ही परिस्थिति में भारत का कोई मुख्यधारा का अखबार सरकार के बारे में ऐसा लिख सकता है ? यह लेख हारेत्ज़ का मुख्य संपादकीय है, जैसा कि इज़राइल में हिब्रू और अंग्रेजी समाचार पत्रों में प्रकाशित हुआ है. पढ़िए, पूरी संपादकीय का हिन्दी अनुवाद, जिसे हम अपने पाठकों के सामने प्रस्तुत कर रहे हैं – सम्पादक

सिमचट तोराह की छुट्टियों के दौरान इज़राइल पर जो आपदा आई, उसकी स्पष्ट ज़िम्मेदारी एक व्यक्ति की है – वह हैं बेंजामिन नेतन्याहू. प्रधानमंत्री, जिन्होंने सुरक्षा मामलों में अपने विशाल राजनीतिक अनुभव और अपूरणीय ज्ञान पर गर्व किया है, बेजेलेल स्मोट्रिच और इटमार बेन-गविर को नियुक्त करते समय, उन खतरों की पहचान करने में पूरी तरह से विफल रहे, जिनमें वे इजराइल को कब्जे और बेदखली की सरकार स्थापित करते समय सचेत रूप से नेतृत्व कर रहे थे. प्रमुख पदों पर रहते हुए एक ऐसी विदेश नीति को अपनाये जिसने खुले तौर पर फिलिस्तीनियों के अस्तित्व और अधिकारों की अनदेखी की.
नेतन्याहू निश्चित रूप से अपनी ज़िम्मेदारी से बचने की कोशिश करेंगे और सेना, सैन्य खुफिया और शिन बेट सुरक्षा सेवा के प्रमुखों पर दोष मढ़ेंगे, जिन्होंने योम किप्पुर युद्ध की पूर्व संध्या पर अपने पूर्ववर्तियों की तरह, अपनी तैयारियों के साथ युद्ध की कम संभावना देखी थी. हमास का हमला त्रुटिपूर्ण साबित हुआ. उन्होंने दुश्मन और उसकी आक्रामक सैन्य क्षमताओं का तिरस्कार किया. अगले दिनों और हफ्तों में, जब इज़राइल रक्षा बलों की गहराई और खुफिया विफलताएं सामने आएंगी, तो उन्हें बदलने और जायजा लेने की उचित मांग जरूर उठेगी.
हालांकि, सैन्य और खुफिया विफलता नेतन्याहू को संकट के लिए उनकी समग्र जिम्मेदारी से मुक्त नहीं करती है, क्योंकि वह इजरायली विदेश और सुरक्षा मामलों के अंतिम मध्यस्थ हैं. नेतन्याहू इस भूमिका में कोई नौसिखिया नहीं हैं, जैसे एहुद ओलमर्ट दूसरे लेबनान युद्ध में थे. न ही वह सैन्य मामलों में अज्ञानी है, जैसा कि 1973 में गोल्डा मेयर और 1982 में मेनाकेम बेगिन ने दावा किया था. नेतन्याहू ने नेफ्ताली बेनेट और यायर लैपिड के नेतृत्व वाली अल्पकालिक ‘परिवर्तन की सरकार’ द्वारा अपनाई गई नीति को भी आकार दिया: फिलिस्तीनी राष्ट्रीय आंदोलन को उसके दोनों पक्षों, गाजा और वेस्ट बैंक में, ऐसी कीमत पर कुचलने का एक बहुआयामी प्रयास इजरायली जनता के लिए स्वीकार्य प्रतीत होता है.
अतीत में, नेतन्याहू ने खुद को एक सतर्क नेता के रूप में प्रचारित किया, जो युद्धों और इज़राइल की ओर से कई हताहतों से बचता था. पिछले चुनाव में अपनी जीत के बाद, उन्होंने इस सावधानी को ‘पूरी तरह से सही सरकार’ की नीति से बदल दिया, जिसमें ओस्लो-परिभाषित क्षेत्र सी के कुछ हिस्सों हेब्रोन पहाड़ियां और जॉर्डन घाटी में जातीय सफाया करने के लिए वेस्ट बैंक को शामिल करने के लिए उठाए गए प्रत्यक्ष कदम शामिल थे.
इसमें बस्तियों का बड़े पैमाने पर विस्तार और अल-अक्सा मस्जिद के पास टेम्पल माउंट पर यहूदियों की उपस्थिति को बढ़ाना भी शामिल है, साथ ही सउदी के साथ एक आसन्न शांति समझौते का दावा भी शामिल है जिसमें फिलिस्तीनियों को कुछ भी नहीं मिलेगा, एक खुली बातचीत के साथ उनके सत्तारूढ़ गठबंधन में ‘दूसरा नकबा.’ जैसा कि अपेक्षित था, वेस्ट बैंक में शत्रुता फैलने के संकेत मिलने लगे, जहां फ़िलिस्तीनियों को इज़रायली कब्ज़ाधारी का भारी हाथ महसूस होने लगा. हमास ने शनिवार को अपना आश्चर्यजनक हमला शुरू करने के लिए मौके का फायदा उठाया.
सबसे बड़ी बात यह है कि हाल के वर्षों में इजराइल पर मंडरा रहे खतरे का पूरी तरह से एहसास हो गया है. भ्रष्टाचार के तीन मामलों में दोषी ठहराया गया एक प्रधानमंत्री राज्य के मामलों की देखभाल नहीं कर सकता है, क्योंकि राष्ट्रीय हित आवश्यक रूप से उसे संभावित सजा और जेल समय से निकालने के अधीन होंगे. इस भयानक गठबंधन की स्थापना और नेतन्याहू द्वारा किए गए न्यायिक तख्तापलट और शीर्ष सेना और खुफिया अधिकारियों को कमजोर करने का यही कारण था, जिन्हें राजनीतिक प्रतिद्वंद्वी माना जाता था. इसकी कीमत पश्चिमी नेगेव में आक्रमण के पीड़ितों द्वारा चुकाई गई थी.
इजरायल के खिलाफ फिलिस्तीनी जनता का शानदार प्रतिरोध
7 अक्टूबर की अहले सुबह फिलिस्तीन की जनता का प्रतिनिधित्व करने वाली क्रांतिकारी संगठन हमास की ओर से आतंकवादी देश इजरायल पर जल, थल और आकाश तीनों ओर से एक साथ हमला किया गया. इस हमले की शुरुआत ही महज 20 मिनट के अंदर 5 हजार मिसाइलों के हमले से हुआ और फिर अगले पांच मिनट में दो हजार और मिसाइलों को दाग दिया, जो पिछले 75 साल के इतिहास में पहली बार हुआ है.
अकस्मात इस हमले ने आतंकवादी देश इजरायल को समझने तक का मौका नहीं दिया और इसके साथ ही उसके सारे के सारे तकनीकों, ‘आयरन डोम’ और उसकी दादागिरी की हवा निकल गई. इसमें आतंकवादी देश इजरायल के सैनिकों समेत कुछ नागरिकों की भी जानें गयी और सैकड़ों को युद्ध बंदी बना लिया गया. इससे तिलमिलाया इजरायल अनाप-शनाप बड़बड़ाने लगा, जिसकी युद्ध के दौर में कोई अहमियत नहीं है.
पिछले 75 सालों से जिस फिलिस्तीनी जनता का खून यह आतंकवादी इजरायल पीता आ रहा है, और हर दिन उसकी जमीनों को छीन रहा है, उसके औरतों, बच्चों तक को मौत के घाट उतारता आ रहा है, तब उसकी परिणति ऐसी ही होनी थी. जैसी करणी, वैसी भरनी के तहत जब इजरायल ने अपने किये की सजा पाई तो, उसका बड़बड़ाना स्वभाविक ही है. लेकिन सवाल है कि अब यह आतंकवादी देश इजरायल क्या कर सकता है, जिसकी ढींगें यह हांक रहा है.
फिलिस्तीन की छाती पर बैठा इजराइल
29 नवंबर, 1947 को अमेरिकी साम्राज्यवाद ने प्रस्ताव 181 (जिसे विभाजन प्रस्ताव के रूप में भी जाना जाता है) के तहत ब्रिटिश शासन के अधीन फिलिस्तीन को यहूदी और अरब दो राज्यों में विभाजित करने का फैसला किया गया. इस प्रस्ताव के तहत, यरूशलेम को संयुक्त राष्ट्र के अंतरराष्ट्रीय नियंत्रण के अधीन रखने का फैसला किया. इसके अगले ही साल 14 मई, 1948 को यहूदी एजेंसी के प्रमुख डेविड बेन-गुरियन ने इजरायल राज्य की स्थापना की घोषणा की और अमेरिकी राष्ट्रपति हैरी एस. ट्रूमैन ने उसी दिन इस नए राष्ट्र को मान्यता दे दी.
इजरायल ने जैसे ही अपनी आजादी का ऐलान किया, इसके महज 24 घंटे के अंदर ही अरब देशों की संयुक्त सेनाओं ने उस पर हमला कर दिया. करीब एक साल तक चली इस लड़ाई में अरब देशों की सेनाओं की हार हुई. अंत में ब्रिटिश राज वाला ये पूरा हिस्सा तीन भागों में बंट गया. जिसे इजरायल, वेस्ट बैंक और गाजा पट्टी का नाम दिया गया. 7 सितम्बर को इसी गाजा पट्टी वाले छोटे से इलाके से फिलिस्तीनी जनता का मुक्ति संगठन ‘हमास’ ने इजरायल पर हमला किया है.
मुकेश असीम बताते हैं – ‘यहूदी इस जगह के मूल निवासी थे जिनसे यह भूमि छीन ली गई थी अतः उन्हें इजरायल में बसाया गया’, यह भी एकदम फर्जी दुष्प्रचार है. इजरायल बनाने वाले ये यहूदी वो काले भूरे गेहुआं रंग वाले नहीं हैं जो इस क्षेत्र के पुराने निवासी थे. उनकी और फिलिस्तिनियों की आपस में लडाई नहीं थी. वे इजरायल बनने के पहले भी फिलिस्तीन में ही रहते थे.
इजरायल बनाने के लिए ये गोरे यूरोपीय मूल के अश्केनाजी यहूदी भेजे गए थे. अभी इजरायल पर इन यूरोपीय मूल के यहूदियों का प्रभुत्व है और एशियाई या अफ्रीकी मूल के यहूदी इजरायल में भी गरीब व दोयम दर्जे की स्थिति में ही हैं. उनमें से अधिकांश आज वहां मजदूर वर्ग में शामिल हैं. इजरायल में पिछले सालों में जो अंतर्विरोध तीखा हो रहा है, उसकी वजह एक यह भी है.
यह बात सही है कि यूरोप में यहूदी कई सौ साल तक नस्ली नफरत व जुल्म का शिकार रहे, जिसका चरम नाजियों द्वारा कत्लेआम था. पर न्यायसंगत बात होती कि इन्हें इनके यूरोपीय आवास की जगहों पर ही जनवादी अधिकार व सुरक्षा हासिल होती. इसके बजाय पहले ब्रिटिश, बाद में अमरीकी साम्राज्यवाद ने इन्हें मदद व सुरक्षा का लोभ देकर पश्चिम एशिया में अपना भाडे का फौजी बनाकर बिठा दिया. इस काम में यहूदी कट्टरपंथी और पूंजीपतियों ने साम्राज्यवादियों की मदद की.
इजरायल और सऊदी अरब, ये दोनों देश ब्रिटिश साम्राज्यवाद ने लगभग एक ही समय हथियार, फौज और पैसा देकर बनाए और दोनों के ही शासकों ने इस क्षेत्र में आज तक पश्चिमी साम्राज्यवाद के एजेंट के तौर पर प्रतिक्रियावाद को मजबूत करने व अरब जनता की जनतांत्रिक आकांक्षाओं को कुचलने का ही काम किया है.
नृशंस क्रूरता का प्रतीक इजराइल
नाजी हिटलर की नृशंस क्रूरता का सर्वाधिक शिकार इन यहूदियों को बचाने के लिए तत्कालीन सोवियत संघ ने अपने लाल सेना के लाखों फौज की कुर्बानी दी और हिटलर को खदेड़कर उसके मांद में मार डाला. द्वितीय विश्वयुद्ध की समाप्ति के बाद बने यहूदियों का एकमात्र देश इजराइल अब उन्ही क्रूरताओं को फिलिस्तीन की जनता पर ढ़ाने लगा और हर दिन उनकी जमीनों को छीनकर उन्हें बेदखल करने लगा.
अल जजीरा की रिपोर्ट के मुताबिक, फिलिस्तीन पर ब्रिटिश शासन से पहले, यहूदी कुल जनसंख्या का लगभग 6 प्रतिशत थे. 1947 से 1950 तक, नकबा या ‘कैटास्ट्रोफ’ के दौरान, यहूदी सैन्य बलों ने कम से कम 7,50,000 फिलिस्तीनियों को निष्कासित कर दिया और ऐतिहासिक फिलिस्तीन के 78 प्रतिशत हिस्से पर कब्जा कर लिया. शेष 22 प्रतिशत को वेस्ट बैंक और गाजा पट्टी में विभाजित कर दिया.

1967 के युद्ध के दौरान, इजरायली सेना ने पूरे ऐतिहासिक फिलिस्तीन पर कब्जा कर लिया और 3,00,000 से अधिक फिलिस्तीनियों को उनके घरों से निकाल दिया. 2008 और 2021 के बीच, कम से कम 5,739 फिलिस्तीनी और 251 इजरायली मारे गए.
संयुक्त राष्ट्र के आंकड़ों के मुताबिक, इजरायल में एक मौत के मुकाबले फिलिस्तीन में 23 लोगों की मौतें हुई हैं. इस दौरान कम से कम 1,21,438 फिलिस्तीनी और 5,682 इजरायली घायल हुए हैं.
संयुक्त राष्ट्र के आंकड़ों के मुताबिक, फिलिस्तीनी गुट से मारे गए लोगों में से कम से कम 1,255 (22 प्रतिशत) बच्चे थे और 565 (10 प्रतिशत) महिलाएं थीं. इजरायल की ओर से मारे गए लोगों में से 121 (48 प्रतिशत) सुरक्षा बल थे.
फिलीस्तीन और इजराइल के इस युद्ध में अब तक हुई हत्या व घायल लोगों के आंकड़े है, जो UN के पास मौजूद है, इस प्रकार है –
वर्ष कुल हाताहत की संख्या
2008 फिलीस्तीन – 3,202 इजराइल – 853
2009 फिलीस्तीन – 7,460 इजराइल – 123
2010 फिलीस्तीन – 1,659 इजराइल – 185
2011 फिलीस्तीन – 2,260 इजराइल – 136
2012 फिलीस्तीन – 4,936 इजराइल – 578
2013 फिलीस्तीन – 4,031 इजराइल – 157
2014 फिलीस्तीन – 19,860 इजराइल – 2,796
2015 फिलीस्तीन – 14,813 इजराइल – 339
2016 फिलीस्तीन – 3,572 इजराइल – 222
2017 फिलीस्तीन – 8,526 इजराइल – 174
2018 फिलीस्तीन – 31,558 इजराइल – 130
2019 फिलीस्तीन – 15,628 इजराइल – 133
2020 फिलीस्तीन – 2,781 इजराइल – 61
वर्ष – 13 फिलिस्तीन-1,20,286; इजराइल-5,887
यहूदियों ने नाजियों से हाथ मिला लिया
जैसे-जैसे यहूदी फिलिस्तीन की छाती पर इजराइल नामक देश के रुप में मजबूत होता गया, वैसे-वैसे ही वह अमेरिकी पिट्ठू बनकर न केवल सोवियत संघ के खिलाफ होता गया और सोवियत संघ को खत्म करने के अभियान में भी शामिल हो गया बल्कि आज यूक्रेनी यहूदी जेलेंसकी रुस को ही मिटाने पर तुल गया है. इसके लिए वह 20 महीनों से लगातार अमेरिका और उसके गुंडों के इशारे पर रुस के खिलाफ युद्ध लड़ रहा है.
इतना ही नहीं, ये यहूदी इतने एहसान फरामोश निकले कि हालिया दिनों में जब कनाडा के संसद में 98 वर्षीय एक नाजी को सम्मानित किया जा रहा था, तब यह यहूदी जेलेंसकी तालियां बजा रहा था. इन्हें इस पर भी लज्जा तक नहीं आई कि उनके ही पूर्वजों पर यह नाजी कितनी क्रूरता ढ़ाते थे.
क्या है फिलिस्तीन मुक्ति युद्ध में जीत की संभावना
7 अक्टूबर को आतंकवादी देश इजराइल पर हुए हमले से अकबकाये इजराइल और अमेरिका मदहोशी में एक से बढ़कर एक दावे कर रहे हैं. मसलन, शाम तक हमास को मसल देंगे, आर पार की लड़ाई होगी, बड़े अंजाम भुगतने होंगे आदि-इत्यादि. लेकिन यह आतताई इस बात को भूल जाते हैं कि 7 अक्टूबर को शुरु हुई फिलिस्तीनी जनता की यह मुक्ति युद्ध पहले की तमाम लड़ाई से बुनियादी तौर पर भिन्न है. इसे इस तरह समझते हैं –
- जितनी सुनियोजित और गोपनीयता और तेज गति से तीनों सेनाओं (जल, थल, आकाश) द्वारा एक साथ हमला किया गया है, वह सख्त ट्रेनिंग और बेहद ही विकसित सैन्य कमांड में ही संभव है. यानी इस फिलिस्तीन मुक्ति युद्ध को उच्चकोटि का सैन्य कमांड ने संचालित किया है. ईरान का नाम तो पहले ही दिन से सामने आ गया था.
- इस युद्ध में फिलिस्तीन की जनता की सेनाओं ने अपने तमाम संसाधनों का बेजोड़ इस्तेमाल किया. यहां तक कि बुलडोजर जैसे असैन्य मशीन का भी सैन्य इस्तेमाल किया.
- तीन दिन तक लगातार चल रहे इस युद्ध के बाद भी लगातार आतंकवादी इजरायली ‘सेना’ पर हमले हो रहे हैं. इजराइल के अंदर जाकर इजरायली सैन्य बेस पर फिलिस्तीनी हमास का कब्जा बरकरार है. जो उच्चतम सैन्य कमांड के तहत प्रशिक्षण को दर्शाता है. साथ ही यह सैन्य अभियान दीर्घकालीन गुरिल्ला युद्ध की ओर इशारा कर रहा है.
- बौखलाया अमेरिका संयुक्त राष्ट्र संघ की आपात बैठक में फिलिस्तीन के खिलाफ कोई संयुक्त बयान तक जारी नहीं कर पाया है. चीन, रुह ने सीधे सवाल उठा दिया है और साफ कहा है कि अगर इस हमले का विरोध किया जाता है तो रुस के खिलाफ चल रहे युद्ध पर भी बयान जारी करना होगा.
- फिलिस्तीन की 23 लाख की आबादी का नरसंहार एकबारगी आतंकवादी इजराइल चाहकर भी नहीं कर सकता. परमाणु बम का इस्तेमाल भी यहूदी इजराइल नहीं कर सकता.
- इजराइल के खिलाफ लेबनान समेत अन्य खाड़ी देशों की ओर से भी हमला कर दिया गया है और हजारों लड़ाके योद्धा गाजा पट्टी पहुंच चुके हैं और युद्ध में उतर गए हैं. हजारों प्रदर्शनकारियों ने इजराइल के खिलाफ सड़कों पर नारें लगा रहे हैं.
- किंकर्तव्यविमूढ़ अमेरिका एक साथ दो खुल चुके मोर्चे (युक्रेन और इजराइल) में एक साथ लड़ना उसके बूते से बाहर की चीज बन गई है. अभी तो उसने बकायदा घोषणा भी कर दिया है कि इजराइल में अमेरिकी सेना नहीं आयेगी.
- हमास ने सैकडों इजरायली को बंधक बना रखा है, जिससे वह मोलभाव की स्थिति में है.
- और सबसे बढ़कर फिलिस्तीन के पीछे दुनिया का सबसे मजबूत चट्टान रुस का मौजूद होना, यह रेखांकित करता है कि फिलिस्तीन की यह मुक्ति युद्ध जीत हासिल जरूर करेगा.
अमेरिका का खून निचोड़ लेगा फिलिस्तीन मुक्ति युद्ध
अमेरिका का मनपसंद खेल युद्ध है और उसकी अर्थव्यवस्था का भी बड़ा आधार. अब यही युद्ध उसका सारा खून निचोड़ लेगा. अमेरिका का इतिहास है कि वह आज तक दुनिया के किसी भी देश के साथ युद्ध में मूंह की खाई है. चाहे कुख्यात कोरियन युद्ध हो या वियतनाम, लाओस, कम्बोडिया, अफगानिस्तान का युद्ध हो, सदैव भारी मौतों के बाद भाग खड़ा हुआ है. इसमें इराक युद्ध को अपवाद माना जा सकता है.
अपनी इसी कोशिश में उसने यूक्रेन को उकसाकर रुस के खिलाफ लड़वा दिया, जो आज 20 महीनों से जारी है. इस युद्ध में अमेरिका ने 20 लाख करोड़ रुपये से ज्यादा का खर्च कर दिया है, जो अभी जारी है. विदित हो कि यह भारी रकम भारत के एक साल के बजट के आधे से ज्यादा है. बेशक इस युद्ध में अमेरिका सामने नहीं है, लेकिन सारा सैन्य संचालन, हथियारों की आपूर्ति अमेरिका और नाटो कर रहा है.
ऐसे में अब जब फिलिस्तीन मुक्ति युद्ध का एक और फ्रंट खुल गया है तब अब रुस को भी यह नैतिक अधिकार ही नहीं बल्कि जिम्मेदारी भी है कि वह इस फिलिस्तीन मुक्ति युद्ध को हर संभव सहायता दें. हलांकि रुस के पूर्व राष्ट्रपति दिमित्री मेदेयेव भी स्पष्ट कहा भी है कि –
‘अमेरिका और उसके सहयोगियों को जहां ध्यान देना चाहिए, वहां उसने ऐसा किया नहीं. इजरायल और फिलिस्तीन के बीच टकराव दशकों से चल रहा है और अमेरिका की इसमें एक बड़ी भूमिका है. लेकिन फिलिस्तीन-इजरायल विवाद को सुलझाने के बजाय उन बेवकूफों ने हमारे साथ हस्तक्षेप किया और नियो-नाजियों को पूरी सहायता दे रहा है. अमेरिका ने दो बेहद ही करीबी लोगों को एक-दूसरे के खिलाफ खड़ा कर दिया है. पूरी दुनिया में उन्माद भड़काने के अमेरिकी जूनून को क्या कोई रोक सकता है. ऐसा लगता है कि यह अमेरिका में गृहयुद्व से कुछ कम नहीं है.’
अमेरिका ने नाजियों का जिस तरह पक्षपोषण पहले किया था, आज वह यह गलती फिर दुहरा रहा है. अमेरिका को इससे बाज आना चाहिए.
भारत की स्थिति
भारत का सत्तारुढ़ वर्तमान शासक नरेन्द्र मोदी पागल हो गया है. इस बेवकूफ संघी नरेन्द्र मोदी ने भारत की फिलिस्तीन समर्थक विदेश नीति को अमेरिका के इशारे पर इजराइल समर्थक विदेश नीति अपना लिया है. भारत सदैव उत्पीड़ित राष्ट्रीयता के समर्थन में रहा है लेकिन मोदी ने भारत की विदेश नीति को 180 डिग्री पर मोड़ कर उत्पीड़क राष्ट्रीयता का समर्थक बना दिया है. ऐसे में मोदी का इजराइल के समर्थन में बयान देना न केवल घृणास्पद है बल्कि दुनिया से अलग-थलग कर देने वाला भी है.
संघ के ही पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने 1977 के अपने एक भाषण में फिलिस्तीन का पक्ष लेते हुए साफ तौर पर कहा था कि ‘अरबों की जिस जमीन पर इजराइल कब्जा करके बैठा है, वो जमीन उसको खाली करना होगी.’ वे आगे कहते हैं – ‘आक्रमणकारी, आक्रमण के फलों का उपभोग करे, ये हमें अपने संबंध में स्वीकार नहीं है. तो जो नियम हम पर लागू है, वो औरों पर भी लागू होगा. अरबों की जमीन खाली होना चाहिए. जो फिलिस्तीन है और जो फिलिस्तीनी हैं, उनके उचित अधिकारों की प्रस्थापना होना चाहिए. इजरायल के अस्तित्व को सोवियत रूस, अमेरिका ने भी स्वीकार किया है. हम भी स्वीकार कर चुके हैं.’
ऐसे में कांग्रेस ने भारत की ऐतिहासिक जिम्मेदारी को निभाते हुए फिलिस्तीन की मुक्ति युद्ध के समर्थन में खड़े हुए हैं, जो भारत की गरिमा के अनुकूल भी है. कांग्रेस ने फिलिस्तीन का समर्थन करते हुए कहा है कि वह बीते लंबे समय से फिलिस्तीनी लोगों के लिए उनकी जमीन और अधिकारों की पक्षधर है और सभी को गर्व से जीने का अधिकार है. इसलिए कांग्रेस ने अविलम्ब इजरायल की सेना और हमास के बीच सीजफायर की मांग की है.
सामाजिक कार्यकर्ता विजय सिंह फिलिस्तीन का समर्थन करते हुए लिखते हैं – ‘ये युद्ध सिर्फ और सिर्फ फिलिस्तीन की आजादी के साथ ही खत्म होगा. नहीं तो कुछ दिनों के बाद, कुछ महीनों या सालों के बाद फिर ये तूफान उठेगा, चाहे हमास रहे ना रहे इससे कोई फर्क़ नहीं पड़ता. फ़िलीस्तीन की आजादी के लिए फ़िलीस्तीन की जनता पहले भी संघर्ष करती आयी है आगे भी उठ खड़ी होती रहेगी.’ लेकिन इस बात की संभावना है कि फिलिस्तीन का यह मुक्ति युद्ध अवश्य विजयी होगा.





