मधुकर पवार
यदि किसी से भी अचानक पूछ लिया जाये कि तीज त्यौहार के बाद उत्सव प्रेमी हमारे भारत देश मेँ वर्ष भर चलने वाला महोत्सव क्या है ? शायद अधिकांश का यही उत्तर होगा….. चुनाव। मौसम विज्ञानी बताते हैं… विश्व मेँ हर क्षण कहीं न कहीं बिजली गिरते रहती है। ठीक इसी तरह हमारे देश मेँ भी हमेशा कहीं न कहीं चुनाव होते ही रहते हैं। कहीं ग्राम पंचायत के चुनाव तो कहीं नगरीय निकायों के। लोक सभा के चुनाव तो पाँच साल में एक बार ( यदि मध्यावधि चुनाव नहीं हुए तो) होते हैं लेकिन विधानसभाओं के चुनाव तो प्राय: हर साल ही होते हैं। और उपचुनाव तो कभी भी। राज्यसभा के चुनाव भी समय – समय पर होते ही रहते हैं। देश में चुनाव के दौरान उत्सव सा माहौल हो जाता है। वातावरण में एक अलग सी चुनावी महक आ जाती है जिसके कारण उन्माद में लोग बहकने भी लग जाते हैं । शराब पीकर बहकना तो समझ में आता है लेकिन उम्मीदवारों और स्टार प्रचारकों की जुबान तो बिना पिये ही बहक जाती है।

जब हम चुनाव महोत्सव की बात करते हैं तो इसके साथ अनेक बातें अपने आप ही जुड़ जाती हैं। इसे अब नये परिवेश में चुनाव के साथ इनबिल्ट होना भी कह सकते हैं। चुनाव की घोषणा से लेकर मतगणना तक होने वाले सभी काम जैसे उम्मीदवारों की सूची का जारी होना, घोषणा पत्र जारी करने के लिये प्रेस कांफ्रेंस का आयोजन, उम्मीदवारों द्वारा पर्चा दाखिल करना, उम्मीदवारों के क्षेत्र में कार्यालय का शुभारम्भ, प्रचार अभियान का संचालन, प्रिंट और इलेक्ट्रानिक मीडिया के माध्यम प्रचार, मतदान और मतगणना तक सब कुछ किसी इवेंट के माफिक चलते रहता है। इस बीच चुनाव आयोग भी नये मतदाताओं के नाम मतदाता सूची में दर्ज करने, मतदान कर्मियों के प्रशिक्षण, मतदान केंद्रों और आदर्श मतदान केंद्रों की कवायद, ई.वी.एम. का प्रदर्शन, मतदान और और फिर मतगणना . ये सभी आयोजन चुनाव के उत्सव ही होते हैं। उत्सव प्रेमी देश में चुनाव अब नीरस नहीं बल्कि उत्सव के रूप में होने लगे हैं और इन पर दिल खोलकर खर्च भी किया जाने लगा है।
लोकतंत्र है तो चुनाव होना ही है और बिना चुनाव के लोकतंत्र की कल्पना करना मात्र लोकतंत्र को खतरे में डालने के समान है। क्योंकि बिना चुनाव के प्रतिनिधियों का चुनाव सम्भव ही नहीं। निर्विरोध चुन लिये जाने के पहले भी ऐसे उम्मीदवारों को चुनाव महोत्सव के कुछ आयोजनों में शरीक तो होना ही पडता है।
जब चुनाव होते हैं तो चुनाव में अच्छा खासा खर्च भी होता है। इसका सीधा सा यह भी मतलब लगाया जा सकता है …. चुनाव और वित्त यानी फायनेंस का चोली दामन का साथ है। लेकिन कुछ वर्षों से देखा जा रहा है कि चुनाव आयोग और उम्मीदवारों के बीच चुनावी खर्च को लेकर आंख मिचौली का खेल या ये कहें तू डाल हम पात पात… के समान चलते ही रहता है। चुनाव और वित्त के बीच चुनाव आयोग का फरमान उम्मीदवारों के लिये एक तरफ खाई तो दूसरी ओर कुआं जैसे ही होता है। आयोग ने खर्च करने की सीमा तय कर दी है और सब जानते हैं तय वित्तीय सीमा में चुनाव की वैतरणी पार करना कितना टेढ़ी खीर है? जिस तरह आयकर बचाने के लिये सभी आयकरदाता तिकड़म भिड़ाते रहते हैं, उसी तरह उम्मीदवार भी कम से कम खर्च दिखाकर मिशाल पेश करना चाह्ते हैं कि उन्होने वित्तीय सीमा से कम खर्च किया है। चुनाव खर्च का ईमानदारी से हिसाब रखा है। खर्च की अनेक पतली गलियां निकल आती हैं और वे पूरी कोशिश करते हैं कि चुनाव आयोग उनके खर्च पर ऊंगली न उठा सके।
एक कहावत है तेली का तेल जले और पड़ौसियों के दिल. जब खर्च करने वाले को तकलीफ नहीं तो आयोग के पेट में दर्द क्यों होता है? चुनाव के लिये इकट्ठा किये गये धन से हजारों कार्यकर्ताओं और बेरोजगारों को भले ही कुछ समय के लिये ही सही, रोजगार तो मिल ही जाता है। बाजारों में रौनक बढ़ जाती है। झंडों और डंडों से बाजार पट जाते हैं। इस ओर भी आयोग को मानवीय दृष्टिकोण अपनाना चाहिये। आखिर जनप्रतिनिधियों को भी तो समाज के प्रति अपना दायित्व निभाने का मौका बार – बार थोड़े ही मिलता है।
राजनीतिक दलों के घोषणा पत्रों में भी एक नहीं बल्कि कई पीढ़ियों के विकास का खाका खींचा जाता है। तब मतदाताओं के लिये बड़ी मुश्किलें पैदा हो जाती है कि सभी दलों ने एक से बढ़कर एक वादे किये हैं, तब वह किस उम्मीदवार को अपना बहुमूल्य मत दे। शराब और कबाब का भी व्यवसाय चरम पर होता है। शराब की बेहिसाब बिक्री से सरकार का खजाना भरने में भी मदद हो जाती है।
हाल ही में शहर के मुख्य बाजार में दो पहिया वाहन के शोरूम में बड़े – बड़े अक्षरों में लिखा हुआ पढ़ने को मिला… लिखा था – फायनेंस महोत्सव का लाभ उठायें और अपना मनपसंद वाहन घर ले जायें । फायनेंस महोत्सव पढ़कर थोड़ा अचरज हुआ क्योंकि अब तक तो आसान किस्तों में, जीरो ब्याज में, सौ प्रतिशत फायनेंस सुविधा जैसे प्रलोभन वाले वाक्य पढ़ने को मिलते रहे हैं लेकिन फायनेंस महोत्सव शब्द तो मेरे लिए एकदम नया था। थोड़ा चिंतन करने पर समझ में आया…मुझे हर दिन मोबाईल पर एक दो काल आ ही जाती है जिसमें फोन करने वाले पर्सनल लोन, होम लोन, कार लोन लेने के लिये आग्रह करते हैं। विनम्रता से मना कर देने के बाद वे ये कहना नहीं भूलते… मेरा नम्बर सेव कर लीजिये। जब जरूरत हो फोन जरूर करना। एक दिन में ही पैसा आपके एकाऊंट में आ जायेगा। वितीय महोत्सव तो साल भर चलते ही रहता है। इसके रूप और स्वरूप बदलते रहते हैं, लेकिन लक्षित समूह तो आम जनता ही होती है।
अभी कुछ दिन पहले ही पांच राज्यों के विधानसभा चुनाव की भी घोषणा हो गई है. चुनाव महोत्सव के दौरान मतदाताओं को रिझाने के लिये तिजौरियां खुलने का समय आ गया है. बाकी तीज त्यौहार को मनाने और अन्य महोत्सव पर तो कोरोना के कारण बंदिशें लग सकती हैं लेकिन इस राष्ट्रीय चुनाव महोत्सव पर कोरोना की वक्रदृष्टि बिलकुल नहीं पड़ेगी. अपनी याददास्त पर जोर डालेंगे तो आपके मानस पटल पर पिछ्ले वर्ष हुये चुनाव के दृश्य अंकित हो जायेंगे. पूरे विश्व में केवल यही एक महोत्सव है जो कोरोना प्रूफ है. इसीलिये ज्ञानी जन कहते हैं…. कोरोना पर विजय पाना है तो पूरे देश में चुनाव करवा दीजिये। यानी चुनाव महोत्सव का भरपूर आनंद लीजिये। घर से बाहर जाने पर पाबंदी लग जाये तो घर में ही टी.वी. के सामने बैठ जाईये। चुनावी मनोरंजन की सौ टका गारंटी है।





