-डॉ. जयराम सूर्यवंशी
हिन्दी-पंजाबी के महत्वपूर्ण लेखक, मशहूर फिल्मी अभिनेता तथा इप्टा के माध्यम से सामाजिक-सांस्कृतिक कार्य करने वाले प्रतिबद्ध रंगकर्मी बलराज साहनी का साहित्य, समाज और फिल्मी दुनिया में असामान्य योगदान रहा है।
अपने स्तरीय और हृदयस्पर्शी अभिनय से ‘दो बीघा जमीन’, ‘धरती के लाल’, ‘काबुलीवाला’, ‘गर्म हवा’ जैसी डेढ़ सौ के करीब फिल्मों में अभिनय करने वाले एक सफल फिल्मी अभिनेता के साथ-साथ ‘बसंत क्या कहेगा ?’ जैसा कहानी संग्रह, ‘मेरा रूसी सफरनामा’ तथा ‘पाकिस्तान का सफर’ जैसे यात्रा वर्णन और ‘बलराज साहनी पर बलराज साहनी’ यह आत्मकथा लिखकर उन्होंने अपने साहित्यकार व्यक्तित्व का भी परिचय दिया है।
इसके अलावा बीबीसी लंदन पर अनाउंसर के रूप में उनका कार्य और इप्टा के महासचिव के रूप में जन आंदोलन में उनकी भूमिका निस्संदेह उनके व्यक्तित्व को ऊॅंचाई दर्शाने वाली है।
ऐसे बहुमुखी प्रतिभा संपन्न जनकलाकार के व्यक्तित्व और कृतित्व को सम्पूर्णता से पाठकों तक पहुॅंचाने की दृष्टि से ‘बलराज साहनी एक समर्पित और सृजनात्मक जीवन’ शीर्षक से आलोचक, लेखक—पत्रकार जाहिद खान ने एक महत्त्वपूर्ण किताब का सम्पादन किया है। किताब ‘गार्गी प्रकाशन’ से प्रकाशित है।
जाहिद खान पिछले कई वर्षों से प्रगतिशील आंदोलन से जुड़े साहित्यकारों, रंगकर्मियों पर लगातार लिख रहे हैं। प्रगतिशील आंदोलन को लेकर लिखी उनकी किताबें, ‘तरक्कीपसंद तहरीक के हमसफर’ और ‘तरक्कीपसंद तहरीक की रहगुजर’ प्रगतिशील साहित्य को समझने की दृष्टि से बेहद महत्वपूर्ण है। इसके अलावा उन्होंने फिल्मी गीतकार शैलेन्द्र, उर्दू के मशहूर कथाकार कृश्न चन्दर, शायर मजाज लखनवी, मखदूम मोहिउद्दीन जैसे रचनाकारों पर गम्भीर और महत्वपूर्ण काम किया है। इसी क्रम में बलराज साहनी पर केन्द्रित इस किताब को देखा जा सकता है।
लगभग 200 पृष्ठों की प्रस्तुत किताब में सम्पादक जाहिद खान ने अपनी विस्तृत भूमिका के साथ-साथ बलराज साहनी को करीब से जानने वाले, उनके साथ फिल्मी दुनिया तथा सामाजिक-राजनीतिक क्षेत्र में काम करने वाले कई महत्वपूर्ण व्यक्तियों के लेख शामिल किए हैं।
जिसमें स्वतंत्रता संग्राम सेनानी और भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के पूर्व महासचिव पी.सी जोशी, मशहूर उर्दू कथाकार ख्वाजा अहमद अब्बास, पंजाबी भाषा के बड़े साहित्यकार जसवंत सिंह कॅंवल के साथ-साथ बलराज साहनी के पुत्र परीक्षित साहनी के लेख हैं।
इसके अलावा ‘मेरा जीवन दृष्टिकोण’, ‘इप्टा की यादें’, ‘मेरा सबसे पहला क्लोज-अप’, ‘मैंने दो बीघा जमीन में काम किया’ जैसे महत्वपूर्ण लेखों के द्वारा पाठकों को बलराज साहनी की वैचारिक भूमिका, आजादी के आंदोलन में उनका योगदान, फिल्मी अभिनेता के रूप में उनका संघर्षपूर्ण सफर तथा एक रंगकर्मी के रूप में उनके विचारों को समझने का मौका मिलता है। बलराज साहनी को सम्पूर्णता से समझने की दृष्टि से यह एक महत्वपूर्ण रचना है।
1 मई, 1913 को पंजाब के एक रूढ़िवादी आर्य समाजी परिवार में बलराज साहनी का जन्म हुआ। लाहौर के गवर्नमेंट कॉलेज से उन्होंने अपनी उच्च शिक्षा ग्रहण करते हुए अंग्रेजी में एमए किया। महाविद्यालयीन जीवन में ही वे रंगमंच से जुड़ गए। 1931 में जब क्रांतिकारी भगतसिंह को फॉंसी हुई, तो उन्होंने इस विषय पर एक संवेदनशील कविता लिखकर अपनी जन प्रतिबद्धता का परिचय दिया।
आगे चलकर बलराज साहनी रवींद्रनाथ टैगोर द्वारा स्थापित ‘शांतिनिकेतन’ चले गए। जहॉं उन्हें हजारीप्रसाद द्विवेदी जैसे हिन्दी के महान साहित्यकार से मिलने का अवसर मिला। इसके अलावा उनके व्यक्तित्व निर्माण में महात्मा गॉंधी की कर्मभूमि ‘सेवाग्राम’ का भी महत्वपूर्ण योगदान है। सेवाग्राम में उन्होंने ‘नई तालीम’ के सहायक सम्पादक की जिम्मेदारी संभाली।
कहा जाता है कि उन्होंने शांतिनिकेतन से मानवता और सेवाग्राम से देशभक्ति आत्मसात की। सेवाग्राम से ही उन्हें बीबीसी लंदन में अनाउंसर के रूप में नौकरी के लिए आमंत्रित किया गया। वहॉं रहकर उन्होंने कई महत्वपूर्ण किताबों का अध्ययन किया, तथा मार्क्सवाद के प्रति आकर्षित हुए।
देशभक्ति और राष्ट्र प्रेम की भावना लेकर वे लंदन से वापस भारत लौटे और उन्होंने ‘इप्टा’ जैसे साहित्यिक-सांस्कृतिक संगठन में पूर्णकालिक अवैतनिक कार्यकर्ता के तौर पर महत्वपूर्ण काम किया। इसी समय फिल्मी दुनिया में भी अभिनेता के रूप में महत्वपूर्ण योगदान दिया।
बलराज साहनी की इस प्रेरणादाई जीवनयात्रा को प्रस्तुत किताब के माध्यम से बड़ी गहराई से समझा जा सकता है। सम्पादक जाहिद खान ने किताब की विस्तृत भूमिका में बलराज साहनी की समग्र जीवनयात्रा तथा उनके योगदान पर विस्तृत चर्चा की है। ‘बलराज साहनी की पारखी नजर’ शीर्षक लेख में वे बताते हैं कि लोकशाहीर अण्णाभाऊ साठे, द.ना.गव्हाणकर, अमर शेख के अलावा हास्य कलाकार जॉनी वॉकर बलराज साहनी की खोज थे।
भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के महासचिव पी.सी. जोशी और बलराज साहनी का लगभग चालीस साल का रिश्ता रहा। इस बीच समय—समय पर पीसी जोशी ने बलराज साहनी का मार्गदर्शन किया, तो उनके मार्गदर्शन मे बलराज साहनी की भूमिका रही। पीसी जोशी का लेख ‘बलराज साहनी एक समर्पित और सृजनात्मक जीवन’ स्तरीय और महत्त्वपूर्ण लेख है।
लगभग चालीस पृष्ठों का यह दीर्घ लेख बलराज साहनी और पीसी जोशी के पारिवारिक-आत्मीय रिश्ते, साथ ही पार्टी मे काम करते समय हुए विभिन्न अनुभवों पर गहन चिंतन करने वाला लेख है। पीसी जोशी बलराज साहनी के व्यक्तित्व पर टिप्पणी करते हुए उन्हे ‘जनता से जुड़ा लेखक’ कहते हैं।
उनकी दृष्टि से ”बलराज साहनी का रचनात्मक कार्य जनता के बीच बेहद लोकप्रिय हुआ। बलराज उस शौर्यपूर्ण व स्वस्थ धारा से थे, जिन्होंने उत्तम बीजारोपण किया था और अपने जीवन में ही इसकी फसल को बढते हुए देखने का आनंद भी लिया था।”
इसके अलावा पीसी जोशी अपने लेख में यह भी बताते हैं कि बलराज साहनी ने बंगाल के अकाल में अकालग्रस्त लोगों की मदद के लिए किस तन्मयता से काम किया।
ख्वाजा अहमद अब्बास बलराज साहनी को जनकलाकार मानते हैं। उनकी दृष्टि से वे जुलूस, जनसभा, ट्रेड यूनियन की गतिविधियों में शामिल होकर काम करने वाले सच्चे नायक थे। उनके लेख का शीर्षक है ‘जनकलाकार थे बलराज साहनी’।
इस लेख के माध्यम से बलराज साहनी के फिल्मी सफर पर चर्चा करते हुए अब्बास बताते हैं कि किस प्रकार अपने अभिनय के प्रति प्रतिबद्धता के कारण ‘दो बीघा जमीन’ में गरीब किसान की भूमिका करते समय उन्होंने खुद को किसान के रूप में बदला था।
यही नहीं फिल्म ‘काबुलीवाला’ में पठान की भूमिका के लिए उन्होंने जो मेहनत की इस पर भी वे चर्चा करते हैं। साम्प्रदायिक सद्भावना के समर्थक बलराज साहनी ने भिवंडी मे हुए साम्प्रदायिक दंगो में अपनी – जान की बाजी लगाते हुए मुस्लिम मुहल्ले में दो सप्ताह मुसलमानों के साथ रुककर, उन्हें धर्मनिरपेक्षता का भरोसा दिलाया था। ख्वाजा अहमद अब्बास ने अपने लेख में यह विस्तार से लिखा है।
बलराज साहनी के पुत्र परीक्षित साहनी का आपने पिता पर लिखा हुआ लेख ‘मार्क्सवादी होने के नाते वे बस एक लाल झंडा चाहते थे’ निश्चित रूप से असामान्य लेख है। प्रस्तुत लेख में परीक्षित साहनी अपने पिता की जीवन यात्रा, जीवन संघर्ष के साथ—साथ अभिनेता के रूप में उनके सफर पर चर्चा करते हैं।
उनकी मॉं दमयंती साहनी ने किस तरह संघर्ष किया, बलराज साहनी को उन्होंने कितना सहयोग दिया, पत्नी दमयंती के निधन के बाद बलराज साहनी किस तरह टूट चुके थे? इस पर परीक्षित ने बड़ी संवेदनशील चर्चा की है।
बलराज साहनी की मार्क्सवादी विचारधारा से प्रतिबद्धता को उजागर करते हुए परीक्षित साहनी लिखते हैं, ”पिताजी की इच्छा थी कि उनके पार्थिव शरीर पर कोई फूल न रखा जाए, न ही पंडितों को बुलाया जाए या श्लोकों का पाठ किया जाए। मार्क्सवादी होने के नाते वे बस एक लाल झंडा रखना चाहते थे।”
इससे स्पष्ट होता है कि आजीवन मार्क्सवादी विचारधारा के लिए समर्पित यह व्यक्ति मृत्यु के बाद भी मार्क्सवाद से दूर नहीं जाना चाहता था।
किताब के कुछ लेख बलराज साहनी के अपने लेखन पर केन्द्रित हैं। बलराज साहनी ने कहानियॉं, यात्रा वर्णन के साथ—साथ आत्मकथा भी लिखी है। इन रचनाओं के आधार पर कुछ लेख किताब मे शामिल किए गये हैं। इन लेखों से बलराज साहनी की अपनी भूमिका स्पष्ट होती है। बलराज साहनी आजीवन नास्तिक रहे। धर्म के व्यापारिक संस्था बन जाने का उन्होंने हमेशा विरोध किया। स्त्री-पुरुष समानता की उन्होंने बात की।
‘इप्टा की यादें’ लेख में बलराज साहनी एक रंगकर्मी की भूमिका क्या होनी चाहिए, भाषा पर उसे किस तरह काम करना चाहिए ? इसके संदर्भ में अत्यंत मौलिक चर्चा करते हैं।
साल 1972 में जेएनयू विश्वविद्यालय के दीक्षांत समारोह में बलराज साहनी ने मुख्य अतिथि के तौर पर जो व्याख्यान दिया था, वह भी किताब में है।
इस व्याख्यान में बलराज साहनी देश की आजादी में गॉंधी, नेहरू और पी.सी. जोशी जैसे तत्कालीन नेताओं के योगदान पर चर्चा करते हैं। आजादी का महत्व रेखांकित करते हुए वे कई महत्वपूर्ण बातों पर चर्चा करते हैं।
हिन्दी-उर्दू को लेकर देश में आज भी विवाद जारी है। हिन्दी, उर्दू को आधार बनाकर, आज दो धर्मों के बीच विभाजन की कोशिश की जा रही है। बलराज साहनी ने अपने इसी व्याख्यान में जो बातें बताई थीं, वह आज भी प्रासंगिक प्रतीत होती है।
उनकी दृष्टि से हिन्दी-उर्दू भले ही दो लिपियों मे लिखी जाती हों, लेकिन वह हिन्दुस्तानी भाषा हैं। इस संदर्भ में वे अपने भाषण में कहते हैं, ”मेरी मातृभाषा पंजाबी के लिए दो लिपियॉं कबूल की गई है। हिन्दुस्तान मे गुरुमुखी और पाकिस्तान मे फारसी। दो लिपि में लिखी जाने पर भी वह भाषा तो एक रहती है पंजाबी, तो दो लिपियों के कारण हिन्दी और उर्दू अलग-अलग भाषा कैसे हो गईं।”
इस तरह से बलराज साहनी के विचार और उनके चिंतन पर प्रस्तुत खंड मे बड़ी महत्त्वपूर्ण चर्चा पाठकों को पढ़ने को मिलती है।
प्रस्तुत किताब के बहाने सम्पादक जाहिद खान ने बलराज साहनी जैसे जनप्रतिबद्ध अभिनेता के जीवन और उनके लेखन-चिंतन को सम्पूर्णता से पाठकों के सम्मुख रखा है। इसके लिए निस्संदेह उन्होंने बड़ी मेहनत की है। दूसरी भाषाओं के कुछ महत्वपूर्ण लेख उन भाषा के विद्वानों से अनूदित करवाने के अलावा बलराज साहनी से जुड़ी दुर्लभ सामग्री भी पाठकों के लिए उपलब्ध करवाई है।
किताब : बलराज साहनी एक समर्पित और सृजनात्मक जीवन, सम्पादक : जाहिद खान,
प्रकाशन : गार्गी प्रकाशन नई दिल्ली, पृष्ठ संख्या : 208, मूल्य : 240

