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इत्तिफ़ाक़ अपनी जगह ख़ुश-किस्मती अपनी जगह,ख़ुद बनाता है जहाँ में आदमी अपनी जगह

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इक़बाल अब्बासी

जिंदगी में अक्सर ऐसे इत्तेफा़क होते हैं, दर्द तभी मिलते हैं, जब हमें किसी से जुड़ी कोई बात दिल पर दस्तक देती हो और वह हमसे जुदा हो जाता है। कई लोग इत्तेफाक से मिल जाते हैं और कई इत्तेफाक से बिछड़ जाते हैं। जी हां दोस्तों अभी चार दिन पहले की ही बात है, रविवार पत्रिका के दफ्तर में बड़े भैय्या *सुभाष खण्डेलवाल जी* ने मुझे कुछ गानों की लिस्ट दी, जिनको एमपी 3 में उन्हें वाट्सएप पर चाहिए थे। इस लिस्ट में तलत मेहमूद, मोहम्मद रफी, मुकेश, लता के गाने थे, जिसे मैं नेट से डाउनलोड कर रहा था। कल ही फिल्म *‘यहूदी’* का गीत जो मुकेश की आवाज में था *‘‘ये मेरा दीवानापन है’’* डाउनलोड किया और इसको देर रात तक कई बार अपने मोबाइल में सुनता रहा। इस गीत में एक कड़ी है- *‘‘ऐसे वीराने में एक दिन, घुट के मर जाएंगे हम, जितना जी चाहे पुकारो, फिर नहीं आएँगे हम।’’* जो मैं बार-बार सुन रहा था। इस फिल्म में दिलीप कुमार और मीना कुमारी की मुख्य भूमिका थी। सुबह खबर मिली दिलीप साहब हम सबको अलविदा कह गए। मेरे जहन में दिलीप साहब के कई फिल्मी डायलॉग दौड़ लगाने लगे। इसी दौड़ में याद आया कि अभी 2019 में मेरे उस्ताद मोहतरम *हिदायतउल्लाह खान साहब* ने *राहत इंदौरी साहब* पर किताब लिखी थी *‘क़लंदर’*। इस किताब में राहत इंदौरी साहब की दिलीप कुमार से पहली मुलाकात का किस्सा भी है, जो बड़ा दिलचस्प है। उसका कुछ हिस्सा यह है कि- ‘‘राहत इन्दौरी कहते हैं- मैं शुरू से उनका दीवाना रहा हूं और जब फिल्मी पोस्टर बनाता था, तब दिलीप कुमार का पोस्टर बनाने में अलग ही मजा आता था। उनसे मेरी पहली मुलाकात मुशायरे में हुई। मुझे याद है मुम्बई में उर्दू टाइम्स की सिल्वर जुबली थी, उसमें दिलीप कुमार आए थे। उसके बाद हैदराबाद के मुशायरे में मुलाकात हुई। वो हैदराबाद का जिक्र करते हैं तो नूर इंदौरी याद आ जाते हैं, जो सुनाया करते थे- वहां के मुशायरे में दिलीप साहब मेहमान-ए-खुसूसी थे, जैसे ही हमने उन्हें देखा, मैंने राहत इंदौरी से कहा चलो, मिल लेते हैं। मिलना तो उनको भी था, लेकिन वो बोले नूर साहब ऐसा करते हैं, पहले पढ़ लेते हैं, खूब अच्छा पढ़ेंगे, फिर मिलने का म़जा ही कुछ ओर आएगा। मुझे भी मशवरा पसन्द आया। जैसे ही मैंने पढ़ा, चारों तरफ दाद थी और उसके बाद राहत इंदौरी ने भी कमाल ही कर दिया, मुशायरा उड़ रहा था, धुआं-धुआं हो गया था। अब हमारे मिलने की बारी थी। दिलीप साहब के आस-पास बैठ गए, मैं पहले से बैठ गया था, मेरे पास आकर राहत भी बैठ गए। दोनों खामोश बैठे थे, दिलीप साहब का हम पर कोई ध्यान नहीं था, थोड़ी देर बाद उन्होंने राहत की तरफ देखा और बोले, कहिए मियां…! अब राहत का चेहरा देखते ही बनता था, लेकिन फौरन राहत ने कहा, फोटो की तलब है? मैंने और राहत ने दिलीप साहब के साथ फोटो खिंचवाया और उन्होंने राहत के कंधे पर हाथ रखते हुए फोटोग्राफर से कहा, खूबसूरत आना चाहिए। फिर हम वापस उनके पास बैठ गए। कुछ देर बाद दिलीप साहब ने फिर पलट कर देखा और राहत के कान में कहा फोटो हो गए ना..! अब हमें उठना था, हम समझ चुके थे, वो क्या चाह रहे हैं।’’इसके बाद तो एक वक्त ऐसा भी आया है कि दिलीप साहब के सिरहाने राहत इंदौरी साहब की किताब हुआ करती थी। जिसका जिक्र भी हिदायतउल्लाह खान साहब ने ‘कलंदर’ में किया है।दिलीप साहब आज इस दुनिया-ए-़फानी से रुखसत हो गए हैं, मैं उन्हें खिराज़-ए-अ़कीदत पेश करता हूं और अल्लाह से दुआ करता हूं कि अल्लाह उनकी मगफिरत करे। आमीन…
*- इक़बाल अब्बासी*

Ramswaroop Mantri

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