हिम्मत सेठ द्वारा लिखी महत्वपूर्ण पुस्तक
मंजु चतुर्वेदी, उदयपुर
महावीर समता संदेश अखबार के प्रधान संपादक और प्रकाशक हिम्मत सेठ का नाम पत्रकारिता यो क्षेत्र में एक जाना पहचाना नाम है। पे प्रिंट मीलिया के अनेक नामी पुरस्कार से सम्मानित है। विभिन्न पत्र पत्रिकाओं में अपने निर्भीक लेखन से अलग पहचान बनाने वाले हिम्मत सेठ को इसलिए भी जाना जाता है कि उनकी अब तक समाज और संस्कृति पर कटाक्ष करती और सामयिक मुद्दों को प्रकाश में लाती अनेक पुस्तके प्रकाशित हो चुकी है।
इन पुस्तकों में शतायु लोहिया, आधी आबादी के सवाल, समता संवाद लेखन व प्रकाशन, काक दृष्टि कॉलम संकलन, सब का सामना, समाजवाद के सारथी जैसी निर्भीक अभिव्यक्ति की पुस्तकें प्रमुखता से पढ़ी गयी। इनकी विस्तृत समीक्षा और, चर्चा हुई। इन पुस्तकों ने समाजवादी चिंतन को आगे बढ़ाने का उल्लेखनीय कार्य किया।
इसी क्रम में राजस्थान में समाजवादी आन्दोलन ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य-2 पुस्तक समाजवाद के प्रकल्प को पूरी सच्चाई और ईमानदारी से विश्लेषित करती है।
बरानवें पृष्ठों राचित्र पुस्तक में चौदह लेख है जो महावीर समता संदेश में प्रकाशित हुए थे। बढ़ी बात यह है कि ये सभी लेखा तब भी महत्त्वपूर्ण थे और आज भी प्रासंगिक हैं।
यह पुस्तक उन विचारकों और कार्यकर्ताओं के बारे में हैं जिन्होंने स्वान्त रुसुखाय काम नहीं किए। इस पुस्तक के लेख किसी कल्पना के आधार पर, किसी समुद्र किनारे या पुस्तकालय में बैठ कर नहीं लियों गये है। इनमें अनुभवों का निचोड़ है, यह संघर्ष की आंच में तप कर, जीवन की बाधाओं को झेलते हुए लिखे गए हैं।
पुस्तक के सबंध में वरिष्ठ राहित्यकार दिनेश माली लिखते हैं कि हिम्मत सेठ द्वारा संपादित उनकी अद्यतन पुरुक्क में उन्होंने राजस्थान की प्रख्यात समाजवादी विभूतियों जैसे नंद चतुर्वेदी पूर्व विधायक व स्वतंत्रता सेनानी नरेंद्र पाल सिंह स्वतंत्रता सेनानी हीरालाल जैन राजेंद्र पाल सिंह हबीब बानो लहसीन भीलों के गांधी और स्वतंत्रता सेनानी मामा बालेश्वर दयाल, परसराम त्रिवेदी और शांत त्रिवेदी आदि के जीवन प्रसंगों को संकलित किया है।
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आंदोलन में राजस्थान का अवदान उसके विचार और कार्यों को बहुत ही करीब से देख कर समझ कर लियाने फा रहा है।
एक और महत्वपूर्ण तथ्य जिसका उल्लेख किया जाना जरूरी है कि हिम्मत सेठ ने सामाजिक राजनीतिक सांस्कृतिक और साहित्यिक धरातल से अपने विषय चुने हैं। वे देश दुनिया की चिंता करने वाले साहसी और समाजवादी लेखक संपादक हैं। यहीं कारण है कि तमाम खतरों को पीछे छोड़ कर उन्होंने सच का सामना जैसी वैचारिक चेतनाशील और समाज को सचेत करने वाली पुस्तक प्रकाशित करवाई। यह भी लेखों का संकलन है।
पुस्तक में जीवन का वृत्तांत है। आमतौर पर व्यक्ति अपनी लड़ाईयां भी नहीं लड़ पाता। बार बार उसे डर सताता है। सबसे ज्यादा कर होता है वमन, अत्याचार, आरोप, अधिकार विहीन होकर आत्म सम्मान खोने का। आर्थिक रूप से अशक्त होना इसमें सबसे बड़ी कमजोरी होकर उभरता है। ऐसे में कोई समूह या शक्ति को पाकर हताश निराश व्यक्ति संबल पाता है। समाजवादी आन्दोलन ऐसी ही पृष्ठभूमि पर आधारित था। प्रोफेसर राजकुमार जैन ने समाजवादी आन्दोलन के नब्बे वर्ष के उपलक्ष्य में प्रस्तुत रिपोर्ट में लिखा है
कि जयप्रकाश नारायण के नेतृत्व में संपूर्ण क्रांति आंदोलन और आपातकाल विरोधी संघर्ष में समाजवादी आंदोलन ने महत्वपूर्ण योगदान दिया है।
समाजवादी आंदोलन की वृढ आधार नीति संकल्प और विचार को जमीनी स्तर पर उतरना था। पुस्तक में उन ऐतिहासिक संदभों और परंपराओं को विवेचित किया गया है जिसमें सत्य का पक्ष प्रबल हुआ है। उल्लेखनीय तथ्य यह है कि यह केवल विचार के विस्तार की पुस्तक नहीं है। यह पुस्तक विचार को व्यवहार में कार्यों में परिवर्तित करने की और उन विचारों को फैलाने के लिए लिखी गई पुस्तक है जिसमें स्थूल या बाहरी आडंबर नहीं है।
असमानता और सामंती प्रथाएं हमारे पिछड़ेपन का मुख्य कारण है।
राजेन्द्र सिंह चौधरी जिन्हें यह पुस्तक और विचार समर्पित किया गया है. उसका लेख आजादी के स्वर्ण जयंती
के अवसर पर आजादी के पचास वर्ष में राजस्थान के परिप्रेक्ष्य में उन ऐतिहासिक संदभों को उठाया है जिनके कारण अत्याचार और अधिक बढ़े। ऐसे में प्रजा को जागरूक करने का कार्य भी समाजवादियों द्वारा हुआ।
हिम्मत सेव का एक लेख कवि, चिंतक नंद चतुर्वेदी के व्यक्तित्व पर लिखा गया है। वे लिखते हैं ध्मैने नंदबाबू को बहुत से मोर्चों पर संघर्ष करते देखा है। नंदबाबू समाजवादी आन्दोलन के प्रमुख नेताओं जिनमें जयप्रकाश नारायण, लोहिया, हीरालाल जैन जैसे गंभीर अध्येता और कार्यकर्ताओं से प्रभावित थे। यही कारण था कि वैसा ही जुझारूपन, एकाग्रता, सादगी और ईमानदारी उनके व्यक्तित्व औरकामों में थी। वे राष्ट्रीय और प्रदेश स्तर के मुद्दों के साथ स्थानीय संकटों पर भी अपनी बेबाक राय रखते थे औरअनेक बार आन्दोलनों की अगुवाई भीकी, दमन और अत्याचार सहे किंतु नटटे और न ही झुके। उनकी कविताओंका मुख्य स्वर समाज की समता औरस्वाधीनता के पक्ष का रहा है। अभावऔर पराधीनता का क्षोभ, आपातकालका विरोध उनकी रचनाओं में पढ़ा जासकता है। नंद चतुर्वेदी के दो लेख भी इस पुस्तक में हैं। यह दोनों लेख समाजवादी
आन्दोलन की आवश्यकता और प्रासंगिकता के परिदृश्य में दो प्रमुख नेताओं के महत्त्वपूर्ण अवदान को विश्लेषित करते हैं। पहला लेख है समता का यह योद्धा हीरा लाल जैन। उनके विषय में नंद चतुर्वेदी लिखते हैं कि हीरालाल जैन ने न कोई दीनता दिखाई और न पलायन किया। वे अपनी नैतिक आस्थाओं को बनाए रखने वाले मजबूत आदमी थे। इसका सबूत उनकी जिंदगी थी। वे आनंबर और अलंकार रहित भाषा बोलते थे। शोषण और जुल्मों का जिक्र करते समय किसी चतुराई या छल कपट को महत्व नहीं देते थे। अपने विचारों के प्रसार के लिए उन्होंने जयहिंद नाम का मुखपत्र भी निकाला।
दूसरा लेखा समता का सिपाही चौधरी राजेन्द्र सिंह पर केन्द्रित है। इस लेख में राजेंद्र सिंह चौधरी के उन कार्यों को याद किया गया है जो बुनियादी तब्दीलियों को लाते है जजैसे बराबरी केलिए, अत्याचार समाप्त करने के लिए संघर्ष।
नरेंद्र पाल सिंह चौधरी राजस्थान में समाजवादी आन्दोलन के स्तंभ लेख डॉ हेमेंद्र चंडालिया ने लिखा है। लेख समाजवादी आन्दोलन का वह पृष्ठ खोलता है जिसमें किसान, मजदूर और आम जनता के हित में किए गए आन्दोलनों का विवरण है।
विवेक रंजन मेहता का लेख मामा बालेश्वर दयाल यादों के झरोखे से यह रेखांकित करता है कि समाजवादी शहरवासियों से अधिक अंचलों के रहवासियों के लिए काम करते रहें है। भीलों के उत्थान और उनकी जीवन स्थितियों को सुधारने की दिशा में मामा बालेश्वर का अप्रतिम योगदान रहा है।
परसराम त्रिवेदी ने शांति और आनंदी के शहीद हो जाने की मार्मिक वास्तान लिखी है। उनका लिखा लेख मेवाड़ की स्वतंत्रता के अंतिम संघर्ष की लोमहर्षक कहानी ने एक बार फिर यह सिद्ध किया कि समाजवादी आन्दोलन शाब्दिक नहीं जीवन मृत्यु पर विजय का भी आन्दोलन रहा है।
महिला शिक्षा के प्रति सचेत श्रीमती शांता विवेदी पर चन्द्रकान्ता त्रिवेदी का लेख श्रीमती शांत त्रिवेदी के कर्मठ व्यक्तित्व एवं बहुआयामी संघर्ष में जीवन पर विहंगम दृष्टि पठनीय है। चौदह वर्ष की अल्पायु में ही आजादी के आन्दोलन से जुड़ कर शांता जी वे काम किए जिसने समाज की संकीर्णता को समाप्त करने में बढ़ा योगदान किया। उन्होंने समाज में व्याप्त कुरीतियों और अशिक्षा के विरुद्ध लंबी लड़ाई की। समाजवादी आन्दोलन का एक प्रमुख उद्देश्य नारी चेतना और अधिकारों का था। शांता जी ने 1947 में राजस्थान महिला परिषद् की स्थापना की। राष्ट्र सेवा दल की शाखा चलायी। गांधी जी से प्रभावित होकर अत्याचार के विरुद्ध अभियान चलाया। अपने कार्यों से यह स्थापित किया कि मंदिर में प्रवेश का अधिकार हर मनुष्य को प्राप्त है। यह एक ज्जवलंत उदाहरण रहा था समाजवादी विचारधारा को जन जन तक पहुंचाने का।
श्री परसराम त्रिवेदी के समाज सापेक्ष महती कार्यों पर श्री जगदीश राज श्रीमाली का लेख स्वतंत्रता सेनानी स्व परसराम त्रिवेदी उल्लेखनीय है। श्री जगदीश राज श्रीमाली लिखते हैं कि परसराम त्रिवेदी ने प्रजा मंडल के आन्दोलन में सक्रिय भूमिका निभाई जिसमें वे सामंती अत्याचार के शिकार भी हुए। सबसे बड़ी चुनौती शिक्षा की थी तो त्रिवेदी जी ने गली मोहल्ले में पाठशालाएं चलाई जिसमें किसी के प्रवेश पर रोक नहीं थी। इसी के साथ बिजौलिया किसान आंदोलन में पदयात्रा भी की और समाजवादी आन्दोलन को आगे बढ़ाया।
हिमालय तहसीन ने हबीबा बानू के विचार और कामों पर सुचित्य लेख लिखा है स्त्री की खुद मुख्तारी और समता वाले समाज के लिए संघर्षशील रही हबीब बानो शीर्षक से ही हबीबा बानू का वह व्यक्तित्व उभरता है जिसमें उनकी विचारधारा स्पष्ट हो जाती है। हिमालय तहसीन के अनुसार स्वावलंबी स्वी, शोषण मुक्त सौहार्द से भरा और बराबरी वाला समाज बनाना उनकी जिंदगी का मकसद था।हिम्मत सेठ का एक लेख फतेहसिंह मेहता पर है। फतेहसिंह मेहता वकील थे।

