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*लोकतंत्र के भीतर तानाशाही*

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(चुनाव, आस्था और सत्ता के अंतर्संबंधों पर एक दार्शनिक–राजनीतिक निबंध)

 -तेजपाल सिंह ‘तेज’

 

          अशोक कुमार पांडे के विचारों और 20वीं सदी के तानाशाहों के ऐतिहासिक अनुभवों के आलोक में  नीचे प्रस्तुत पाठ  के अनुसार दार्शनिकराजनीतिक निबंध के रूप में और अधिक सघनवैचारिक रूप से परिपक्व, तथा उपशीर्षकों के भीतर निरंतरप्रवाहमयी शैली में लिखा गया है। इसमें बिंदुओं की सूची नहीं है, बल्कि विचार एक–दूसरे से विकसित होते हुए आगे बढ़ते हैं, ताकि पाठ एक सुसंगत बौद्धिक विमर्श के रूप में पढ़ा जाए।

 

प्रस्तावना : जब तानाशाही वर्दी नहीं, वैधता पहन लेती है:

          तानाशाही को हम प्रायः इतिहास की किसी धूलभरी गली में छोड़ आए हुए एक भयावह अवशेष की तरह देखते हैं—हिटलर, स्टालिन, मुसोलिनी या पिनोशे जैसे नामों के साथ जुड़ा हुआ एक बंद अध्याय। लोकतंत्र के विस्तार, संविधानवाद की स्वीकृति और सार्वभौमिक मताधिकार के बाद यह विश्वास गहराया कि अब सत्ता की निरंकुशता संभव नहीं है। परंतु यही विश्वास इक्कीसवीं सदी की सबसे बड़ी भूल सिद्ध हो रहा है।

          आज तानाशाही न तो तख्तापलट से आती है, न ही संविधान को औपचारिक रूप से रद्द करती है। वह चुनाव जीतती है, संसद में बैठती है, क़ानून की भाषा बोलती है और जनता की सहमति का दावा करती है। यह वही स्थिति है जिसे समकालीन राजनीतिक विमर्श में चुनावी निरंकुशता कहा जाता है—एक ऐसी व्यवस्था जिसमें लोकतंत्र का ढांचा जीवित रहता है, लेकिन उसकी आत्मा क्रमशः क्षीण होती चली जाती है।

लोकतंत्र का अंत नहीं, उसका रूपांतरण:

          यह समझना आवश्यक है कि तानाशाही आज लोकतंत्र को नष्ट नहीं करती, बल्कि उसे अपने अनुसार ढाल लेती है। चुनाव होते रहते हैं, पर चुनाव विकल्प नहीं, केवल अनुमोदन बन जाते हैं। विपक्ष रहता है, पर उसकी भूमिका प्रतीकात्मक हो जाती है। मीडिया मौजूद रहता है, पर वह सत्ता का प्रश्नकर्ता नहीं, उसका प्रचारक बन जाता है।

          यह परिवर्तन अचानक नहीं होता। यह धीरे–धीरे घटित होता है—इतना धीरे कि समाज को महसूस ही नहीं होता कि वह किस बिंदु पर लोकतंत्र से आगे निकलकर किसी और ही व्यवस्था में प्रवेश कर चुका है। अशोक कुमार पांडे का तर्क यहीं सबसे अधिक प्रासंगिक हो जाता है कि तानाशाही कोई दुर्घटना नहीं, बल्कि एक प्रक्रिया है।

असुरक्षा, भय और एक शत्रु की अनिवार्यता:

          कोई भी तानाशाही शांति और संतुलन के वातावरण में जन्म नहीं लेती। उसे भय चाहिए—चाहे वह वास्तविक हो या गढ़ा हुआ। आर्थिक संकट, सांस्कृतिक अस्मिता का डर, ऐतिहासिक अपमान की स्मृति या भविष्य के प्रति अनिश्चितता—ये सभी तानाशाही की उर्वर भूमि बनते हैं। परंतु भय अपने आप में पर्याप्त नहीं होता। उसे एक चेहरे की आवश्यकता होती है। इसलिए हर तानाशाही एक शत्रु गढ़ती है—कभी वह यहूदी होता है, कभी मुसलमान, कभी प्रवासी, कभी ‘देशद्रोही बुद्धिजीवी’। जटिल सामाजिक–आर्थिक समस्याओं को समझाने के बजाय उन्हें किसी एक समुदाय, विचार या पहचान पर थोप दिया जाता है। यह प्रक्रिया जनता को सोचने से मुक्त कर देती है और क्रोध को एक दिशा दे देती है।

धर्म और पहचान : राजनीति का सबसे प्रभावी संक्षेप:

          बहुधार्मिक और बहुसांस्कृतिक समाजों में धर्म तानाशाही का सबसे शक्तिशाली औजार बन जाता है। धर्म यहाँ आस्था नहीं, बल्कि राजनीतिक पहचान बन जाता है। वह नागरिक को व्यक्ति के रूप में नहीं, किसी समूह के प्रतिनिधि के रूप में परिभाषित करता है। जब राजनीति धर्म की भाषा बोलने लगती है, तब असहमति नैतिक अपराध बन जाती है। सत्ता का विरोध केवल सत्ता का विरोध नहीं रहता, वह धर्म, संस्कृति और राष्ट्र का विरोध घोषित कर दिया जाता है। इस बिंदु पर लोकतंत्र का मूल तत्व—विचारों का संघर्ष—अवैध हो जाता है।

मीडिया : आधुनिक गोएबल्स का संस्थानीकरण :

          बीसवीं सदी में गोएबल्स एक व्यक्ति था; इक्कीसवीं सदी में वह एक पूरा तंत्र है। मीडिया अब केवल सूचना का माध्यम नहीं, बल्कि यथार्थ का निर्माता बन चुका है। क्या दिखाया जाएगा, क्या छुपाया जाएगा, किसे राष्ट्रवादी कहा जाएगा और किसे देशद्रोही—ये सभी निर्णय अब पत्रकारिता के नहीं, सत्ता–संरचना के प्रश्न बन चुके हैं। जब मीडिया सत्ता से प्रश्न पूछना छोड़ देता है, तब तानाशाही को हिंसा की आवश्यकता नहीं रह जाती। सहमति स्वयं गढ़ ली जाती है।

व्यक्ति से संस्था तक : तानाशाही का गहनतम रूप:

          इतिहास का सबसे भयावह चरण तब आता है जब तानाशाही किसी एक व्यक्ति तक सीमित नहीं रहती, बल्कि संस्था का रूप ले लेती है। तब हर स्तर पर छोटे–छोटे तानाशाह पैदा होते हैं—प्रशासन में, विश्वविद्यालयों में, दलों में, यहाँ तक कि सामाजिक संगठनों में भी। यह वही अवस्था है जिसे अशोक कुमार पांडे संस्थागत तानाशाही की संज्ञा देते हैं। इसमें सत्ता केवल ऊपर नहीं होती; वह हर जगह बिखरी होती है। नागरिक हर स्तर पर भय और आज्ञाकारिता का अनुभव करता है।

भारतीय संदर्भ : एक ऐतिहासिक अपवाद से विचलन तक:

          भारत का लोकतांत्रिक प्रयोग ऐतिहासिक रूप से एक अपवाद था। औपनिवेशिक दमन, विभाजन की हिंसा और गहरी विविधता के बावजूद यहाँ एक ऐसा संविधान बना जिसने सत्ता को सीमित किया और नागरिक को केंद्रीय स्थान दिया। नेहरू, पटेल और मौलाना आज़ाद जैसे नेताओं के पास पर्याप्त जनसमर्थन था कि वे तानाशाही स्थापित कर सकते थे, पर उन्होंने ऐसा नहीं किया। लेकिन लोकतंत्र केवल संस्थाओं से नहीं चलता; वह संस्कृति से चलता है। जब राजनीति धीरे–धीरे प्रतिनिधित्व से बहुमत की ओर, और बहुमत से वर्चस्व की ओर बढ़ती है, तब संविधान भी अपर्याप्त सिद्ध होने लगता है।

आपातकाल और आज का अंतर:

          आपातकाल लोकतंत्र पर एक गहरा आघात था, पर उसमें एक मूलभूत अंतर था—वह अस्थायी था, स्वीकृत हार के साथ समाप्त हुआ और चुनावों के माध्यम से जनता ने सत्ता बदली। तानाशाही की पहचान यही है कि वह हार को स्वीकार नहीं करती। आज का संकट अधिक सूक्ष्म है, इसलिए अधिक खतरनाक भी। यहाँ लोकतंत्र की हत्या नहीं होती, उसका क्षरण होता है।

उपसंहार : इतिहास चेतावनी देता है, वर्तमान परीक्षा लेता है:

          तानाशाही हमेशा यह वादा करती है कि वह व्यवस्था लाएगी, गौरव लौटाएगी और समस्याएं सुलझा देगी। इतिहास बताता है कि वह केवल सत्ता को स्थायी बनाती है और समस्याओं को स्थगित करती है। अशोक कुमार पांडे की पुस्तक और यह पूरा विमर्श हमें यह समझाने का प्रयास है कि तानाशाही कोई बीती हुई त्रासदी नहीं, बल्कि एक सतत संभावना है। लोकतंत्र का भविष्य इस बात पर निर्भर करता है कि नागरिक प्रश्न पूछने की अपनी क्षमता और साहस को कितना जीवित रख पाते हैं। क्योंकि जिस दिन समाज ने यह मान लिया — “हमारा तानाशाह अच्छा है”, उसी दिन लोकतंत्र ने चुपचाप दम तोड़ दिया होता है।

Ramswaroop Mantri

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