समीक्षक – तेजपाल सिंह ‘तेज’
बलविंद्र सिंह ‘बलि’ का कविता संग्रह ‘खतरे में कुर्सी’ समकालीन हिंदी कविता के
परिदृश्य में एक ज़रूरी दस्तक है, जो खासतौर पर दलित चेतना, सामाजिक विषमता और सत्ता
के यथार्थ पर सवाल उठाने के लिए लिखा गया है। यह सिर्फ एक संग्रह नहीं, बल्कि उन असंख्य
आवाज़ों की गूंज है जिन्हें सभ्य समाज ने लंबे समय तक सुनने से इनकार किया है। बलि की
कविताएँ न तो परंपरागत सौंदर्यबोध की बन्दिशों में बँधी हैं, न ही वे भावुकतावादी करुणा की
लकीरों पर चलती हैं। वे प्रतिरोध की ज़मीन से उगती हैं, व्यंग्य के औज़ार से खुद को तेज करती
हैं और सामाजिक यथार्थ को कविता की भाषा में अनुवादित करती हैं। इनकी कविताएं, कहें तो
“रंगाई-पुताई” वाले समाज की असल दीवारों पर कील ठोकती हैं।
‘खतरे में कुर्सी’ केवल एक कविता संग्रह नहीं, बल्कि एक दस्तावेज़ है — एक ऐसे भारत
का जो संविधान में भले बराबर हो, व्यवहार में आज भी जातियों, संप्रदायों, वर्गों और लैंगिक
असमानताओं में बंटा हुआ है। बलविंद्र सिंह ‘बलि’ उस कवि का नाम है जो अपने यथार्थ को
दबाने के बजाय उसे कविता की आग में तपाकर प्रस्तुत करता है। यह संग्रह उन सबके लिए
जरूरी है, जो आज के भारत को समझना चाहते हैं — बिना परदे, बिना चाशनी और बिना
घबराहट के।
रचना-शिल्प : शिल्प में सादगी, कथ्य में तीव्रता:
बलि की कविताएं सादे और सहज शब्दों में लिखी गई हैं, मगर उनमें निहित आक्रोश,
विवेक और व्यंग्यात्मकता उन्हें ताकतवर बनाते हैं। ये कविताएं पाठक को चौंकाती हैं, जगाती हैं
और अक्सर उसे खुद से सवाल पूछने पर मजबूर करती हैं। यह संग्रह ग़ज़ल और मुक्तक को भी
समेटे हुए है, परंतु बलि की शक्ति मुख्यतः उनकी कविता विधा में है, जहाँ वे अपने पूरे तेवर
और लहजे में खुलकर बोलते हैं। मुक्तक और ग़ज़लों में वे अभी सीखने की प्रक्रिया में हैं, मगर
कविताओं में उनकी पकड़ असंदिग्ध है।
मुख्य विषयवस्तु : दलित चेतना, सत्ता आलोचना, वर्ग-जाति-संस्कृति विमर्श
- पलायन, भूख और श्रमिक जीवन की त्रासदी:
‘पलायन’, ‘मिल मजदूर’, ‘अब वह मजदूर भी नहीं’, ‘मण्डी’ जैसी कविताएं भारत के
श्रमजीवी वर्ग की उपेक्षा, विस्थापन और असुरक्षा को गहराई से उकेरती हैं। “यूँ तो उसकी उम्र
स्कूल जाने की थी/ भूख ने जिन्दगी में ये आग लगाई है…” इन पंक्तियों में जो भूख है, वह केवल
उदर की नहीं, बल्कि समता और गरिमा की भूख भी है। - राजनीति पर करारा व्यंग्य:
कवि की राजनीति पर गहरी पकड़ है, और वह इसे केवल सतही आलोचना की तरह
नहीं, बल्कि तंत्रगत सड़न के स्तर पर खंगालते हैं। ‘मैं विश्वगुरु बोल रहा हूँ’, ‘राज अनैतिक’, ‘डर
की दुकान’, ‘असुविधा के लिए किसे खेद है?’ जैसी कविताएं झूठे राष्ट्रवाद, धार्मिक उन्माद और
सत्ता की दोगली चालों पर तीखा प्रहार करती हैं। “तरह-तरह के भगवान / सबकी अपनी अलग
दुकान… / वास्तव में यह है / जबरन की जाने वाली / धार्मिक हफ्ता वसूली…” यह कविता
राजनीति और धर्म के गठजोड़ की “डर आधारित दुकानदारी” का व्यंग्यपूर्ण भंडाफोड़ करती है। - जाति और सामाजिक विषमता का निर्मम चित्रण:
जातिवाद पर बलि की कविताएं न केवल वैचारिक हैं, बल्कि अनुभवजन्य भी हैं। ‘जाति’,
‘फतवे’, ‘तुम्हारे सभी भगवान’, ‘कोई अछूत नहीं होता’, ‘समझदार शहर’, ‘समानता धर्म है’
जैसी कविताएं बहुसंख्यक समाज की मानसिकता पर कठोर सवाल उठाती हैं। “मैं तो पण्डत हूँ,
कहीं भी घण्टा बजा लूँगा / मगर तुझे फँसा दूँगा, तेरा जीना हराम कर दूँगा।” यह पंक्ति ‘दफ्तर
के भीतर जातिवाद’ को उतनी ही शिद्दत से उजागर करती है जितनी कि ग्रामीण समाज की
छिपी हिंसा को।
- स्त्री, अस्मिता और दमन :
‘ठिठका हुआ दिल’, ‘रामायण की दो नारियाँ’, ‘माँ, ममता और मच्छर’, ‘मणिपुर-तीन’
जैसी कविताएं नारी देह के राजनैतिक शोषण, बलात्कार, और स्त्री-विरोधी मानसिकता की
आलोचना करती हैं। “अनजान गाँव की / दलित बेटी की मौत से पहले की / अन्तिम चीख सुन
कर / ठिठक कर / रुक गया होगा…” यह कविता सामाजिक-राजनीतिक संवेदनहीनता का
आइना बन जाती है। बलात्कार और हत्या जैसे अमानवीय कृत्य अब समाचार बन कर रह गए
हैं, इन कविताओं में वे सामाजिक प्रतिरोध में बदल जाते हैं।
भाषा और मुहावरे :
बलि की भाषा सहज, मौलिक और बोलचाल की है, जिसमें कई बार लोक-शब्दों का
जीवंत प्रयोग मिलता है — गपोड़ा, भसड़, पिन्न, कुजन जैसे शब्द कविता को ‘कागजी’ नहीं होने
देते। ये शब्द केवल शब्द नहीं, एक पूरी संस्कृति और वर्ग-चेतना के वाहक हैं। वे कविता में न
केवल बोलते हैं, बल्कि “जिनसे बात की जाती रही है”, उन्हें भी बोलने का मौका देते हैं। यही
उनकी कविताओं को एकतरफा भाषण नहीं, संवाद बनाता है।
प्रतिरोध की कविता : सजगता से सधे स्वर
बलि की कविताओं में प्रतिरोध मुखर है, लेकिन वह अराजक नहीं है। उनके यहाँ नकार
नहीं, विकल्प की खोज है। वे केवल चीखते नहीं, चिन्हित भी करते हैं — “क्या गलत है, क्यों
गलत है और किसे बदलना है”। उदाहरण : “राज गद्दी का नशा / निन्दा के स्वर पर पहरा / और
प्रशंसा को पुरस्कार / दिलवाता है।” (कविता – ‘मैं’) सत्ता की प्रवृत्ति को परखने वाली यह दृष्टि
केवल कवि की नहीं, एक सजग नागरिक की है।
आलोचना और आत्मालोचन के बीच एक सृजनशील पुल :
बलि की कविताएं किसी वैचारिक रटंत से उपजी हुई प्रतीत नहीं होतीं, बल्कि जीवन के
अनुभवों की धूल-मिट्टी से उठकर आई हैं। यहाँ व्यंग्य है, लेकिन वह चटखारे वाला नहीं, बल्कि
अंतःकरण को झकझोरने वाला है। यह संग्रह नारेबाज़ी या सतही विरोध की ओर नहीं झुकता,
बल्कि वह चेतना विकसित करता है जो सवाल पूछने की ताक़त देती है।
दलित कविता की नई लकीर:
बलविंद्र सिंह ‘बलि’ की कविताएं दलित साहित्य की उस पीढ़ी से आती हैं जिसमें
आक्रोश है, पर गाली नहीं; असहमति है, पर बर्बरता नहीं। उनका तेवर तीखा है लेकिन उनका
लक्ष्य न्याय और समानता की स्थापना है। उनकी कविताएं कोई वैचारिक वामपंथी नारा नहीं
हैं, बल्कि उस जीवन की सच्ची दास्तान हैं जिसे हम सभ्यता कहकर नज़रअंदाज़ करते रहे हैं।
संकलन की कुछ प्रमुख विशेषताएं :
ठोस सामाजिक चेतना, व्यंग्यात्मक तेवर, सहज और प्रभावशाली भाषा, दलित
दृष्टिकोण से सत्ता, धर्म और संस्कृति की आलोचना, नए बिम्ब और मुहावरे तथा कुछ रचनाओं
में और परिपक्वता की संभावना… संक्षेप में कहा जाए तो —‘खतरे में कुर्सी’ खतरे में पड़ी
संवेदना को बचाने की एक शालीन लेकिन धारदार कोशिश है।
क्यों पढ़ी जाए ‘खतरे में कुर्सी’?
‘खतरे में कुर्सी’ आज के भारत का दस्तावेज़ है — जिसमें सत्ता की माया, धर्म की दुकान,
जाति का ज़हर और भूख का सच बिना लाग-लपेट सामने रखा गया है। यह संग्रह दलित
साहित्य की नई पीढ़ी की प्रतिनिधि आवाज़ है, जो बिना गाली-गलौज के, बिना विकृति के —
सधे हुए प्रतिरोध की मिसाल है। बलविंद्र सिंह ‘बलि’ की यह कृति समाज के उस दबाए गए,
कुचले गए हिस्से की ओर से एक वाजिब प्रतिवाद है, जिसे हम लगातार सुनना भूलते जा रहे हैं।
यह संग्रह चेतना के उस तलघर में उतरता है, जहाँ अँधेरा नहीं सिर्फ़ अन्याय है — और
कवि वहीं मशाल लेकर खड़ा है। यदि आप सामाजिक न्याय, दलित साहित्य, समकालीन
राजनीति और मानवीय चेतना में रुचि रखते हैं — तो ‘खतरे में कुर्सी’ आपके लिए एक ज़रूरी
और ज़मीनी किताब है। यदि आप चाहें, तो मैं इस समीक्षा का संक्षिप्त संस्करण पुस्तक के फ्लैप,
भूमिका या मीडिया रिलीज़ के लिए भी तैयार कर सकता हूँ।
सारांशत: बलविंद्र सिंह ‘बलि’ की काव्य-कृति ‘खतरे में कुर्सी’ समकालीन हिंदी कविता
में वह हस्तक्षेप है जो मौजूदा राजनीतिक-सामाजिक यथास्थितियों को बेधक दृष्टि से परखता
है। यह संग्रह न केवल दलित चेतना का प्रतिनिधित्व करता है, बल्कि सत्ता, पूँजी, धर्म, और
सामाजिक पाखंड की चीरफाड़ करने का साहस भी रखता है।
बलि कवि ही नहीं, एक सचेत शिक्षक और कलाकार भी हैं। कला के विभिन्न माध्यमों में
गहरे डूबे होने के बावजूद वे अपने समय के यथार्थ से कतराते नहीं, बल्कि उसे कविता के
व्याकरण में बदलने की क्षमता रखते हैं। ‘खतरे में कुर्सी’ उनकी वैचारिक-सामाजिक जागरूकता,
शिल्प सादगी और भाषिक ताजगी का बेहतरीन संगम है।
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पुस्तक : खतरे में कुर्सी (कविता संग्रह)
कवि : बलविंद्र सिंह ‘बलि’ (कला प्राध्यापक, शिक्षा निदेशालय, दिल्ली)
प्रकाशक : पुष्पांजलि प्रकाशन, दिल्ली – 110053
कविताएँ : 62 पृष्ठ : 160 मूल्य : ₹495/-

