मेरा कोना -विवेक मेहता
अतिक्रमण करने का जो आनंद है वह अतुलनीय, अपार है। अपुन जानता है, महसूस करता है। ज्यादातर लोग इस आनंद को उठाते हैं पर मानते नहीं इस कारण इसका लाभ लेते हुए भी आनंद उठाने से चुक जाते हैं। ऐसे लोगों की आंखों पर ईर्ष्या, जलन, घमंड की पट्टी चढ़ी होती है। ये लोग असंतुष्ट होते हैं। जो है उसमें खुश नहीं रह सकते। उन्हें लगता है कि दूसरे का अतिक्रमण, अतिक्रमण है। मेरा तो हक है। या फिर मेरा अतिक्रमण तो उसके अतिक्रमण के सामने कुछ भी नहीं।
अतिक्रमण का मतलब होता है सीमा का उल्लंघन करना। फिर वह सीमा विचारों की हो, नियमों की हो या जमीन की हो। अपुन तो फालतू दिमाग खर्च करने से परहेज रखता है। अंधभक्ति में विश्वास नहीं करता इसलिए विचारों, विचारधारा के जाल में फंसाता नहीं। अपुन तर्क-कुतर्क, वार्तालाप-बहस में पड़ता नहीं। संबंध नहीं है इसलिए अतिक्रमण का सवाल ही नहीं होता। कानून की सीमाओं को लांघने का अधिकार सत्ताधीशों, अफसरों, पंच परमेश्वर का है। अपुन उस श्रेणी में नहीं आता। अपुन तो उन लोगों में से हैं जिन्हें लगता है कि सरकार को अपुन टैक्स देता है साफ सफाई का, ड्रेनेज का, पानी का, रोड़ लाईट का और सुविधा तो मिलती नहीं तो फिर अपुन को कहीं-न-कहीं से तो पैसा वसूल करना ही पड़ेगा। इसलिए थोड़ा आगे बढ़ जाता है। उसे वसूली के बजाय अतिक्रमण कैसे कहा जा सकता है!
आप ही बताइए दमदार, ताकतवर लोगों के इस तरह के कामों को तो कोई अतिक्रमण नहीं कहता है? लोग सरकारी जमीन पचा लेते हैं। तालाब के तालाब खा जाते हैं। कॉलोनी बसा लेते हैं क्या कभी किसी ने उसको अतिक्रमण कहा हैं? कई मंत्री, सांसद, सुप्रीम कोर्ट के जज, मुख्यमंत्री और विधायक जो भूतपूर्व हो जाते हैं-सरकारी बंगलो पर अधिकार नहीं छोड़ते। क्या उसे किसी ने अतिक्रमण माना हैं? तो फिर अपुन घर के बाहर रोड़ पर थल्ला बनाकर गाड़ियां खड़ी रखता है या ऊपर चढ़ने की 2-4 सीढ़ियां बना लेता है या फिर वायर फेंसिंग कर बगीचा खड़ा कर लेता है तो वह अतिक्रमण कैसे हो जाता है! अरे भाई, अपुन यह काम करता है तो धूल मिट्टी उड़ने की संभावनाओं को खत्म करता है। बगीचा लगाकर शहर की सुंदरता में वृद्धि करता है। अपुन के इस योगदान के कारण अपुन का तो सम्मान होना चाहिए। मेडल मिलना चाहिए उसके बजाय अतिक्रमण का नाम दे दिया जाता है। यह कोई बात हुई? अपुन के ऐसा करने के कारण 2-4 वाहन चालकों को कभी कोई परेशानी हो जाती है तो वह बेचारे बुरा नहीं मानते क्योंकि वे जानते हैं कि अपने घर के बाहर या आसपास के सार्वजनिक स्थलों का उपयोग वे लोग भी पार्किंग के लिए करते हैं। यदि वे लोग ऐसा ना करें तो नगर पालिका वालों को बाग-बगीचे मेंटेन करना पड़ेंगे। खर्चा बढ़ जाएगा। नगरसेवकों, अध्यक्षों की कमाई में तीव्र गति से गिरावट आ जाएगी। वे बेचारे अगला चुनाव कैसे लड़ेंगे? अपुन तो सोचता है कि दुकानों के बाहर रखे गए सामान को भी अतिक्रमण की श्रेणी में नहीं मानना चाहिए। आर्केट बंद हो गया, फुटपाथ खत्म हो गया यह बहाना नहीं किया करना चाहिए। बेचारा दुकानदार महंगे भाव की जमीन खरीदना है तो उसका हक बनता है कि अपनी दुकान की चौड़ाई के बराबर 5 या 10 फीट जितना संभव हो उतनी दूरी तक सामान का प्रदर्शन कर सकें। इससे न केवल उसकी आय बढ़ेगी, देश की आय भी बढ़ेगी। यह होगा तो जीडीपी भी बढ़ेगा। ट्रिलियनस में इकानामी पहुंचेगी। यह तो देश सेवा का काम हुआ। प्रशासन की लापरवाही और नीति-नियंताओं में दूरदृष्टी का अभाव है। वे लोग सरकारी कमाई नहीं बढ़ा पा रहे हैं इन कामों से। उन्हें तो चाहिए की बाजार भाव से अतिरिक्त जमीन का किराया वसूल करें। चाहे वह पार्किंग के लिए उपयोग में आ रही हो या दुकानों के लिए। बड़े शहरों में बहुमंजिला भवनों में रहने वाले पार्किंग खरीदते हैं या नहीं? आप सोचिए यदि ऐसा होना लगा तो कितनी इनकम बढ़ जाएगी। इस पर चाहे तो जीएसटी भी लगा कर सरकारी आमदनी बढ़ा सकते हैं। ऐसे लोगों पर बुलडोजर की धमक भी होगी जिससे वे सरकार का विरोध चाह कर भी नहीं कर सकेंगे। प्रशासन तो इसे अतिक्रमण का नाम देकर जनता की भलाई में लग जाता हैं। कमजोरी का ठीकरा अपने सिर पर फुड़वा लेता हैं। ऐसे निकम्मे लोगों को तो पेंशन भी नहीं मिलना चाहिए। अपुन के पास दूरदृष्टी है, पावर नहीं है। जिनके पास पावर है उनके पास अपुन जैसी दूरदृष्टी नहीं है। ऐसी परिस्थिति में अपुन क्या करें? अपुन बस अतिक्रमण का लाभ ही उठा सकता हैं तो अपुन वहीं उठा लेता हैं।

