शशिकांत गुप्ते
सीतारामजी ने आज एक अनोखी घटना बताई। कहने लगे कल हमारे मोहल्ले में कुछ लघु संस्कारित लोग घुसे थे। पूरे मोहल्ले में कोलाहल मचा था।
मोहल्ले के तीन चार घरों के ताले टूटे, तीन चार घरों में चोरी हुई।
पुलिस आई थी। पुलिस कर्मियों ने कहा हम तहक़ीक़ात करेंगे। जल्दी ही चोरों को पकड़ेंगे।
सीतारामजी ने कहा मैने पुलिस वालों पर गुस्सा प्रकट करते हुए कहा, जिन लोगों ने उक्त घटना को अंजाम दिया है,उन्हें चोर कहकर उनका अपमान मत करों? वे लघु संस्कारित लोग है।
पुलिस अधिकारी ने मेरी ओर मुस्कुराते हुए कहा जानतें हो चोरों को लघु संस्कारित कहना मतलब उन्हें अपराध करने के लिए प्रश्रय देने जैसा है। ऐसा कहकर आप अपराध ही कर रहे हो आपको हम अंदर कर सकतें हैं।
मैने कहा आप तो जो चाहे वो कर सकतें हो।
पुलिस अधिकारी की बात सुनकर,किसी ने मेरा परिचय करवाया,ये महाशय व्यंग्यकार हैं।
उसी समय पुलिस अधिकारी के मोबाइल पर कॉल आया, बाजार में किसी की जेब कट गई।
मेरे मुँह से निकल गया त्योहारों के दिनों में, ये सूक्ष्म संस्कारित लोग भी सक्रिय है।
मेरे पास खड़े व्यक्ति ने हँसते हुए कहा आप यहाँ पलायन कर लो।
इनदिनों नित नई परिभाषा गढ़ी जा रही है। पता नहीं व्यंग्य करना भी किसी आपराधिक परिभाषा में आ जाए।
घर लौटकर समाचार पत्र पढ रहा था। डाका डालने की योजना बना रहे कुछ लोग पुलिस की गिरफ्त आ गए।
मेरे मुँह से तुरंत ही निकल गया ये तो दीर्घ संस्कारित लोग हैं।
सीतारामजी की बात सुनकर मैने सीतारामजी से पूछा आज आप संस्कारित शब्द का प्रयोग बार बार क्यों कर रहे हो?
सीतारामजी ने कहा इनदिनों संस्कारित शब्द का प्रयोग तो धार्मिक आस्थावान लोग कर रहें हैं।
कुछ दिनों पूर्व ही महान संस्कारित लोगों को रिहा कर उन्हें पुष्पमाला पहनकर मिठाई खिलाई गई।
सजा के दौरान इन लोगों का आचरण एकदम संस्कारित रहा है। इसी कारण इन्हें “बा” कायदा कानूनी प्रक्रिया का निर्वाह कर रिहा किया गया है।
देश के गृहमंत्रालय की अनुशंसा प्राप्त कर इनलोगों पर अनुकम्पा की गई।
संस्कारित होने से इतना बड़ा पारितोषिक मिल सकता है, यह तो कभी सोचा ही नहीं था।
…….. है तो मुमकिन है। यह उक्ति चरितार्थ हो रही है।
सभी आस्थावान लोग अपनी संतानों को इसी तरह संस्कारित बनाएंगे।
यह संकल्प सार्वजिक मंचो से दिलवाया जाएगा?
नई परिभाषा के कारण सूक्ष्म,लघु,दीर्घ,और महान संस्कारीत शब्दो का प्रयोग साहित्य में भी करना पड़ेगा?
इस प्रसंग पर प्रख्यात कवि गिरिजाकुमार माथुरजी की इस रचना का स्मरण हुआ।
होंगे कामयाब, होंगे कामयाब
हम होंगे कामयाब एक दिन
हो-हो मन में है विश्वास, पूरा है विश्वास
होंगी शांति चारो ओर
हम चलेंगे साथ-साथ
डाल हाथों में हाथ
नहीं डर किसी का आज
नहीं भय किसी का आज
हम होंगे कामयाब एक दिन
शशिकांत गुप्ते इंदौर





