आजादी के बाद यह पहला अवसर है जब देश की सबसे पुरानी पार्टी का कोई बड़ा नेता इतनी बड़ी यात्रा कर रहा है। पांच माह तक चलने वाली इस यात्रा से क्या नफा-नुकसान होगा यह तो समय ही तय करेगा। लेकिन इतना तय है कि राहुल की यह यात्रा उन्हें राजनीति को नए सिरे से समझने का अवसर जरूर देगी।
दिल्ली के लुटियंस इलाके के राजनीतिक गलियारों से बाहर निकलकर देश को समझने का कांग्रेस नेता राहुल गांधी का अभियान शुरू हो ही गया। ‘भारत जोड़ो यात्रा’ के तहत दक्षिण में देश का आखिरी छोर समझे जाने वाले कन्याकुमारी से चलकर राहुल कश्मीर तक का सफर पैदल तय करेंगे। आजादी के बाद यह पहला अवसर है जब देश की सबसे पुरानी पार्टी का कोई बड़ा नेता इतनी बड़ी यात्रा कर रहा है। पांच माह तक चलने वाली इस यात्रा से क्या नफा-नुकसान होगा यह तो समय ही तय करेगा। लेकिन इतना तय है कि राहुल की यह यात्रा उन्हें राजनीति को नए सिरे से समझने का अवसर जरूर देगी। देश के अलग-अलग राजनीतिक दलों से जुड़े नेताओं ने पहलेे भी पद यात्राएं और रथयात्राएं निकाली हैं। इनके परिणाम भी निकलते दिखे हैं।

राहुल गांधी, राजस्थान के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत के साथ
कांग्रेस पार्टी इसे स्वीकार करे या नहीं लेकिन सच्चाई यही है कि पार्टी इस समय अपने सबसे कठिन दौर से गुजर रही है। सवाल सिर्फ चुनावी हार-जीत का ही नहीं है। इससे भी बड़ा सवाल ये है कि आज के दौर में बड़े-बड़े नेताओं में कांग्रेस से किनारा करने की होड़ मची है। बीते आठ साल में आठ से अधिक पूर्व मुख्यमंत्री ‘हाथ’ का साथ छोड़ चुके हैं। कुछ और बड़े नेताओं के बयानों को समझने की कोशिश की जाए तो वे भी पार्टी नेतृत्व की कार्यशैली से खुश नजर नहीं आते। ऐेसे में कांग्रेस को नई चुनौतियों का सामना करने के लिए अपने आपको तैयार करने की जरूरत आ पड़ी है। पिछले दो लोकसभा चुनावों में कांग्रेस की करारी पराजय क्यों हुई है? पार्टी के दिग्गज नया रास्ता चुनने को विवश क्यों हो रहे हैं? भाजपा का मुकाबला करने के लिए कांग्रेस की तैयारी कैसी हो? जाहिर है कि राहुल को अपनी पदयात्रा के सहारे इन सवालों का हल खोजने में मदद मिलेगी। राजनीति में जीत और हार के मायने होते हैं। चुनावी जीत से राजनीतिक दल का कद भी बढ़ता है और जीत दिलाने वाले नेता का भी। हारने वाले दल और उसके नेता पर सवालिया निशान खड़े होना स्वाभाविक है। जीत-हार को अलग रख दिया जाए तो यह मानने में कोई संकोच नहीं कि कांग्रेस पार्टी इस देश की जरूरत है। लोकतंत्र में जितना जरूरी मजबूत सत्ता पक्ष माना जाता है उतना ही आवश्यक विपक्ष का मजबूत होना भी है। भाजपा और कांग्रेस के अलावा अन्य किसी दल की पहचान राष्ट्रीय स्तर की नहीं है। अधिकांश दलों का प्रभाव एक या दो राज्यों तक सीमित है।
ऐसे में राहुल गांधी की पांच महीने की पदयात्रा कई मायनों में काफी अहमियत रखने वाली है। कांग्रेस के लिए भी, देश की राजनीति के लिए भी और विपक्ष के लिए भी।





