25 देशों में किए गए एक ‘प्यू सर्वे’ के अनुसार, भारतीयों में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई) के बारे में सबसे कम जानकारी है। सर्वे में पाया गया कि केवल 14% भारतीयों ने एआई के बारे में ज्यादा सुना या पढ़ा है; और 32% ने इसके बारे में थोड़ा-बहुत पढ़ा-सुना है। कुल मिलाकर, यह हिस्सा (46%) सर्वेक्षित देशों में सबसे कम है। यह 25 देशों के औसत 81% से भी काफ़ी कम है।
हालाँकि एआई एक नई तकनीक है जिसके बारे में आमतौर पर युवाओं से ज़्यादा जानकारी की उम्मीद की जाती है, 18-34 आयु वर्ग के केवल 19% भारतीयों ने कहा कि उन्होंने एआई के बारे में बहुत कुछ सुना या पढ़ा है। सर्वेक्षण किए गए 25 देशों में इस आयु वर्ग में यह दूसरा सबसे कम हिस्सा है। इससे नीचे केवल केन्या (14%) है।
परिणामस्वरूप, भारतीय भी दैनिक जीवन में एआई के बढ़ते उपयोग को लेकर सबसे कम चिंतित लोगों में से हैं। उनमें से मात्र 19% ने कहा कि दैनिक जीवन में एआई का बढ़ता उपयोग उन्हें उत्साहित करने के बजाय चिंतित करता है। यह हिस्सा सर्वेक्षण किए गए देशों में लगभग सबसे कम है । यह ‘क्या फर्क पड़ता है?’ वाला भाव है। ज्यादातर विकसित देशों के लोग, जो एआई का इस्तेमाल अपने रोजमर्रा के कामों में करने लगे हैं, वे इसके दुरुपयोग को लेकर आशंकित भी ज्यादा हैं।
लगभग 90% भारतीयों ने यह भी कहा कि उन्हें विश्वास है कि उनका देश एआई के इस्तेमाल को प्रभावी ढंग से नियंत्रित करेगा। वे एआई में दिलचस्पी नहीं लेते, जानकारी नहीं रखते, इस्तेमाल नहीं करते, लेकिन सरकार द्वारा इसका विनियमन जरूर चाहते हैं। यह हिस्सा सर्वेक्षण किए गए सभी देशों में सबसे ज़्यादा है।
ज्यादातर विकसित देशों में राय ऐसे विनियमन के खिलाफ है। बेरुखी और सरकार के हाथों में सारी ताक़त सौंपने वाले ये संकेत भारतीय लोकतंत्र के भविष्य को लेकर भी उम्मीद पैदा करने वाले नहीं हैं। नये ज्ञान, नयी तकनीक और अपने अधिकारों के प्रति जागरूक नागरिक ही किसी देश की थाती होते हैं।
धनी देशों में एआई के बारे में बहुत कुछ जानने-सुनने वाले लोगों की संख्या ज़्यादा है। जापान, जर्मनी, फ़्रांस और अमेरिका में लगभग आधे वयस्कों ने कहा कि उन्होंने एआई के बारे में बहुत कुछ सुना है, जबकि भारत में यह संख्या 14% और केन्या में 12% है।
एक दिलचस्प तथ्य यह भी है कि जिन देशों की जीडीपी ज्यादा है, वहां के लोगों की एआई में दिलचस्पी भी ज्यादा है। यह बताता है कि किसी भी समाज के ज्ञान और तकनीकी विकास का उच्च स्तर वहां की अर्थव्यवस्था में भी सकारात्मक योगदान देता है और इसी तरह से तेज वृद्धि वाली अर्थव्यवस्था भी नये ज्ञान और नयी तकनीक के प्रति अपने नागरिकों की दिलचस्पी और जागरूकता का विस्तार करती है।
जापान, फ्रांस, जर्मनी, अमरीका, नीदरलैंड्स, स्वीडन, इटली, ऑस्ट्रेलिया, इंग्लैंड और कनाडा जैसी बड़ी प्रति व्यक्ति आय वाली अर्थव्यवस्थाओं में एआई के बारे मे जागरूकता भी बहुत ज्यादा है। वहीं भारत, केन्या, तुर्की, अर्जेंटीना जैसी छोटी प्रति व्यक्ति आय वाली अर्थव्यवस्थाओं में यह एआई जागरूकता बेहद कम है।
भारतीय सत्ताधारी वर्ग का इस समय ज्ञान-विज्ञान-तकनीक के बारे में रुख बेहद निराशाजनक है। जिस तरह से धर्म और धार्मिक पहचान की आड़ में अंधविश्वास, पाखंड और ढकोसलों को बढ़ावा दिया जा रहा है उससे देश के भविष्य की एक धूमिल तस्वीर बनती है।
प्रधानमंत्री जैसे पद पर बैठा व्यक्ति गणेश को प्लास्टिक सर्जरी से तैयार किया हुआ बताता है, एक पूर्व मंत्री हनुमान को पहला अंतरिक्ष यात्री बताता है, एक पूर्व मुख्यमंत्री वैदिक युग में सैटेलाइट और इलेक्ट्रॉनिक संचार नेटवर्क होने का दावा करता है, कोई पुष्पक विमान की बात करता है तो देश में बड़े-बड़े पदों पर बैठे लोग गोमूत्र और गोबर की चमत्कारिक इलाज क्षमता का दावा करते ही रहते हैं।
देश के ज्ञान-विज्ञान के बड़े-बड़े, वैश्विक पहचान रखने वाले संस्थानों के ढांचों को रोज तोड़ा जा रहा है और वहां के शीर्ष पदों पर सत्ताधारी दल की सोच वाले काठ के उल्लुओं को बैठाया जा रहा है, इससे भविष्य में भारत की शर्मनाक वैश्विक तस्वीर बनेगी।
पूरे देश में स्वतंत्रता, समानता, बंधुता, धर्मनिरपेक्षता और न्याय जैसे मूल्यों को सचेत तौर पर अप्रासंगिक बनाया जा रहा है। नयी शिक्षा नीति के नाम पर प्रतिगामी मूल्यों से लैश पाठ्यक्रमों को पूरे देश में जबरन थोपा जा रहा है और ज्योतिष, कर्मकांड और वास्तुशास्त्र जैसे अतार्किक और विज्ञान-विरोधी विषयों को बढ़ावा दिया जा रहा है।
इससे यह तय है कि स्वयंभू विश्वगुरु बनने की इनकी बेताबी भारत की सृजनात्मक मेधा का बंटाधार कर देगी। ये स्थितियां अपन देश से सच्चा प्यार करने वाले और एक बेहतर भविष्य की कामना करने वाले हर नागरिक के हृदय को विदीर्ण करने वाली हैं।
प्रस्तुति : शैलेश
(30.10.2025 के ‘द हिंदु’ में प्रकाशित आंकड़ों पर आधारित)





