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निमाड़ी को आज भी है राजभाषा का दर्जा मिलने का इंतजार : जोशीला

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इंदौर : पद्मश्री जगदीश जोशीला का कहना है कि निमाड़ी बोली को राजकीय भाषा के रूप में स्थापित करने का संघर्ष अभी भी जारी है। 25 साल से प्रस्ताव प्रदेश सरकार के पास लंबित है पर आज दिनांक तक उसपर कोई निर्णय नहीं लिया जा सका है। इस कार्य के लिए हमने निमाड़ी बोली का शब्दकोश तैयार किया।निमाड़ी साहित्य का भी सृजन किया लेकिन सरकार के स्तर पर उपेक्षा के चलते निमाड़ी राजकीय भाषा का दर्जा पाने से वंचित है।

जोशीला जाल सभागृह में आयोजित अभ्यास मंडल की पैंसठवीं वार्षिक व्याख्यानमाला के चौथे दिन अपना उद्बोधन दे रहे थे। उनके व्याख्यान का विषय था ‘लोकभाषा संरक्षण की अनूठी पहल।’ उन्होंने निमाड़ी बोली को भाषा का रूप देने के लिए किए गए संघर्ष, प्रयास और कार्यों का विस्तार के साथ वर्णन किया।

आजादी के बाद की गई निमाड़ी बोली की उपेक्षा

उन्होंने कहा कि वर्ष 1319 से लेकर 1644 तक का समय भक्तिकाल का समय था। इस 325 वर्ष के कालखंड में जनपदीय व्यवस्था थी। इस दौरान कई भक्त कवि हुए । हर कवि ने अपनी बोली में लेखन के कार्य को अंजाम दिया। तुलसीदास ने राम चरित मानस लिखी तो सूरदास ने ब्रज भाषा में सृजन किया। मीराबाई ने राजस्थानी में पद रचे तो नरसी मेहता ने गुजराती में लिखा, तुकाराम ने मराठी में अभंग सृजित किए तो गुरु नानक ने पंजाबी में। सभी ने अपनी अपनी बोली में लिखकर उस बोली को विस्तार दिया। निमाड के संत सिंगाजी ने निमाड़ी में अद्वैत पर निर्गुण धारा का सृजन किया।इसे पाँच सौ आठ साल हो गए हैं। देश की आजादी के बाद भक्त कवियों द्वारा लिखे गए साहित्य के आधार पर बोलियों को राजभाषा का दर्जा दिया गया लेकिन निमाड़ी के साथ सौतेला व्यवहार किया गया।

उन्होंने कहा कि 19 सितंबर, 1953 को हमने निमाड़ लोक साहित्य परिषद का गठन किया। इस परिषद में माखनलाल चतुर्वेदी, पद्मश्री रामनारायण उपाध्याय, विश्वनाथ, जड़ावचंद्र जैन जैसे लोग जुड़े। हमने 20 साल तक संघर्ष किया लेकिन हमें सफलता नहीं मिली। इस घटनाक्रम से यह संस्था सिमट गई। हमारी निमाड़ी बोली उपेक्षा का शिकार रही। लोग निमाड़ी बोलने में संकोच और हीनता का अनुभव करते थे। उज्जैन के टेपा सम्मेलन की तर्ज पर हमने निमाड में ठापा सम्मेलन शुरू किया। इसके बाद निमाड़ी भाषा का शब्दकोश और व्याकरण तैयार करने के लिए एक कमेटी का गठन किया गया। इस कमेटी द्वारा तीस हजार शब्द चयनित किए गए । इसके बाद हमने भारत सरकार को यह पूरा शब्दकोश प्रकाशित कर भेंट किया और चाहा कि सरकार द्वारा निमाड़ी बोली को राजकीय भाषा का दर्जा दिया जाए। जब हमने केन्द्र सरकार को सारे दस्तावेज सौंप दिए तो वहां से जवाब आया कि यह काम राज्य सरकार को करना है ।

निमाड़ी को आज भी है राजभाषा का दर्जा मिलने का इंतजार : जोशीला

इंदौर : पद्मश्री जगदीश जोशीला का कहना है कि निमाड़ी बोली को राजकीय भाषा के रूप में स्थापित करने का संघर्ष अभी भी जारी है। 25 साल से प्रस्ताव प्रदेश सरकार के पास लंबित है पर आज दिनांक तक उसपर कोई निर्णय नहीं लिया जा सका है। इस कार्य के लिए हमने निमाड़ी बोली का शब्दकोश तैयार किया।निमाड़ी साहित्य का भी सृजन किया लेकिन सरकार के स्तर पर उपेक्षा के चलते निमाड़ी राजकीय भाषा का दर्जा पाने से वंचित है।

जोशीला जाल सभागृह में आयोजित अभ्यास मंडल की पैंसठवीं वार्षिक व्याख्यानमाला के चौथे दिन अपना उद्बोधन दे रहे थे। उनके व्याख्यान का विषय था ‘लोकभाषा संरक्षण की अनूठी पहल।’ उन्होंने निमाड़ी बोली को भाषा का रूप देने के लिए किए गए संघर्ष, प्रयास और कार्यों का विस्तार के साथ वर्णन किया।

आजादी के बाद की गई निमाड़ी बोली की उपेक्षा।

उन्होंने कहा कि वर्ष 1319 से लेकर 1644 तक का समय भक्तिकाल का समय था। इस 325 वर्ष के कालखंड में जनपदीय व्यवस्था थी। इस दौरान कई भक्त कवि हुए । हर कवि ने अपनी बोली में लेखन के कार्य को अंजाम दिया। तुलसीदास ने राम चरित मानस लिखी तो सूरदास ने ब्रज भाषा में सृजन किया। मीराबाई ने राजस्थानी में पद रचे तो नरसी मेहता ने गुजराती में लिखा, तुकाराम ने मराठी में अभंग सृजित किए तो गुरु नानक ने पंजाबी में। सभी ने अपनी अपनी बोली में लिखकर उस बोली को विस्तार दिया। निमाड के संत सिंगाजी ने निमाड़ी में अद्वैत पर निर्गुण धारा का सृजन किया।इसे पाँच सौ आठ साल हो गए हैं। देश की आजादी के बाद भक्त कवियों द्वारा लिखे गए साहित्य के आधार पर बोलियों को राजभाषा का दर्जा दिया गया लेकिन निमाड़ी के साथ सौतेला व्यवहार किया गया।

उन्होंने कहा कि 19 सितंबर, 1953 को हमने निमाड़ लोक साहित्य परिषद का गठन किया। इस परिषद में माखनलाल चतुर्वेदी, पद्मश्री रामनारायण उपाध्याय, विश्वनाथ, जड़ावचंद्र जैन जैसे लोग जुड़े। हमने 20 साल तक संघर्ष किया लेकिन हमें सफलता नहीं मिली। इस घटनाक्रम से यह संस्था सिमट गई। हमारी निमाड़ी बोली उपेक्षा का शिकार रही। लोग निमाड़ी बोलने में संकोच और हीनता का अनुभव करते थे। उज्जैन के टेपा सम्मेलन की तर्ज पर हमने निमाड में ठापा सम्मेलन शुरू किया। इसके बाद निमाड़ी भाषा का शब्दकोश और व्याकरण तैयार करने के लिए एक कमेटी का गठन किया गया। इस कमेटी द्वारा तीस हजार शब्द चयनित किए गए । इसके बाद हमने भारत सरकार को यह पूरा शब्दकोश प्रकाशित कर भेंट किया और चाहा कि सरकार द्वारा निमाड़ी बोली को राजकीय भाषा का दर्जा दिया जाए। जब हमने केन्द्र सरकार को सारे दस्तावेज सौंप दिए तो वहां से जवाब आया कि यह काम राज्य सरकार को करना है ।

पच्चीस साल से कर रहें निमाड़ी को राजभाषा का दर्जा मिलने का इंतजार।

जोशीला ने कहा कि फिर हमने राज्य सरकार को भी सारे दस्तावेज सौंप दिए पर पिछले पच्चीस साल से जवाब आने का ही इंतजार कर रहे हैं। प्रदेश की सरकारों ने कभी भी निमाड़ी को राजभाषा का दर्जा देने में रुचि नहीं दिखाई। मध्यप्रदेश में हर बोली के क्षेत्र में विश्वविद्यालय स्थापित हो गए और उन बोलियों को संरक्षण मिला। निमाड़ क्षेत्र में अब जाकर पहला विश्वविद्यालय खरगौन में खुला है ।उसे टंटया भील का नाम दिया गया है। उन्होंने कहा कि बोलने वालों की कमी से भाषा लुप्त हो जाती है। निमाडी बोली के साथ ऐसा न हो इसके लिए हम जनजागरण अभियान चला रहे हैं।आदि शंकराचार्य, देवी अहिल्याबाई का संबंध निमाड़ से है।

जगदीश जोशीला ने कहा कि निमाड के क्षेत्र से आदि शंकराचार्य, संत सिगाजी, लोकमाता अहिल्याबाई होलकर, टंटया भील, राणा बख्तावर सिंह जैसी महान विभूतियों का रिश्ता रहा है। उन पर फोकस कर निमाड़ी में साहित्य भी तैयार किया गया है।

कार्यक्रम के प्रारंभ में अतिथि का स्वागत शरद सोमपुरकर, मुकेश तिवारी और मनीषा गोर ने किया। कार्यक्रम का संचालन कुणाल भंवर ने किया। अभ्यास मंडल का परिचय हरेराम वाजपेयी ने दिया। अंत में आभार प्रदर्शन स्टेट प्रेस क्लब के अध्यक्ष प्रवीण खारीवाल ने किया। अतिथि को स्मृति चिह्न शंकरलाल गर्ग और अनिल कर्मा ने भेंट किया।

आज का व्याख्यान

अभ्यास मंडल द्वारा आयोजित व्याख्यानमाला में बुधवार दिनांक 26 नवंबर को अंतिम व्याख्यान होगा। यह व्याख्यान प्रसिद्ध चिंतक विचार डॉ एके वर्मा का होगा। संविधान दिवस होने के कारण इस व्याख्यान का विषय भारत के संविधान पर केंद्रित है।

जोशीला ने कहा कि फिर हमने राज्य सरकार को भी सारे दस्तावेज सौंप दिए पर पिछले पच्चीस साल से जवाब आने का ही इंतजार कर रहे हैं। प्रदेश की सरकारों ने कभी भी निमाड़ी को राजभाषा का दर्जा देने में रुचि नहीं दिखाई। मध्यप्रदेश में हर बोली के क्षेत्र में विश्वविद्यालय स्थापित हो गए और उन बोलियों को संरक्षण मिला। निमाड़ क्षेत्र में अब जाकर पहला विश्वविद्यालय खरगौन में खुला है ।उसे टंटया भील का नाम दिया गया है। उन्होंने कहा कि बोलने वालों की कमी से भाषा लुप्त हो जाती है। निमाडी बोली के साथ ऐसा न हो इसके लिए हम जनजागरण अभियान चला रहे हैं।

आदि शंकराचार्य, देवी अहिल्याबाई का संबंध निमाड़ से है।

जगदीश जोशीला ने कहा कि निमाड के क्षेत्र से आदि शंकराचार्य, संत सिगाजी, लोकमाता अहिल्याबाई होलकर, टंटया भील, राणा बख्तावर सिंह जैसी महान विभूतियों का रिश्ता रहा है। उन पर फोकस कर निमाड़ी में साहित्य भी तैयार किया गया है।

कार्यक्रम के प्रारंभ में अतिथि का स्वागत शरद सोमपुरकर, मुकेश तिवारी और मनीषा गोर ने किया। कार्यक्रम का संचालन कुणाल भंवर ने किया। अभ्यास मंडल का परिचय हरेराम वाजपेयी ने दिया। अंत में आभार प्रदर्शन स्टेट प्रेस क्लब के अध्यक्ष प्रवीण खारीवाल ने किया। अतिथि को स्मृति चिह्न शंकरलाल गर्ग और अनिल कर्मा ने भेंट किया।

अभ्यास मंडल द्वारा आयोजित व्याख्यानमाला में बुधवार दिनांक 26 नवंबर को अंतिम व्याख्यान होगा। यह व्याख्यान प्रसिद्ध चिंतक विचार डॉ एके वर्मा का होगा। संविधान दिवस होने के कारण इस व्याख्यान का विषय भारत के संविधान पर केंद्रित है।

Ramswaroop Mantri

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