अग्नि आलोक

मत काटो पेड़ों को / मेरा भी एक सपना है / बेदर्द जमाना / मेरी ज़िंदगी

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मत काटो पेड़ों को

तनुजा आर्य
कपकोट, उत्तराखंड

मत काटो पेड़ों को,
उसमें भी तो जान है,
उसी से हमारा जीवन है,
उसी से है उम्मीदें सारी,
शुद्ध वातावरण और हवाएं,
देते हमें वो ये सदाएं,
पेड़ काटने का मतलब है,
अपनी ज़िंदगी को कम करना है,
प्रकृति की सुंदरता पेड़ ही बढ़ाते,
फिर भी क्यों लोग इसे काट देते,
पेड़ तो जीवन की शुरुआत है,
हरियाली और हमारी आस है,
पेड़ काटकर लकड़ी पाने की लालच से,
क्या कभी तुम जीत पाओगे?
क्या सोचते हो तुम?
पेड़ काट कर खुश रह पाओगे?

मेरा भी एक सपना है

पलक
जखेड़ा, उत्तराखंड

मेरा भी एक सपना है,
जिसे मुझे पूरा करना है,
पुलिस बन कर रक्षा करनी है,
अपने सपने को यूं पूरा करना है,
हर किसी से मैं लड़ जाउंगी,
सपना पूरा कर के दिखाऊंगी,
मैं खुद के सपने में रहती हूं,
न समझे कोई नादान मुझे,
थोड़ी सी समझ है मुझमें,
कर्म करुं या त्याग करूं,
समझ न आए, अब क्या करुं।।

बेदर्द जमाना

कविता जोशी
लामाबगड़, उत्तराखंड

कितना बेदर्द है ये जमाना,
किसी पर रहम ना ये खाता,
जो मन आये वो कह जाता,
किसी की कुछ न सुनता,
भाई भाई लड़ने लगे हैं,
अब प्यार ना रहा पहले जैसा,
जमाना बहुत बदल गया है ,
पहले जैसा कुछ ना रहा है ,
पड़ोस में रह कर भी कोई,
किसी पड़ोसी को न जाने,
क्या कहूं अब क्या सुनना रह जाना,
देख लो कितना बेदर्द है ये ज़माना।।

मेरी ज़िंदगी

प्रिया बिष्ट
सुराग, उत्तराखंड

बेखौफ सी लगती है मेरी ज़िंदगी,
क्या कहूँ, इस ज़िंदगी को,
कभी ख़ुशी है, कभी गम है,
कभी दुख है तो कभी यादें हैं,
बेखौफ है मेरी जिंदगी,
बेखौफ रहनी चाहिए,
खुशहाल है मेरी ज़िंदगी,
खूबसूरत रहनी चाहिए,
इस ज़िंदगी पर नहीं किसी की हुकूमत,
पाबंदी से है बेखौफ मेरी ज़िंदगी॥

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