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” पर्यावरण “

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-मंजुल भारद्वाज

पंचतत्व
वायु,जल,अग्नि
मिटटी और आकाश
मूल है मनुष्य का
इसी से जन्म कर
इसी में मिलना
नियति है मनुष्य की
मनुष्य के सुंदर जीवन के लिए
इन पाँचों का संतुलित होना अनिवार्य है
मनुष्य ने आधुनिकता और वैज्ञानिक उन्नति से
इन पाँचों को असंतुलित किया है
जरूरत और लालच का टकराव है
पृथ्वी मनुष्य की जरूरतों के लिए
संसाधन सम्पन्न है
पर लालच के लिए नहीं
लालच ने मनुष्य की बुद्धि को
अपनी गिरफ्त में ऐसा लपेटा है
उसको विध्वंस विकास नजर आता है
मनुष्य का मन दूषित हो गया है
मन दूषित तो पर्यावरण प्रदूषित
पर्यावरण मतलब वातावरण
पर्यावरण मतलब परिस्थिति
मनुष्य ने अपने जीने के आवरण
यानि पर्यावरण को ध्वस्त कर दिया है
मनुष्य ने प्रकृति के खिलाफ़
युद्ध छेड़ रखा है
यह युद्ध है जल,जंगल ज़मीन
और
उसको बचाने वालों के खिलाफ़
जंगल के रक्षक, जगंली प्राणी
शेर से लेकर लोमड़ी तक
आदिवासी से लेकर गाँव तक
सब विकास की भेट चढ़ गए हैं
वातावरण मतलब वा, ता ,वरण
वा से वायु
ता से तापमान
वरण मतलब चुनाव
आज मनुष्य ने वायु को प्रदूषित किया
जिससे तापमान बिगड़ा
और उसने चुना प्राकृतिक प्रकोप
मनुष्य आज अपनी बुद्धि भ्रम से
ऐसी परिस्थिति में है
एक मुसीबत से बचने के लिए
दूसरी मुसीबत में फंस जाता है
जल बचाने जाता है
तो ज़मीन को खा जाता है
ज़मीन बचाने जाता है
तो जल को बर्बाद कर देता है
उसका विकास का हाईवे
जंगल,पेड़,पहाड़ी
और खेत खलिहानों को रौंद कर बने
वायु और ध्वनि का प्रदुषण के केंद्र हैं
जंगल नहीं रहे तो तापमान बढ़ा
तापमान बढ़ा तो वर्षा चक्र बिगड़ गया
कभी कहाँ कितना और क्यों बरसेगा
इसका किसी को पता नहीं
इतना पानी बरसा की
एअरपोर्ट पर नाव चली
शहर की सडकों पर नाव चली
चारों ओर बाढ़ से तबाही मची
भू जल को इतना पी गए
अब सूखे की मार से निपट गए
वायु प्रदुषण से साँसों में
जहर घोल लिया
हाँ
हमने प्राकृतिक संसाधनों को बेच
विकास को मोल ले लिया !

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