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देश की पहली बुलेट ट्रेन…पार्ट-3:975 टन के 40 मीटर लंबे गर्डर, उठाने में लगी 216 पहियों की गाड़ी

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अहमदाबाद/मुंबई

अहमदाबाद से मुंबई की ओर बढ़ते ही रास्ते में सफेद रंग के सैकड़ों पिलर दिखने लगते हैं। इन पिलर पर गर्डर रखे जा रहे हैं। इनमें सबसे भारी गर्डर 40 मीटर लंबा और 975 टन भारी है। इसे उठाने में 216 पहियों का एक ट्रक लगता है। 40 डिग्री से ज्यादा तापमान में ये बड़ी-बड़ी मशीनें और मजदूर काम में जुटे हैं। ये सब अहमदाबाद से मुंबई के बीच चलने वाली देश की पहली हाईस्पीड ट्रेन के लिए ट्रैक तैयार कर रहे हैं।

इस सीरीज की पहली स्टोरी में आपने 508 किमी के ट्रेन रूट पर बने 12 स्टेशनों की वर्क प्रोग्रेस के बारे में पढ़ा, दूसरी स्टोरी में बुलेट ट्रेन के ट्रैक, ब्रिज और टनल के बारे में पढ़ा, अब इस स्टोरी में पढ़िए कि 300 किमी प्रति घंटे की रफ्तार से चलने वाली ट्रेन के लिए गर्डर कहां और कैसे बनाए जाते हैं।

इसके लिए हम आपको उन मेगा फैक्ट्रीज में लेकर चल रहे हैं, जहां ये बनाए जा रहे हैं…

बुलेट ट्रेन के ट्रैक के लिए गर्डर बना रहीं इन फैक्ट्रियों को ‘कास्टिंग यार्ड’ कहा जाता है। आणंद और भरूच में ऐसे कास्टिंग यार्ड बनाए गए हैं। यहां तीन शिफ्ट में दिन-रात काम चल रहा है।

बुलेट ट्रेन के ट्रैक के लिए गर्डर बना रहीं इन फैक्ट्रियों को ‘कास्टिंग यार्ड’ कहा जाता है। आणंद और भरूच में ऐसे कास्टिंग यार्ड बनाए गए हैं। यहां तीन शिफ्ट में दिन-रात काम चल रहा है।

आणंद कास्टिंग यार्ड: 100 से ज्यादा इंजीनियर
अहमदाबाद से मुंबई की ओर बढ़ते हुए हमारा पहला पड़ाव साबरमती से 80 किलोमीटर दूर आणंद जिले का कास्टिंग यार्ड था। यहां 28 अक्टूबर, 2021 को 40 मीटर लंबे बॉक्स गर्डर बनने शुरू हुए थे। इन्हें फुल स्पैन गर्डर भी कहते हैं। लगभग 970 टन वजनी ये गर्डर भारत में बन रहे सबसे भारी कॉन्क्रीट बॉक्स गर्डर हैं।

24 अप्रैल को जब हम यहां पहुंचे तब दोपहर के 4 बजे थे। कुछ मजदूर पाइप और सरिया काट रहे थे तो कुछ वेल्डिंग कर जाल बना रहे थे। धूप इतनी तेज थी कि खड़े रहना मुश्किल था, ऐसे में वेल्डिंग का काम बेहद मुश्किल नजर आ रहा था।

हालांकि वेल्डिंग से निकलने वाली चिनगारियों से बचने के लिए वर्कर्स को एंटी फायर ग्लव्स दिए गए हैं। बिहार के रहने वाले मुकेश कुमार यहां काम करते हैं। वे बताते हैं, ‘तेज गर्मी में गर्म लोहा काटना बहुत मुश्किल काम है। सुबह-शाम तो ठीक है, लेकिन धूप में तो कई बार ग्लव्स पहनने के बावजूद हाथ जल जाते हैं।’

गर्मी के दिनों में आणंद का तापमान 40 डिग्री तक चला जाता है। गर्डर बनाने में लोहा बहुत ज्यादा इस्तेमाल होता है, गर्मी में इसे काटना और वेल्डिंग करना मजदूरों के लिए मुश्किल हो जाता है।

गर्मी के दिनों में आणंद का तापमान 40 डिग्री तक चला जाता है। गर्डर बनाने में लोहा बहुत ज्यादा इस्तेमाल होता है, गर्मी में इसे काटना और वेल्डिंग करना मजदूरों के लिए मुश्किल हो जाता है।

इसके बाद हम नेशनल हाई स्पीड रेल कॉर्पोरेशन (NHSRCL) के एक इंजीनियर से मिले। उन्होंने बताया कि इस जगह L&T के 100 से ज्यादा इंजीनियरों की देखरेख में करीब 1000 मजदूर दिन-रात फुल स्पैन गर्डर बना रहे हैं। ज्यादातर UP, बिहार, ओडिशा, पश्चिम बंगाल और मध्यप्रदेश से हैं।

सरियों के जाल का स्पेशल डिजाइन जापान में बना
फैक्ट्री में सबसे पहले हम उस जगह पहुंचे, जहां रीइन्फोर्समेंट केज यानी सरियों का जाल बन रहा था। ये गर्डर बनाने का पहले स्टेप है। हर तरफ मशीनों का शोर है। मजदूर अलग-अलग स्टेप में गर्डर बना रहे हैं। हमें बताया गया कि गर्डर के केज का डिजाइन और ड्राइंग जापान में बनी है।

गर्डर के लिए बन रहा सरियों का जाल। सुपरवाइजर की देखरेख में सरियों की कटिंग और बाइंडिंग होती है। एक जाल बनाने में 3 से 4 दिन लग जाते हैं।

इंजीनियर ने बताया कि एक केज को उठाने में 150 टन की कैपेसिटी वाली मशीनें लगती हैं। इन्हें उठाकर सांचे पर रखा जाता है। सुपरवाइजर एक से डेढ़ दिन में इसकी हर बाइंडिंग चेक करता है। इसी दौरान इसमें सेंसर लगाए जाते हैं। इस पूरी प्रोसेस में आधा दिन लगता है। हमारी तरफ से सब ओके होने के बाद NHSRCL इसे अप्रूवल देता है और फिर आगे का काम शुरू होता है। अभी एक साथ 7 गर्डर बनाए जा रहे हैं।

प्रोजेक्ट से जुड़े एक अधिकारी ने बताया कि अप्रूवल मिलने के बाद इन केज में कॉन्क्रीट डाला जाता है। इस काम में 8 घंटे लगते हैं। फिर पानी डालकर इसे सेटल किया जाता है। करीब तीन दिन तक सुखाने के बाद मशीनों से इसकी मजबूती चेक होती है। 40 मीटर लंबा गर्डर बनाने में 45 टन स्टील और 400 क्यूबिक मीटर कॉन्क्रीट लगता है। इसके लिए यहां दो कॉन्क्रीट प्लांट बनाए गए हैं।

हमने देखा कि हर गर्डर में मोटे-मोटे वायर लगे हैं। इंजीनियर ने बताया कि मजबूती बढ़ाने के लिए इसमें HT वायर लगाई जाती हैं। इससे स्ट्रेचिंग के बाद स्टेडल कैरियर से 940 टन वाले गर्डर को स्टैकिंग यार्ड पर रखा जाता है। यहां गर्डर की फिनिशिंग होती है। इसके बाद दो सेट वाली ब्रिज गैंट्री यानी बड़ी क्रेन से इन्हें उठाया जाता है। ये क्रेन फुल स्पैन गर्डर को पिलर्स के बीच में रखती है।

ब्रिज गैंट्री एक तरह की बड़ी क्रेन होती है, इससे गर्डर को जमीन से पिलर के टॉप पर रखा जाता है। ये दो हिस्सों में होती है, एक हिस्सा 550 टन वजन उठा सकता है।

40 मीटर के चार गर्डर लॉन्च करने के बाद उस पर गर्डर ट्रांसपोर्टर मशीन को रखा जाता है। इस मशीन के सहारे गर्डर को आगे ट्रांसपोर्ट किया जाता है। इसी तरह वायाडक्ट या एलिवेटेड ट्रैक बनता चला जाता है। गर्डर बनाने से उनकी लॉन्चिंग का पूरा प्रोसेस समझने में अंधेरा हो गया। अचानक लाइट्स जलीं, हमने देखा कि पूरी फैक्ट्री में फिर से काम शुरू हो गया है।

फुल स्पैन गर्डर से 7 गुना तेजी से होता है काम
कास्टिंग यार्ड दिखा रहे इंजीनियर ने हमें बताया कि इस प्रोजेक्ट में NHSRCL ने वायाडक्ट बनाने के लिए छोटे गर्डर्स के मुकाबले फुल स्पैन गर्डर्स को तवज्जो दी है, क्योंकि इन्हें बनाना और सेट करने का काम सात गुना तेज होता है। छोटे गर्डर सिर्फ वहीं इस्तेमाल हो रहे हैं, जहां फुल स्पैन गर्डर लॉन्च करना मुश्किल है। आमतौर पर ये रोड क्रॉसिंग, नहर, पाइपलाइन, नदियों और प्लेटफॉर्म पर ही यूज हो रहे हैं।

सूरत कास्टिंग यार्ड: एक गर्डर रखने का वक्त 15 घंटे, भारत में बनी मशीनों से तैयार हो रहा ट्रैक
आणंद में बने कास्टिंग यार्ड को देखने के बाद हम सूरत की ओर बढ़े। रास्ते में ही हमें प्रोजेक्ट का अहमदाबाद से वडोदरा तक का काम देख रहे चीफ प्रोजेक्ट मैनेजर प्रदीप अहिरकर मिल गए।

उन्होंने बताया कि हम जिस जगह खड़े हैं, वहां से आठ किलोमीटर दूर कास्टिंग यार्ड में गर्डर बन रहे हैं। इन्हें अलग-अलग मशीनों से यहां लाया जाता है और लॉन्च किया जाता है। एक बार गर्डर लॉन्च करने के बाद वह एलिवेटेड ट्रैक का हिस्सा बन जाता है और धीरे-धीरे यह मशीन आगे बढ़ती रहती है।

चीफ प्रोजेक्ट मैनेजर प्रदीप अहिरकर, इनके जिम्मे अहमदाबाद से वडोदरा तक का काम है।

चीफ प्रोजेक्ट मैनेजर प्रदीप अहिरकर, इनके जिम्मे अहमदाबाद से वडोदरा तक का काम है।

प्रदीप ने हमें बताया कि ‘कास्टिंग यार्ड से गर्डर के लॉन्चिंग तक करीब 12 घंटे लग जाते हैं। गर्डर के यहां पहुंचने के बाद तीन घंटे में एलिवेटेड ट्रैक पर लॉन्च किया जाता है। उन्होंने हमें इसकी पूरी प्रोसेस भी दिखाई। प्रदीप ने कहा कि हमारे लिए गर्व की बात है कि गर्डर लॉन्च करने वाली मशीन भारत में ही बनी है। इसकी फंक्शनिंग, प्रोडक्टिविटी और सेफ्टी फीचर्स विदेशी मशीनों से कम नहीं हैं।’

25 गर्डर मिलाकर बनता है एक किलोमीटर ट्रैक
प्रदीप अहिरकर ने बताया कि ‘इस पर्टिकुलर स्ट्रेच में हमें 29 किलोमीटर तक गर्डर लगाना है। अब तक हम 40 मीटर लंबे 195 गर्डर लॉन्च कर चुके हैं। आमतौर पर 25 गर्डर का एक किलोमीटर होता है। इस हिसाब से 8 किलोमीटर की लॉन्चिंग हम कर चुके हैं।’

प्रदीप अहिरकर के मुताबिक, ‘फुल स्पैन गर्डर खास तरीके से डिजाइन होते हैं। इनकी लॉन्चिंग काफी तेजी से होती है। इसका इस्तेमाल देश में बहुत कम जगहों पर होता है। हालांकि यहां जितने भारी गर्डर अब तक यूज नहीं हुए हैं। अगर मैं यहीं छोटे गर्डर लॉन्च करूं, तो मुझे 7 दिन का वक्त लगेगा। मशीनों की मदद से मैं सिर्फ आधे दिन में फुल स्पैन गर्डर लॉन्च कर देता हूं।’कास्टिंग यार्ड से गर्डर के लॉन्चिंग तक करीब 12 घंटे लग जाते हैं। गर्डर के यहां पहुंचने के बाद तीन घंटे में पिलर्स पर लॉन्च किया जाता है।

एक फुल स्पैन गर्डर बनाने में लगता है 61 टन स्टील
प्रदीप अहिरकर ने हमें बताया कि फुल स्पैन गर्डर में दो तरह का सरिया लगता है। रीइन्फोर्समेंट स्टील और प्रेस्ट्रेस्ड स्टील। एक गर्डर बनाने में तकरीबन 46 टन रीइन्फोर्समेंट स्टील और 15 टन का प्रेस्ट्रेस्ड स्टील लगता है। इसमें 400 क्यूबिक मीटर कॉन्क्रीट जाता है और इसका वेट 975 टन होता है।’

प्रदीप के मुताबिक ‘वैसे तो फुल लेंथ गर्डर की लंबाई 40 मीटर होती है, लेकिन जरूरत के हिसाब से इसे बदला जा सकता है। रास्ते के बीच में अगर कोई पाइपलाइन, सीवर, रोड या नहर आ जाए है तो गर्डर की लंबाई 35 या 32 मीटर कर सकते हैं।’

ये मशीन गर्डर ट्रॉन्सपोर्टर है। ब्रिज गैंट्री से गर्डर को उठाकर इसी मशीन पर रखा जाता है, फिर इसे लॉन्चिंग वाली जगह तक ले जाते हैं।

ये मशीन गर्डर ट्रॉन्सपोर्टर है। ब्रिज गैंट्री से गर्डर को उठाकर इसी मशीन पर रखा जाता है, फिर इसे लॉन्चिंग वाली जगह तक ले जाते हैं।

भूकंप आया तो खुद रुक जाएगी ट्रेन
प्रदीप अहिरकर ने बताया कि हाईस्पीड ट्रेन का पूरा ट्रैक भूकंपरोधी बनाया जा रहा है। इसमें सिस्मिक स्टॉपर लगे हुए हैं। भूकंप आता है तो दो तरह की वेव पैदा होती हैं। प्राइमरी और सेकेंड्री। हमने कुछ सेंटर्स लिए हैं, जहां से अगर प्राइमरी वेव आएगी तो हमारे सिस्मिक इंडिकेटर उनकी पहचान कर सबस्टेशन में इलेक्ट्रिसिटी को कुछ ही सेकेंड में ट्रिप कर देंगे। इससे इमरजेंसी ब्रेक लगेंगे और ट्रेन अपनी जगह पर रुक जाएगी।

गर्मी में काम करना बड़ा चैलेंज
प्रदीप अहिरकर ने बताया कि कास्टिंग यार्ड में काम करना बड़ी चुनौती है। यहां दोपहर 12 से 4 बजे के बीच में इतनी गर्मी होती है कि आप लोहे पर हाथ नहीं रख सकते। इसलिए हम सुबह और शाम को कॉन्क्रीट का काम करते हैं। दोपहर में मजदूरों की छुट्टी कर दी जाती है।

अहमदाबाद से वडोदरा तक पूरे प्रोजेक्ट में 6900 लेबर काम कर रहे हैं।

अहमदाबाद से वडोदरा तक पूरे प्रोजेक्ट में 6900 लेबर काम कर रहे हैं।

प्रदीप अहिरकर से मुलाकात के बाद हम करीब 200 किमी दूर सूरत के गांव वकटाना पहुंचे। यहां 42 एकड़ में कास्टिंग यार्ड बना है। इसे 21 जून 2021 को बनाया गया था। इसमें कुल 323 फुल स्पैन गर्डर कास्ट होने हैं। इसके लिए 7 जगह एक साथ काम होता है। यहां मिले इंजीनियर ने बताया कि इस जगह पहली गर्डर कास्टिंग फरवरी 2022 में हुई थी। यहां बनने वाले गर्डर से करीब 20 किमी लंबा वायाडक्ट बनाया जाएगा।

मुंबई से इस कास्टिंग यार्ड की दूरी 254 किमी है। हमने देखा कि यहां मशीनों के अलावा 500 लोगों के रुकने के लिए लेबर कैंप, एंबुलेंस और मेडिकल फैसिलिटी मौजूद हैं। पास में ही मजदूरों के लिए खाना बन रहा था। पता चला कि यहां 800 मजदूर 24 घंटे काम करते है, इसलिए उनके खाने का इंतजाम भी है। एक अधिकारी ने बताया कि इस प्रोजेक्ट की वजह से गुजरात और महाराष्ट्र में करीब 60 हजार लोगों को काम मिलेगा।

मशीनों का पहला बैच विदेश से आया, अब भारत में ही बना रहे
इस कास्टिंग यार्ड में ऐसी मशीनें हैं, जिनका इस्तेमाल अब तक देश में कहीं भी नहीं हुआ था। एक अधिकारी ने हमें बताया कि ‘मशीनों का पहला बैच चीन और साउथ कोरिया से मंगवाया था। फिर इंजीनियरों ने इन्हें मॉडिफाई कर देश में ही बना लिया। ये स्वदेशी होने के साथ किफायती भी हैं।’

यहां से निकलकर हम भरूच स्टेशन पहुंचे। दोपहर का वक्त था और ज्यादातर मजदूर पेड़ या शेड के नीचे बैठकर खाना खा रहे थे। राजकुमार नाम के एक लेबर ने बताया कि ‘वैसे तो हमारे लिए यहां अलग से शेड हैं, लेकिन हम गांव के लोग हैं और खुले में रहने की आदत है, इसलिए पेड़ के नीचे बैठकर खाना खा लेते हैं और यहीं कुछ देर की नींद भी ले लेते हैं।’

भरूच में सिंगल सेल का कास्टिंग यार्ड है। यहां का तापमान 45 डिग्री सेल्सियस है। इसलिए दोपहर में यहां भी मजदूरों को 2 से 4 घंटे की छुट्टी दे दी जाती है।

एक हजार एकड़ जमीन पर बना कास्टिंग यार्ड
एक अधिकारी के मुताबिक, पूरे रूट के लिए 25 कास्टिंग यार्ड बनाए गए हैं। जरूरत के हिसाब से ये 16 से 93 एकड़ जमीन पर डेवलप किए गए हैं। सभी ट्रैक के पास हैं। 25 कास्टिंग यार्ड का कुल एरिया करीब 1000 एकड़ है। हर कास्टिंग यार्ड में जाल बनाने, गर्डर के लिए सांचे, कास्टिंग बेड, कॉन्क्रीट मिलाने वाले प्लांट और मजदूरों के रहने की जगह तैयार की गई है।

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Ramswaroop Mantri

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