राकेश श्रीवास्तव
आज उप्र की 55 विधानसभा सीटों के साथ ही उत्तराखंड और गोवा की सभी सीटों को मिलाकर 165 सीटों के लिए प्रतिनिधि चुने जाने हैं। रोज डे,प्रपोज डे, चाकलेट डे, टेडी डे, प्रामिस डे,हग डे, किस डे की मनुहार के बाद आज वेलेंटाइन डे आया है। देखना है कि मतदाताओं द्वारा किया गया प्रामिस कितना सही था क्योंकि नेताओं के वादे तो नकली हग डे की तरह निकलते हैं।नेता आपको रोज,चॉकलेट,टेडी दिखाकर लुभाते रहते हैं और मलाई किसी और को खिलाते हैं।जनता को हक का रोजगार न देकर,किसानी का वाजिब दाम न देकर बार बार एहसान के बोझ जताकर मुफ्त राशन की थैली देते हैं।
वैसे तो सभी राज्यों के परिणाम महत्वपूर्ण हैं परन्तु सबसे अधिक सीटों के कारण उप्र के चुनावों का अलग ही आकर्षण है।दूसरे चरण के नौ जिलों -बिजनौर,अमरोहा,मुरादाबाद, रामपुर, बरेली, शाहजहांपुर, बदायूं, सहारनपुर और सम्भल मे चुनाव है। 2017 मे बीजेपी ने 38 सीटों पर अपना परचम लहराया था जबकि सपा के पास 15 व कांग्रेस के पास दो सीटें थीं।पश्चिमी उप्र और रूहेलखंड का यह क्षेत्र मुख्यतः गन्ने की खेती के लिए जाना जाता है।किसान गन्ने के बकाया और खाद की समस्या से हलकान हुआ जा रहा था। देखना होगा कि प्रथम चरण से उठी किसानों की एकजुटता यहां पर कैसी रहती है,जनता अपने कोर मुद्दों पर टिकती है या जाति और धर्म के नाम पर वोट करती है।
पिछले विधानसभा चुनाव मे बीजेपी की पश्चिमी उप्र से उठी लहर सभी को बहा ले गई थी पर इस बार बहुत कंकड फेंकने के बाद भी वह शांत दिख रही है।जयंत और अखिलेश की जोड़ी अलख जगाने मे लगी है,प्रियंका ल़डकियों और युवाओं के मुद्दे बेबाकी से आगे लाईं हैं जबकि बहन जी भी अब सक्रिय दिख रहीं हैं।भाजपा मुख्यतः कानून व्यवस्था और मुफ्त राशन को प्रमुखता दे रही है।केजरीवाल और ओवैसी मतदाताओं को रिझाने मे सफल नहीं दिखते हैं।जिन्ना और पाकिस्तान भी मुद्दा नहीं बन सके।
निष्पक्ष आकलन मे लगता है कि किसान आंदोलन की आंच इस चरण मे भी दिखेगी। पिछले चुनाव मे बीजेपी को बरेली की सभी नौ सीट तथा शाहजहांपुर की छः मे से पांच सीटों एकतरफ़ा विजय मिली थी।पर इस बार वह संभावना क्षीण दिखती है।सपा रालोद गठबंधन अपनी सीटों मे वृद्धि की उम्मीद कर रहा है वहीं बीएसपी व कांग्रेस किसी का भी समीकरण बिगाड़ सकती हैं।इस क्षेत्र का युवा व बेरोजगार भी उद्वेलित लग रहा है।कोरोना आपदा की विभीषिका अभी भी लोगों के जेहन मे बनी हुई है।
अब देखना है कि जनता किसके गले मे हार पहनाती है। भारतीय मतदाता बहुत ही होशियार होता है अतः किसी नतीजे का पूर्वानुमान बहुत ही चैलेंजिंग होता है। इसलिए 10 मार्च तक दिल थाम कर बैठिए।





