अग्नि आलोक
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*बहस जरूरी है, सांच और आंच पर?*

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शशिकांत गुप्ते

सांच को आंच नहीं यह कहावत संभवतः किताबों में कैद होकर रह गई है।
अब तो कौवों का भी ज़मीर जाग गया है,अब कौवे झूठ बोलने वालों को काटते नहीं है।
कारण जानना चाहा तो ज्ञात हुआ, झूठ बोलने वालों की संख्या निरंतर दिन दूनी रात चौगुनी गति से बढ रही है।
झूठ बोलने वालों की तुलना में कौवों की संख्या बहुत कम है।
कौवों का कहना है, झूठ बोलने वालों ने हमें बदनाम कर रखा है।
सबसे पहले यह जानना जरूरी है,हम कौवे कभी किसी को काटते नहीं है,जो हमें सताता है उसे सिर्फ चोंच मारते हैं।
हम पक्षी है, हमारे अंदर मानव जैसी क्रूरता नहीं हैं। पक्षियों पर अध्ययन करने वालों का कहना है कि,पक्षियों में कौवा ही ऐसा पक्षी है,जो मानव से बहुत जल्दी मित्रता कर लेता है।
ऐसी मान्यता भी है कि, कौवों की पहुंच तो स्वर्ग तक है, मृत व्यक्ति के पिंड पर कौवा चोंच मार देता है तो,उस व्यक्ति की आत्मा को इहलोक से मुक्ति मिल जाती है,और वह आधिकारिक रूप से स्वर्गवासी हो जाता है।
ऐसे पवित्र कार्य को सम्पन्न करने वाला पक्षी कौवा,झूठ बोलने वालों को काट कर स्वयं अपवित्र क्यों होगा?
बहरहाल मुद्दा है,सांच को आंच नहीं इस कहावत के औचित्य पर आज प्रश्न उपस्थित है।
यदि औचित्य होता तो,झूठ बोलने वालों का ज़मीर जागृत होता,और वे कभी झूठ नहीं बोलते?
आज तो उल्टी गंगा बह रही है आज सांच को जांच की आंच से ना सिर्फ झुलसना ही पड़ता है,बल्कि Remand का सामना करना पड़ता है। Remand एक कानूनी प्रक्रिया जो आरोपी से सख्त तरीके से पूछताछ के लिए अपनाई गई है?
इन दिनों व्यवहार में प्रश्न वाचक को उपयोग लाना भी अपराध की श्रेणी में गिना जा रहा है?
वैसे भी प्रश्न वाचक शब्द ही व्याकरण की पुस्तकों में कैद हो कर रह गया है।
वास्तव में प्रश्न एक जिज्ञासा है?
जिस व्यक्ति में जिज्ञासा ही नहीं हो उसमें मानवीय संवेदनाएं क्षीण होती है।
आज सबसे अहम प्रश्न ही संवेदनाओं का है?
समाज संवेदनहीन हो रहा है।
इसीलिए जघन्य अपराध बढ़ रहें हैं। कलयुगी दुशासन,आए दिन अबलाओ की अस्मत लूट रहे है।
संवेदनहीन शासन व्यवस्था अपराधी के घर को बुलडोजर से रौंद रही है। किसी परिवार का कोई एक व्यक्ति अपराध करता है,तो उसके अन्य परिजनों क्यों प्रताड़ित किया जाता है?
इस संदर्भ प्रसिद्ध शायर बशीर बद्रजी रचित शेर मौंजू है।
है अजीब शहर की ज़िंदगी न सफ़र रहा न क़याम है
कहीं कारोबार सी दोपहर कहीं बद-मिज़ाज सी शाम है
जिन लोगों में संवेदनाएं जागृत हैं,वे क्या सोचते हैं? यह बशीर बद्रजी अपने निम्न शेर में फरमाते हैं।
वो दिलों में आग लगाएगा मैं दिलों की आग बुझाऊंगा
उसे अपने काम से काम है मुझे अपने काम से काम है
इसीलिए प्रारंभ में कही गई कहावत सांच को आंच नहीं
के औचित्य पर उपस्थित गंभीर प्रश्न पर व्यापक बहस अनिवार्य है।

शशिकांत गुप्ते इंदौर

Ramswaroop Mantri

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